SportsSkill: दो दोस्तों का स्पोर्ट्स टेक स्टार्टअप कैसे खोज रहा है भारत का अगला चैंपियन
जब खेल सिर्फ जुनून पर नहीं, समझ और व्यवस्था पर टिके, तब असली बदलाव आता है. यह कहानी बताती है कि SportsSkill कैसे डेटा और इंसानी अनुभव के मेल से भारतीय खेल प्रशिक्षण को अधिक साफ, भरोसेमंद और सुलभ बनाने की कोशिश कर रहा है.
भारत में खेल को अक्सर भावनाओं से जोड़ा जाता है. तालियों से, जुनून से और उम्मीदों से. लेकिन इन सबके बीच एक बात लंबे समय तक अनदेखी रही. खिलाड़ी सच में कितना बेहतर हो रहा है. यह सवाल हर माता पिता के मन में होता है. हर कोच के सामने आता है. लेकिन इसका जवाब ज्यादातर अनुमान पर टिका होता है. छोटे शहरों और गांवों में यह सवाल और भी बड़ा हो जाता है. वहां न तो संसाधन होते हैं और न ही कोई तय व्यवस्था. कई बार प्रतिभा सिर्फ इसलिए पीछे रह जाती है क्योंकि उसे सही दिशा नहीं मिलती.
इसी सच्चाई से निकला है स्पोर्ट्स टेक स्टार्टअप SportsSkill और यह है इसकी कहानी. यह कहानी किसी चमत्कार की नहीं है. यह एक खाली जगह को समझने और उसे भरने की कोशिश की कहानी है. इस स्टार्टअप की शुरुआत की है दो दोस्तों ने — अभिनव सिन्हा (Abhinav Sinha) और चेतन देसाई (Chetan Desai). दोनों ने खेल को अलग अलग भूमिकाओं से जिया है. खिलाड़ी, कोच, आयोजक और मैनेजर के तौर पर. शायद इसी वजह से वे उस सवाल को साफ देख पाए जिसे बाकी लोग नजरअंदाज कर रहे थे.
कोर्ट से कोड तक
अभिनव सिन्हा के लिए खेल कोई शौक नहीं था. वह बचपन से उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा. इलाहाबाद के एक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में उन्होंने स्क्वैश खेलना शुरू किया. धीरे धीरे पहचान बनने लगी. स्कूल के दिनों में शिमला जाना हुआ. वहां मुकाबले ज्यादा कड़े थे. लेकिन इसी दौर ने उन्हें खेल के अनुशासन और धैर्य से परिचित कराया.
कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके पास एक सुरक्षित करियर का रास्ता था. लेकिन उन्होंने जोखिम चुना. प्रोफेशनल स्क्वैश खेला. अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेले. भारत का प्रतिनिधित्व किया. बाद में कोचिंग की जिम्मेदारी संभाली. यहीं से एक नई परेशानी सामने आई.
अभिनव बताते हैं, “मैं खिलाड़ियों की ट्रेनिंग नोट करता था. लेकिन मन में हमेशा सवाल रहता था कि क्या यह मेहनत सही दिशा में जा रही है.”
जब वह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की तैयारी कर रहे खिलाड़ियों के साथ काम कर रहे थे, तब उन्हें विदेशी अकादमियों का तरीका दिखा. हर सेशन का रिकॉर्ड. हर छोटी प्रगति का हिसाब. भारत में ऐसा कुछ नहीं था.
SportsSkill की शुरुआत
चेतन देसाई का सफर और भी लंबा है. टेनिस खेलते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर देखा. फिर कॉरपोरेट और खेल प्रबंधन में काम किया. बड़े टूर्नामेंट आयोजित किए. खिलाड़ियों और परिवारों से लगातार बातचीत होती रही. एक सवाल बार बार सामने आता था.
चेतन कहते हैं, “माता पिता जानना चाहते थे कि उनका बच्चा आगे बढ़ रहा है या नहीं. लेकिन जवाब हमेशा गोल होता था.” उन्हें लगता था कि यह सिर्फ तकनीक की कमी नहीं है. यह सोच की कमी है. खेल को मापने की कोई साझा भाषा नहीं है.
जब चेतन और अभिनव की बातचीत हुई तो दोनों को लगा कि समस्या नई नहीं है. लेकिन इसे गंभीरता से कभी हल नहीं किया गया. यहीं से SportsSkill का विचार आकार लेने लगा और साल 2021 में इसे लॉन्च किया गया.
सिस्टम की तलाश
पुणे (महाराष्ट्र) स्थित SportsSkill का मकसद खिलाड़ियों को मशीन बनाना नहीं था. इसका मकसद था एक साफ तस्वीर देना. खिलाड़ी कहां खड़ा है. क्या सुधर रहा है. क्या नहीं. प्लेटफॉर्म पर ट्रेनिंग से जुड़े डेटा दर्ज होते हैं. वीडियो के जरिए तकनीक देखी जाती है. कोच अपना अनुभव जोड़ते हैं.
अभिनव कहते हैं, “डेटा अपने आप में सच नहीं होता. उसे समझने के लिए इंसान चाहिए.” इसी सोच से प्लेटफॉर्म को बनाया गया. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पैटर्न दिखाता है. लेकिन अंतिम फैसला इंसानी समझ से आता है.
यह व्यवस्था कोच को कमजोर नहीं करती. बल्कि उसे मजबूती देती है. माता पिता को साफ जानकारी मिलती है. खिलाड़ी को खुद की प्रगति दिखती है. इससे भरोसा बनता है. और भरोसे से अनुशासन आता है.
जब मौके बराबर होने लगें
SportsSkill की सबसे अहम बात यह है कि यह सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा. Chance2Sports जैसी पहल ने दिखाया कि सही ढांचे से क्या बदलाव आ सकता है. ग्रामीण इलाकों के खिलाड़ी जिनके पास आधा कोर्ट और पुराने उपकरण थे. उन्हें भी वही फीडबैक मिला जो किसी बड़ी अकादमी में मिलता है.
अभिनव कहते हैं, “हमने यह नहीं देखा कि खिलाड़ी कहां से है. हमने देखा कि वह क्या कर सकता है.” इसी सोच से कुछ ऐसे नाम सामने आए जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जगह बनाई.
यहां सफलता को प्रचार की तरह नहीं देखा गया. बल्कि सबूत की तरह देखा गया. इससे धीरे धीरे कोचों का भरोसा भी बढ़ा. शुरुआत में कई लोग संदेह में थे. लेकिन जब बातचीत आसान हुई और माता पिता संतुष्ट दिखे तो नजरिया बदला.
आगे का रास्ता
आज SportsSkill भारत के कई शहरों में इस्तेमाल हो रहा है. विदेशों में भी इसकी उपयोगिता परखी जा रही है. लेकिन संस्थापकों के लिए असली लक्ष्य संख्या नहीं है. लक्ष्य है सोच में बदलाव.
चेतन कहते हैं, “अगर खेल सिर्फ भावनाओं पर चलेगा तो बहुत लोग पीछे छूटेंगे.” आने वाले समय में कंपनी नए शहरों और देशों में जाना चाहती है. लेकिन साथ ही यह भी चाहती है कि खेल को देखने का नजरिया बदले.
यह कहानी किसी ऐप की नहीं है. यह उस सवाल की कहानी है जिसे हर खिलाड़ी के माता पिता पूछते हैं. मेरा बच्चा सच में आगे बढ़ रहा है या नहीं. SportsSkill ने उस सवाल को एक भाषा दी है.
भारत में खेल का भविष्य सिर्फ स्टार खिलाड़ियों से नहीं बनेगा. वह उन लाखों बच्चों से बनेगा जो रोज अभ्यास करते हैं. जिन्हें सही दिशा मिल जाए तो वे बहुत आगे जा सकते हैं. SportsSkill जैसी कोशिशें यही याद दिलाती हैं कि प्रतिभा की कमी नहीं है. कमी है व्यवस्था की. और जब व्यवस्था बनती है तो खेल सिर्फ सपना नहीं रहता. वह एक साफ रास्ता बन जाता है.



