इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ शुरू की गंगा की सफाई, 2.47 लाख किलो कचरा हटाने वाले शुभम कुमार की कहानी
सिविल इंजीनियर की नौकरी छोड़कर शुभम कुमार ने 2018 में पटना के गंगा घाटों की सफाई अकेले शुरू की. आज उनके Being Helper Foundation के साथ 1,100 से ज्यादा वालंटियर्स जुड़े हैं. जानिए कैसे यह पहल गंगा सफाई, प्लास्टिक रीसाइक्लिंग और नागरिक जिम्मेदारी की मिसाल बनी.
पटना के गंगा घाटों पर कूड़े, प्लास्टिक की बोतलों और गंदगी को देखकर अक्सर लोग अफसोस करते हैं. लेकिन बिहार के शुभम कुमार ने इसी अफसोस को एक्शन में बदलने का फैसला किया. पेशे से सिविल इंजीनियर शुभम ने 2018 में अपनी नौकरी छोड़कर पटना के दीघा गंगा घाट की सफाई शुरू की. तब उनके साथ कोई बड़ी टीम नहीं थी. आज उनकी पहल 1,100 से ज्यादा स्वयंसेवकों (वालंटियर्स) तक पहुंच चुकी है.
Being Helper Foundation के जरिए शुभम कुमार अब सफाई के साथ प्लास्टिक कचरा प्रबंधन, पौधारोपण, नागरिक जिम्मेदारी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर काम कर रहे हैं. आज वे Namami Gange और BUIDCo Bihar के ब्रांड एंबेसडर भी हैं. उनकी कहानी बिहार की उस नई तस्वीर को सामने लाती है, जहां युवा केवल समस्याओं की चर्चा नहीं कर रहे, बल्कि स्थानीय स्तर पर समाधान भी तैयार कर रहे हैं.
इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ शुरू की गंगा की सफाई
बिहार में पले बढ़े शुभम का रिश्ता शुरू से ही नदियों, सार्वजनिक जगहों और स्थानीय समुदायों से रहा. उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और सिविल इंजीनियर के तौर पर काम शुरू किया. इसके बाद वे बेंगलुरु चले गए, जहां एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी की. करियर आगे बढ़ रहा था. नौकरी थी, भविष्य सुरक्षित था और जीवन भी ठीक चल रहा था. फिर भी उनके भीतर एक सवाल धीरे-धीरे जगह बनाने लगा.
क्या पेशेवर सफलता सिर्फ अच्छी नौकरी और बेहतर पद से तय होती है? या फिर इसका मतलब यह भी है कि हम अपने आसपास के लोगों और जगहों के लिए क्या बदल पाए?
इस सवाल का जवाब उन्हें वाराणसी की यात्रा के दौरान कुछ हद तक मिला. दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती देखने के दौरान उन्होंने नदी को संस्कृति, आस्था, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा देखा. नाविकों से लेकर फूल बेचने वालों और छोटी दुकानों तक, बड़ी संख्या में लोगों की रोजी रोटी नदी से जुड़ी थी.
YourStory से बात करते हुए Being Helper Foundation के फाउंडर और डायरेक्टर शुभम कुमार बताते हैं, “वाराणसी में गंगा आरती देखकर मुझे समझ आया कि नदी सिर्फ पानी की धारा नहीं है. वह संस्कृति, पर्यटन और हजारों लोगों की रोजी रोटी से जुड़ी है. मैंने सोचा कि अगर गंगा साफ और स्वस्थ रहे, तो इसका फायदा सिर्फ पर्यावरण को नहीं होगा. इससे नदी पर निर्भर समुदायों के लिए बेहतर आर्थिक अवसर भी बन सकते हैं. पटना लौटकर जब मैंने घाटों की हालत देखी, तो लगा कि अब सिर्फ देखने वाला बनकर नहीं रह सकता.”

लोगों ने उड़ाया मजाक, सोशल मीडिया से मिला साथ
वाराणसी से लौटने के बाद पटना के घाटों की स्थिति ने शुभम को परेशान किया. कई जगह प्लास्टिक और दूसरे कचरे का ढेर था. कुछ जगहों पर मृत जानवर भी पड़े दिखाई देते थे. उन्हें लगा कि समस्या पर बात करने से ज्यादा जरूरी है कि कोई पहला कदम उठाए.
2018 में उन्होंने दीघा गंगा घाट की सफाई शुरू कर दी. पहले दिन उनके साथ कोई बड़ी टीम नहीं थी. न पर्याप्त पैसा था और न किसी संस्था का सहारा. वह अकेले ही कचरा उठाने पहुंचे थे.
शुभम के लिए असली चुनौती कचरा उठाना नहीं थी. चुनौती यह थी कि लोग इस काम को किस नजर से देखेंगे. कुछ लोगों ने सवाल किए. कुछ ने मजाक भी उड़ाया. यहां तक कि उनके करीबी लोगों को भी समझ नहीं आया कि एक सिविल इंजीनियर ने अपना करियर छोड़कर घाट साफ करने का फैसला क्यों किया.
लेकिन उन्होंने काम जारी रखा. धीरे-धीरे दोस्त जुड़े. फिर स्थानीय लोग आए. सोशल मीडिया और लोगों की बातचीत के जरिए यह पहल आगे बढ़ती गई.
शुभम कहते हैं, “शुरुआत में सबसे बड़ी परेशानी कचरा नहीं, लोगों की सोच थी. कई लोग पूछते थे कि एक व्यक्ति आखिर कितना बदल सकता है. मैंने सीखा कि भरोसा मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है. इसलिए हमने लोगों की प्रतिक्रिया की चिंता किए बिना काम जारी रखा. चाहे पांच लोग आएं या पचास, हम घाट पर पहुंचते रहे. धीरे धीरे लोगों ने फर्क देखना शुरू किया और जो लोग सवाल करते थे, वही आगे चलकर हमारे साथ खड़े होने लगे.”

1100 स्वयंसेवक, 2.47 लाख किलो कचरा हटाया
समय के साथ शुभम को समझ आया कि केवल कचरा उठाने से समस्या खत्म नहीं होगी. अगर अगले दिन वही कचरा फिर घाट पर आ जाए, तो सफाई का असर बहुत सीमित रहेगा. इसलिए पहल का दायरा बढ़ाया गया. कचरा अलग करने, प्लास्टिक इकट्ठा करने, रीसाइक्लिंग, पौधारोपण और नागरिक जागरूकता पर काम शुरू हुआ.
इसी प्रक्रिया में Being Helper Foundation का स्वरूप मजबूत हुआ. आज संस्था के साथ 1,100 से ज्यादा स्वयंसेवक जुड़े हैं. संगठन के अनुसार, उसकी पहल के तहत 2.47 लाख किलोग्राम से ज्यादा कचरा हटाया जा चुका है. 3 लाख से अधिक प्लास्टिक बोतलें इकट्ठी कर रीसाइक्लिंग के लिए भेजी गई हैं. करीब 1.40 लाख PET बोतलों को अलग-अलग पर्यावरणीय उपयोगों के लिए दोबारा इस्तेमाल किया गया है.
पटना में 45 से ज्यादा Bottle Banks बनाए गए हैं. इनके जरिए हर सप्ताह 11,000 से ज्यादा प्लास्टिक बोतलें इकट्ठी की जाती हैं. संस्था ने कई घाटों पर महिलाओं के लिए कपड़े बदलने के कमरे भी बनाए हैं. फिलहाल 12 गंगा घाटों पर ऐसी सुविधाएं उपलब्ध होने की बात शुभम बताते हैं.
शुभम कहते हैं, “हमारे लिए असर का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि हमने कितने किलो कचरे को हटाया. असली बदलाव तब दिखाई देता है, जब लोग अपना व्यवहार बदलते हैं. हमने देखा कि अगर वही प्लास्टिक अगले दिन फिर घाट पर आ जाए, तो सफाई अधूरी है. इसलिए हमने लोगों को साथ जोड़ना शुरू किया. Bottle Banks, कचरा अलग करने की व्यवस्था और जागरूकता इसी सोच का हिस्सा हैं. हमारा लक्ष्य सफाई को किसी एक दिन की गतिविधि नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिम्मेदारी बनाना है.”

कचरे में भी दिखी नई संभावना
शुभम की पहल में एक और बात खास है. वह कचरे को केवल समस्या के तौर पर नहीं देखते. सफाई के दौरान बड़ी संख्या में PET बोतलें मिलने के बाद टीम ने सोचना शुरू किया कि इनमें से कुछ का स्थानीय स्तर पर दोबारा इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है.
इसी सोच से पेड़ों की सुरक्षा के लिए प्लास्टिक बोतलों के इस्तेमाल और पौधारोपण से जुड़े कुछ प्रयोग किए गए. पानी के बेहतर इस्तेमाल के लिए ड्रिप इरिगेशन उपायों पर भी काम हुआ. इसके अलावा पूजा सामग्री और दूसरे नदी में जाने वाले कचरे को अलग रखने के लिए विशेष डिब्बों की व्यवस्था की गई.
महिलाओं के लिए कपड़े बदलने के कमरे बनाना भी इसी जमीनी अनुभव से निकला. घाटों पर काम करते हुए टीम ने देखा कि महिलाओं के पास कपड़े बदलने के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक जगह नहीं होती थी. शुभम ने इसे सिर्फ सुविधा का सवाल नहीं माना, बल्कि गरिमा से जुड़ी जरूरत के तौर पर देखा.
शुभम कहते हैं, “हमारा मानना है कि कचरे को हमेशा कचरा मानकर छोड़ देना जरूरी नहीं है. कई बार उसमें किसी नए उपयोग की संभावना होती है. लेकिन हर समाधान का मकसद दिखावा नहीं होना चाहिए. हमें ऐसी चीजें विकसित करनी हैं जो सरल हों, कम लागत वाली हों और स्थानीय स्तर पर काम करें. अगर कोई विचार घाट, स्कूल, गांव या मोहल्ले की वास्तविक समस्या हल करता है, तभी मेरे लिए वह असली इनोवेशन है.”

गंगा से नागरिक जिम्मेदारी तक
Being Helper Foundation का काम अब केवल पटना तक सीमित नहीं है. संस्था की गतिविधियां भागलपुर, कटिहार, दरभंगा, सीतामढ़ी, जहानाबाद और दूसरे इलाकों तक पहुंची हैं. शुभम की नजर अब गंगा के बड़े हिस्से पर है. आने वाले वर्षों में वह उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के प्रमुख गंगा घाटों तक स्थानीय स्वयंसेवकों का नेटवर्क बनाने की इच्छा रखते हैं.
इसके साथ ही Mission Civic Sense के जरिए स्कूलों और समुदायों में नागरिक जिम्मेदारी की समझ विकसित करने पर जोर है. शुभम मानते हैं कि सफाई के लिए लोगों को बार-बार अभियान की जरूरत न पड़े. यह आदत का हिस्सा बननी चाहिए.
उनकी सोच पर्यावरण को रोजगार से भी जोड़ती है. उनका मानना है कि साफ और व्यवस्थित नदी किनारे पर्यटन को बढ़ावा दे सकते हैं. इससे नाविकों, दुकानदारों, कारीगरों, महिलाओं और युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर नए अवसर बन सकते हैं. 2030 तक वह पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास से जुड़े एक लाख या उससे अधिक सम्मानजनक रोजगार के अवसरों में योगदान देना चाहते हैं.
शुभम कुमार कहते हैं, “मेरा सपना सिर्फ गंगा को साफ देखना नहीं है. मैं चाहता हूं कि नदी संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार भी पैदा हों. साफ नदी किनारा पर्यटन और छोटे कारोबार को बढ़ावा दे सकता है. आने वाले वर्षों में हम प्रमुख गंगा घाटों पर स्थानीय टीमों और स्वयंसेवकों का मजबूत नेटवर्क बनाना चाहते हैं. मेरी इच्छा है कि गोमुख से गंगासागर तक लोग अपनी नदी के रखवाले बनें और पर्यावरण की जिम्मेदारी को अपने जीवन का हिस्सा मानें.”
बदलाव की शुरुआत खुद से
2018 में दीघा घाट पर अकेले खड़े शुभम के पास संसाधन कम थे. लेकिन एक फैसला था. आज उस फैसले के साथ 1,100 से ज्यादा स्वयंसेवक जुड़े हैं. सफाई से शुरू हुई यह कोशिश अब नागरिक जिम्मेदारी, पर्यावरण और स्थानीय आजीविका की बड़ी बातचीत का हिस्सा बन रही है.
शुभम की कहानी का सबसे अहम हिस्सा शायद यही है कि उन्होंने किसी बड़े बदलाव का इंतजार नहीं किया. उन्होंने अपने हिस्से का छोटा काम शुरू किया. फिर लोग जुड़ते गए.
उनके लिए बदलाव की परिभाषा भी इसी में छिपी है. एक व्यक्ति शुरुआत कर सकता है, लेकिन स्थायी बदलाव तभी आता है जब समाज उस काम को अपना मान ले. गंगा की सफाई की यह कहानी आखिरकार नदी से ज्यादा इंसानी जिम्मेदारी की कहानी बन जाती है.



