लॉकडाउन में भूखे जानवरों को खिलाया खाना, आज 2000 से ज्यादा जानवरों की जिंदगी बचा चुका है वर्षा राज का APNA Foundation
कोरोना लॉकडाउन में जब बेजुबान जानवर भूख से जूझ रहे थे, तब वर्षा राज ने मदद का हाथ बढ़ाया. इसी पहल से APNA Foundation की शुरुआत हुई. आज यह संस्था 2,000 से ज्यादा जानवरों का रेस्क्यू कर चुकी है.
पटना की सड़कों पर कोरोना लॉकडाउन के दौरान जब सन्नाटा पसरा था, तब एक और खामोशी थी जिसे बहुत कम लोगों ने महसूस किया. सड़कों पर रहने वाले हजारों कुत्ते और दूसरे जानवर रोज खाने के लिए इंसानों पर निर्भर थे. दुकानें बंद थीं, लोग घरों में थे और कई बेजुबान भूख से तड़प रहे थे.
यही वह समय था, जब वर्षा राज ने तय किया कि अब सिर्फ दुख जताने से काम नहीं चलेगा. कुछ करना होगा. इसी संकल्प से APNA Foundation की शुरुआत हुई. वर्षा राज इस NGO की फाउंडर हैं जबकि आशीष रंजन बतौर को-फाउंडर APNA Foundation से जुड़े हुए हैं. आज यह संस्था 2,000 से अधिक जानवरों का रेस्क्यू कर चुकी है और पटना का पहला समर्पित एनिमल शेल्टर होम भी संचालित कर रही है.
बचपन से था बेजुबानों से गहरा रिश्ता
वर्षा राज को बचपन से ही जानवरों से गहरा लगाव था. उनकी मां घर के साथ-साथ गायों, पक्षियों और सड़क पर रहने वाले छोटे कुत्तों की देखभाल करती थीं. घर की छत पर रोज पक्षियों के लिए दाना रखा जाता था और छोटे और नवजात बच्चों के लिए अस्थायी आश्रय बनाए जाते थे. स्कूल से लौटते ही वर्षा सबसे पहले उन्हीं जानवरों के बीच पहुंच जाती थीं.
उनके पिता शिक्षक थे. परिवार ने उन्हें करुणा और संवेदनशीलता के संस्कार दिए. उन्होंने डीएवी पब्लिक स्कूल से पढ़ाई की, एएन कॉलेज से जूलॉजी में स्नातक किया और भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी ली. परिवार चाहता था कि वह डॉक्टर या गायिका बनें, लेकिन उनकी मंजिल अलग थी.
हाल ही में YourStory से हुई बातचीत में वर्षा कहती हैं, “मेरे बचपन की सबसे खूबसूरत यादें जानवरों के साथ जुड़ी हैं. शायद वहीं से समझ आया कि इंसान होने का मतलब सिर्फ अपने लिए जीना नहीं, बल्कि उन बेजुबानों के लिए भी खड़ा होना है, जिनकी आवाज कोई नहीं सुनता.”

जब करियर से बड़ा बन गया एक मिशन
लॉकडाउन के दौरान वर्षा और उनके साथियों ने सड़क के जानवरों को भोजन पहुंचाना शुरू किया. जल्द ही घायल कुत्तों और गायों के इलाज के लिए भी लोगों के फोन आने लगे. धीरे-धीरे यह अभियान पूरे पटना में फैल गया.
एक समय ऐसा आया जब उन्हें पढ़ाई, करियर और इस मिशन में से किसी एक को चुनना था. उन्होंने बेजुबानों का साथ नहीं छोड़ा. शुरुआत में परिवार इस फैसले से सहमत नहीं था, लेकिन बाद में वही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया.
वर्षा बताती हैं, “हमें महसूस हुआ कि अगर हम पीछे हट गए तो कई जिंदगियां खत्म हो जाएंगी. हर दिन कुछ आंखें हमारा इंतजार करती थीं. उसी दिन तय कर लिया कि यही हमारी जिंदगी होगी.”
शुरुआती दिनों में संस्था चलाना आसान नहीं था. टीम के सदस्य ट्यूशन पढ़ाते, छोटे संगीत कार्यक्रम करते और जो भी कमाई होती, उसका बड़ा हिस्सा जानवरों के भोजन, दवाइयों और इलाज पर खर्च कर देते. आज संस्था मुख्य रूप से व्यक्तिगत दानदाताओं और सोशल मीडिया के जरिए मिलने वाले सहयोग से संचालित होती है, हालांकि हर महीने शेल्टर और चिकित्सा का खर्च जुटाना अब भी सबसे बड़ी चुनौती है.

APNA Foundation ने अब तक 500 से अधिक जानवरों को सफलतापूर्वक गोद दिलाया है.
हर रेस्क्यू के पीछे एक नई जिंदगी
आज APNA Foundation की तीन सदस्यीय मुख्य टीम है, जबकि अलग-अलग इलाकों में स्वयंसेवक भी जुड़े हुए हैं. संस्था के शेल्टर में 34 स्थायी कुत्ते और एक गाय रहते हैं. इसके अलावा रोज 100 से अधिक सड़क के कुत्तों को भोजन कराया जाता है.
घायल जानवर की सूचना मिलते ही टीम मौके पर पहुंचती है. इलाज और देखभाल के बाद उसे स्वस्थ किया जाता है. यदि संभव हो तो उसके लिए नया परिवार खोजा जाता है, अन्यथा उसे सुरक्षित रूप से उसी इलाके में छोड़ा जाता है जहां से उसे लाया गया था.
अब तक संस्था 2,000 से अधिक जानवरों का रेस्क्यू, 1,000 से ज्यादा जानवरों का उपचार, 800 से अधिक नसबंदी, 1,000 से ज्यादा टीकाकरण और 500 से अधिक सफल गोद दिलाने की प्रक्रिया पूरी कर चुकी है.
वर्षा कहती हैं, “रेस्क्यू सिर्फ अस्पताल पहुंचाने तक सीमित नहीं होता. असली जिम्मेदारी इलाज, भरोसा लौटाने और सुरक्षित जिंदगी देने की होती है. जब कोई घायल जानवर फिर से अपने पैरों पर खड़ा होता है या उसे नया परिवार मिलता है, तब सारी मेहनत सफल लगती है.”
ऐसी ही एक कहानी है हिम्मत सिंह (कुत्ते का नाम) की. सड़क दुर्घटना में उसका एक पैर काटना पड़ा और दूसरे पैर में धातु की रॉड लगानी पड़ी. कई सर्जरी के बाद आज वह तीन पैरों के सहारे चलता है. उसकी चाल भले बदल गई हो, लेकिन जीने का हौसला नहीं.

वर्षा राज और आशीष रंजन के नेतृत्व में APNA Foundation अब तक 2,000 से अधिक जानवरों का रेस्क्यू कर चुका है और पटना का पहला समर्पित एनिमल शेल्टर होम भी संचालित कर रहा है.
सबसे बड़ी चुनौती सोच बदलना
वर्षा का मानना है कि सबसे बड़ी समस्या आर्थिक संसाधनों की नहीं, बल्कि समाज की सोच की है. आज भी बड़ी संख्या में लोग सड़क के जानवरों को केवल परेशानी के रूप में देखते हैं. इसी वजह से संस्था रेस्क्यू के साथ-साथ जागरूकता अभियान भी चलाती है.
संस्था लोगों को महंगे विदेशी नस्ल के पालतू जानवर खरीदने के बजाय भारतीय नस्ल के जरूरतमंद जानवरों को गोद लेने के लिए प्रेरित करती है. गोद देने से पहले परिवार का सत्यापन किया जाता है और बाद में भी नियमित संपर्क रखा जाता है.
इस दिशा में सरकारी स्तर पर भी प्रयास किए जा रहे हैं. पशु कल्याण बोर्ड (Animal Welfare Board of India) ने सामुदायिक जानवरों की देखभाल, नसबंदी, टीकाकरण और जिम्मेदार सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं. इनका उद्देश्य पशु कल्याण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाना है.
आगे का सपना
वर्षा राज का सपना एक आधुनिक पशु अस्पताल और बड़े पशु अभयारण्य की स्थापना करना है, जहां छोटे-बड़े सभी जानवरों को इलाज, पुनर्वास और सुरक्षित आश्रय मिल सके.
वह कहती हैं, “अगर आपके दिल में बेजुबानों के लिए जगह है तो पहला कदम उठाने से मत डरिए. शुरुआत छोटी होगी, मुश्किलें आएंगी, लेकिन बदलाव जरूर दिखाई देगा. किसी भी नेक काम में सबसे जरूरी चीज हिम्मत और धैर्य है.”
वर्षा राज की कहानी सिर्फ एक संस्था खड़ी करने की कहानी नहीं है. यह उस भरोसे की कहानी है जो बोल नहीं सकता, लेकिन महसूस किया जा सकता है. यह याद दिलाती है कि बड़े बदलाव हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं आते. कई बार वे एक कटोरी भोजन, समय पर मिले इलाज और एक इंसान के दृढ़ फैसले से शुरू होते हैं.



