AI के दौर में स्टार्टअप कैसे टिके रहेंगे? Kalaari Capital की वाणी कोला का जवाब – 'मकसद ही ताकत है'
TechSparks 2025 में Kalaari Capital की वाणी कोला ने फाउंडर्स से कहा कि अपनी महत्वाकांक्षाओं को सिर्फ रफ्तार से नहीं, बल्कि मकसद से जोड़ें. उन्होंने कहा कि असली ताकत तब आती है जब आपको यह साफ पता हो कि आप क्यों बना रहे हैं, किसके लिए बना रहे हैं, और लगातार बदलती तकनीकी दुनिया में कैसे आगे बढ़ना है.
TechSparks 2025 के मंच पर Kalaari Capital की मैनेजिंग डायरेक्टर वाणी कोला (Vani Kola) ने स्टार्टअप फाउंडर्स से एक खास अपील की. उन्होंने कहा कि उद्यमियों (ऑन्त्रप्रेन्योर्स) को सिर्फ स्पीड और वैल्यूएशन पर नहीं, बल्कि अपने मकसद (Purpose) पर ध्यान देना चाहिए—वही मकसद जो उन्हें हर बदलाव के दौर में टिकाए रखेगा.
वाणी कोला ने कहा, “मकसद के कई आयाम होते हैं. यह सिर्फ अपने भीतर के ‘बुद्ध’ को खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके कई हिस्सेदार भी हैं. आपको यह पूछना चाहिए कि आपकी कंपनी का मकसद क्या है—अपने उपभोक्ताओं, कर्मचारियों, निवेशकों और खुद आपके लिए.”
उन्होंने बताया कि उद्यमिता की यात्रा लंबी और कठिन होती है, और इसमें टिके रहने के लिए संतुलन और निरंतरता जरूरी है.
उन्होंने कहा, “अगर आप इन लयों (rhythms) को नहीं खोज पाएंगे, तो यह लंबी दौड़ पूरी करना मुश्किल होगा.”
भारत की टेक कंपनियों के निवेशकों की अग्रणी पंक्ति में शुमार वाणी कोला, जो YourStory की शुरुआती समर्थकों में से भी हैं, ने बताया कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति एक “कंप्रेशन इफेक्ट” (compression effect) लाती है. उन्होंने कहा, “AI समय को संकुचित कर रहा है. कंपनियां अब पहले से 3-5 गुना तेजी से बन रही हैं. ऐसे में आपको यह सोचना होगा कि आपकी कंपनी की ‘स्पीड टू वैल्यू’ क्या है और क्यों?”
वाणी कोला ने कहा कि मकसद को एक “अव्यावहारिक या भावनात्मक विचार” नहीं समझना चाहिए, बल्कि इसे स्पष्ट इरादे की तरह देखना चाहिए—जो तेज़ी से बदलती दुनिया में दिशा दिखाए.
उन्होंने आगे कहा, “हर युग नई तकनीकें लाता है. आपके पास कुछ खास तरह के बिज़नेस खड़े करने के मौके होते हैं. आपको उसी वक्त, उसी इन्फ्लेक्शन पॉइंट पर उन्हें पकड़ना होता है.”
उन्होंने लचीलापन (resilience) और दिशा (direction) को एक-दूसरे से जुड़ा बताया.
वाणी ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं कभी भी किसी चीज़ में स्प्रिंटर नहीं हो सकती... लेकिन मैं लंबी दौड़ पूरी कर सकती हूं, क्योंकि यह अपने आप को सही गति पर बनाए रखने और सांसों को संतुलित रखने का खेल है. यह बात स्टार्टअप्स के लिए भी उतनी ही सच है जितनी जिंदगी के लिए.”

Edited by रविकांत पारीक



