रोज़ 50 करोड़ की सवारी! जानिए कैसे Rapido ने Ola-Uber को दी टक्कर
Rapido भारत के राइड-हेलिंग बाजार में Ola और Uber को कड़ी टक्कर दे रही है. कंपनी रोज़ 5 मिलियन राइड्स कराती है और अब हर जिला मुख्यालय तक पहुंच चुकी है. अपने जीरो-कमीशन मॉडल और सस्ती सवारी के जरिए रैपिडो छोटे शहरों में नई मोबिलिटी क्रांति ला रही है.
भारत का राइड-हेलिंग बाजार काफी प्रतिस्पर्धी है. एक समय था जब ओला (Ola) और ऊबर (Uber) इस सेक्टर में लगभग एकाधिकार बना चुके थे. लेकिन ठीक उसी समय, रैपिडो (Rapido) ने एंट्री ली और अपने लो-कमीशन और बाद में जीरो-कमीशन मॉडल से पूरे बाजार को बदल दिया.
TechSparks 2025 के मंच पर Rapido के को-फाउंडर और सीईओ अरविंद संका (Aravind Sanka) ने YourStory और The Bharat Project की फाउंडर एवं सीईओ श्रद्धा शर्मा के साथ बातचीत में बताया कि अब इस सेक्टर में मुनाफे के दिन लौट आए हैं. उन्होंने कहा कि अब राइड-हेलिंग कंपनियां अपने ऑपरेशंस को लाभ में चला रही हैं.
रैपिडो की तेजी से बढ़ती ग्रोथ
रैपिडो आज औसतन हर दिन पांच मिलियन यानी पचास लाख राइड्स कराती है. कंपनी के साथ हर महीने करीब तीन मिलियन यानी तीस लाख ड्राइवर पार्टनर्स जुड़े हुए हैं.
अरविंद संका के अनुसार, कंपनी अब नए कैटेगरी में निवेश कर रही है. उन्होंने कहा कि रैपिडो अब एयरपोर्ट्स में अपनी सेवाएं शुरू कर रही है. साथ ही, लोग अभी तक नहीं जानते कि कंपनी के पास कैब सर्विस भी है.
संका ने कहा, “हम बैंगलोर में भी कैब सर्विस चला रहे हैं, लेकिन कई लोग इससे अनजान हैं. इसलिए हम जागरूकता पर निवेश कर रहे हैं.”
कंपनी अब देशभर के नए शहरों, कस्बों और गांवों में विस्तार की तैयारी कर रही है.

TechSparks 2025 के मंच पर Rapido के को-फाउंडर और सीईओ अरविंद संका
लॉजिस्टिक्स और फूड डिलीवरी में भी कदम
रैपिडो केवल यात्रियों को ही नहीं, बल्कि पार्सल डिलीवरी में भी मदद कर रही है. यूजर्स रैपिडो के दोपहिया और तिपहिया कैप्टन के नेटवर्क के जरिए पार्सल भेज सकते हैं. कंपनी अपने कैप्टन पार्टनर्स को क्विक कॉमर्स और फूड डिलीवरी कंपनियों के साथ भी जोड़ रही है ताकि वे इनकी लॉजिस्टिक जरूरतें पूरी कर सकें.
इसके अलावा, कंपनी बेंगलुरु में "Ownly" नाम से फूड डिलीवरी की टेस्टिंग भी कर रही है. संका ने बताया कि कंपनी ने इस क्षेत्र में अच्छा अवसर देखा है.
जीरो-कमीशन मॉडल ने बदला खेल
रैपिडो की सबसे बड़ी खासियत इसका जीरो-कमीशन मॉडल है. जब बड़ी कंपनियां ड्राइवरों से भारी कमीशन ले रही थीं, रैपिडो ने इसे बदल दिया. कंपनी ड्राइवरों से सिर्फ 20 से 30 रुपये का डेली शुल्क लेती है. इसके बाद ग्राहक से मिलने वाला सारा पैसा सीधे ड्राइवर को जाता है.
संका ने बताया कि अगर एक राइड का औसत किराया 100 रुपये माना जाए, तो रैपिडो के ड्राइवर पार्टनर रोज़ाना करीब 50 करोड़ रुपये कमा रहे हैं.
उन्होंने कहा, “जब हमने शुरुआत की, तब बड़ी कंपनियों के नाम जरूर बड़े थे, लेकिन उनका असली स्केल बहुत छोटा था. हमने देखा कि असली बाजार अब भी खाली था, खासकर छोटे शहरों में.”

TechSparks 2025 के मंच पर YourStory और The Bharat Project की फाउंडर एवं सीईओ श्रद्धा शर्मा के साथ बातचीत के दौरान Rapido के को-फाउंडर और सीईओ अरविंद संका
छोटे शहरों में बड़ा विस्तार
रैपिडो अब टियर II, III और IV शहरों में तेजी से विस्तार कर रही है. संका ने कहा, “हम अब सिर्फ टॉप 10 शहरों पर ध्यान नहीं दे रहे. हम देश के हर जिला मुख्यालय तक पहुंच चुके हैं, झांसी से लेकर सिलीगुड़ी तक.”
उन्होंने बताया कि छोटे शहरों में बेरोजगारी दर अधिक होने के कारण ड्राइवर मिलना आसान है, और इन शहरों में सस्ती सवारी की मांग भी बहुत ज्यादा है.
संका ने कहा, “हम सिर्फ टॉप 5 या 10 मिलियन लोगों के लिए नहीं बना रहे. हम भारत के अगले 500 मिलियन लोगों के लिए समाधान बना रहे हैं.”
हर शहर में समान पैठ
दिलचस्प बात यह है कि रैपिडो की पैठ हर शहर में लगभग समान है. चाहे शहर की आबादी 10 लाख हो या 1 करोड़, रैपिडो के सक्रिय यूजर्स का प्रतिशत लगभग बराबर है.
संका ने बताया कि कंपनी का मकसद सभी के लिए सस्ती और सुविधाजनक सवारी उपलब्ध कराना है. कई शहरों में रैपिडो के जरिए रोज़ इतनी सवारियां होती हैं जितनी वहां के मेट्रो सिस्टम में भी नहीं होतीं.
उन्होंने कहा, “हमारे बहुत से ग्राहक वही लोग हैं जो मेट्रो में भी सफर करते हैं. हम सबके लिए समाधान बना रहे हैं.”
कंपनी का कहना है कि उसके कई ड्राइवर छात्र, शिक्षक या पार्ट-टाइम काम करने वाले लोग हैं. कंपनी का लक्ष्य अब अधिक से अधिक महिला ड्राइवरों को भी अपने प्लेटफॉर्म पर लाना है.
संका ने कहा, “भारत में जहां सार्वजनिक परिवहन अभी भी सीमित है, हम सिर्फ लोगों की यात्रा आसान बना रहे हैं. जब आवाजाही आसान होती है, तो विकास अपने आप आता है.”

Edited by रविकांत पारीक



