कैसे बिहार में महिलाओं का जीवन संवार रहा है तेजस्विनी का MurariJyoti Welfare Foundation
लंदन से पढ़ाई कर बिहार लौटी तेजस्विनी ने महिलाओं से स्वास्थ्य पर बातचीत शुरू की. इसी से MurariJyoti Welfare Foundation (MJWF) की शुरुआत हुई. आज संस्था 3,500 लोगों तक पहुंच चुकी है. यह मासिक धर्म, डायबिटीज, हाइपरटेंशन और सर्वाइकल कैंसर पर काम करती है.
बिहार के एक छोटे से समुदाय में महिलाओं से बातचीत करते हुए तेजस्विनी ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन यही बातचीत एक पूरी संस्था की दिशा तय करेगी. शुरुआत मासिक धर्म से हुई. फिर महिलाओं ने अपनी दूसरी परेशानियां बताईं. आशा कार्यकर्ताओं ने गांवों की जरूरतों के बारे में बताया. सवाल बढ़ते गए और उनके साथ काम का दायरा भी.
आज MurariJyoti Welfare Foundation (MJWF) करीब 3,500 लोगों तक पहुंच चुका है. संस्था करीब 1,500 महिलाओं के साथ काम कर रही है और 500 से अधिक menstrual cups बांट चुकी है. लेकिन इस सफर की खास बात आंकड़े नहीं हैं. खास बात यह है कि यह काम किसी बड़े प्रोजेक्ट या फंडिंग के साथ शुरू नहीं हुआ. यह एक बातचीत से शुरू हुआ था.
बिहार में महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को समझने के लिए ऐसे प्रयासों की अपनी अहमियत है. ऐसे में बिहार सरकार की ओर से स्वास्थ्य और जागरूकता को लेकर किए जा रहे प्रयासों के साथ तेजस्विनी जैसी जमीनी स्तर पर काम करने वाली महिलाएं भी बदलाव की इस कोशिश को आगे बढ़ा रही हैं.
इसी सिलसिले में YourStory ने हाल ही में MurariJyoti Welfare Foundation (MJWF) की फाउंडर तेजस्विनी से बातचीत की. उन्होंने बताया कि गांवों और छोटे समुदायों में महिलाओं से सीधे बात करके उनकी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को समझना और उन्हें सही जानकारी देना कितना जरूरी है.
एक सवाल ने बदली ज़िंदगी
तेजस्विनी का सामाजिक काम किसी एक दिन लिया गया फैसला नहीं था. इसकी शुरुआत उनके बचपन से हुई.
बिहार और दार्जिलिंग के बोर्डिंग स्कूलों में उनका बचपन बीता. परिवार ने उन्हें अपनी पसंद चुनने और सवाल पूछने की आजादी दी. शरीर और मन को समझना, ध्यान, खेल और पढ़ाई उनकी परवरिश का हिस्सा रहे.
करीब 12-13 साल की उम्र में एक घटना ने उनकी सोच बदल दी. घर में काम करने वाली एक महिला की बेटी घरेलू हिंसा से परेशान होकर मदद मांगने आई. तेजस्विनी ने अपनी मां से कहा कि उसे घर में रख लिया जाए.
मां ने उनसे एक सवाल पूछा — अगर वह किसी की जिंदगी बदलना चाहती हैं, तो उनके पास ऐसा करने की कितनी ताकत है?
उस समय तेजस्विनी इस सवाल को पूरी तरह नहीं समझ पाईं. लेकिन उम्र बढ़ने के साथ इसका मतलब साफ होता गया.
तेजस्विनी कहती हैं, “किसी को सशक्त करने के लिए सिर्फ सहानुभूति काफी नहीं होती. आपके पास ज्ञान, समझ, संसाधन और क्षमता भी होनी चाहिए. अगर आप किसी के साथ खड़े होते हैं, तो इतना सक्षम होना जरूरी है कि जरूरत पड़ने पर उसके जीवन में वास्तविक बदलाव ला सकें.”

लंदन से की साइकोलॉजी की पढ़ाई
तेजस्विनी ने Mass Media की पढ़ाई की. लॉकडाउन के दौरान जब वह करीब एक साल परिवार के साथ रहीं, तो अपने आसपास मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं देखीं. उन्हें लगा कि लोग परेशान तो हैं, लेकिन अपनी परेशानी के बारे में बात नहीं कर पा रहे.
यहीं से साइकोलॉजी (Psychology) को गंभीरता से पढ़ने की इच्छा पैदा हुई. उन्होंने University of Essex से साइकोलॉजी में MSc किया.
इसके बाद लंदन में उन्होंने महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े मामलों में काम किया. Independent Domestic Violence Advocate के रूप में उन्होंने घरेलू हिंसा और दूसरी जटिल परिस्थितियों से गुजर रही महिलाओं के साथ काम किया.
इस दौरान डॉक्टर, पुलिस, स्कूल, स्वास्थ्य सेवाओं और इमिग्रेशन से जुड़े लोगों के साथ भी काम करना पड़ा.
इस अनुभव ने उन्हें यह समझने में मदद की कि महिला की सुरक्षा और स्वास्थ्य को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता.
तेजस्विनी बताती हैं, “वहां महिलाओं की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन कई सवाल एक जैसे थे. एक महिला कितनी सुरक्षित है, वह अपने शरीर को कितना समझती है और अपने जीवन के फैसले खुद कितने ले सकती है.”
बिहार लौटकर 1 कप से हुई शुरुआत
2023 में बिहार लौटने के बाद तेजस्विनी की मुलाकात घर में काम करने वाली महिला सजनी से हुई. बातचीत मासिक धर्म तक पहुंची. इसी दौरान menstrual cup का जिक्र आया.
सजनी ने पहली बार इसके बारे में सुना था. बाद में उसने अपनी बेटी के लिए भी menstrual cup मांगा.
तेजस्विनी के लिए यह एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण अनुभव था. उन्हें महसूस हुआ कि उनके लिए सामान्य जानकारी किसी दूसरी महिला के लिए बिल्कुल नई हो सकती है.
उन्होंने इसके बाद आशा कार्यकर्ताओं से बातचीत शुरू की. फिर एक पायलट रिसर्च स्टडी हुई. धीरे-धीरे MJWF के काम की नींव तैयार हुई.
शुरुआत में तेजस्विनी लंदन में नौकरी करती रहीं. संस्था का खर्च अपनी कमाई से उठाया. उनका कहना था कि पहले यह समझना जरूरी है कि समुदाय को वास्तव में किस चीज की जरूरत है.
मार्च 2026 में वह भारत लौट आईं और MJWF से पूर्णकालिक रूप से जुड़ गईं. जुलाई 2026 में संस्था को Goonj का Grassroots Award भी मिला.
आज MJWF के साथ University of Essex और UK की हेल्थ इनोवेशन कंपनी 10zyme के अलावा भागलपुर मेडिकल कॉलेज और बिहपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी साझेदार के तौर पर जुड़े हैं.

जरूरत ने रास्ता दिखाया
MJWF का काम मासिक धर्म तक नहीं रुका. आशा कार्यकर्ताओं ने स्कूलों में लड़कियों के साथ बातचीत की जरूरत बताई. इसके बाद लड़कों को भी मासिक धर्म और महिलाओं की सेहत के बारे में समझाने की कोशिश हुई.
फिर समुदाय ने कुछ और समस्याएं देखी. लोगों ने डायबिटीज (diabetes), हाइपरटेंशन (hypertension) और सर्वाइकल कैंसर (cervical cancer) की शिकायतें बताईं.
इसके बाद NCD health camps शुरू हुए. लोगों की मुफ्त जांच की गई. उन्हें सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली मुफ्त दवाओं और सेवाओं की जानकारी दी गई.
तेजस्विनी कहती हैं कि MJWF में काम का विस्तार किसी तय योजना के मुताबिक नहीं हुआ. वह आगे बताती हैं, “एक जरूरत दूसरी जरूरत तक ले गई. समुदाय ने हमें बताया कि डायबिटीज और हाइपरटेंशन भी बड़ी समस्या हैं. फिर स्वास्थ्य शिविर शुरू हुए. हमें यह भी पता चला कि कई लोगों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाओं की सुविधा के बारे में जानकारी ही नहीं थी.”
भरोसा सबसे जरूरी
ग्रामीण इलाकों में काम करते हुए सबसे बड़ी चुनौती संसाधन नहीं, भरोसा था.
शुरुआत में लोग पूछते थे कि बाहर से कोई उनके बीच क्यों आ रहा है. महिलाओं की सेहत और शरीर जैसे विषयों पर बात करना आसान नहीं था.
टीम ने जल्दबाजी नहीं की. वह बार बार समुदाय के बीच जाती रही. कई महीनों बाद लोग उन्हें पहचानने लगे. बातचीत आसान हुई और भरोसा मजबूत हुआ.
अब स्थिति बदल रही है. कई जगह लोग खुद अपनी अगली जरूरत के बारे में पूछने लगे हैं.
तेजस्विनी के मुताबिक, यही किसी भी सामाजिक संस्था के लिए अहम पड़ाव है. जब समुदाय किसी बाहरी व्यक्ति के आने का इंतजार करने के बजाय खुद सवाल उठाने लगे.
अब शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता पर फोकस
अब MJWF स्वास्थ्य के साथ महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता के अवसरों पर भी विचार कर रहा है.
लेकिन तेजस्विनी किसी तय मॉडल को समुदाय पर लागू नहीं करना चाहतीं. उनका तरीका पहले समस्या को समझने का है. फिर रिसर्च. उसके बाद समाधान.
तेजस्विनी कहती हैं, “मैं यह तय नहीं करना चाहती कि किसी समुदाय का भविष्य कैसा होना चाहिए. मेरी कोशिश है कि पहले लोगों को सुना जाए, फिर समस्या को समझने के लिए रिसर्च की जाए और उसके बाद वही बनाया जाए जिसकी सच में जरूरत है.”
यही पहलू MJWF की कहानी को बाकी सामाजिक संस्थाओं से थोड़ा अलग बनाता है. यह किसी बड़े रोडमैप से शुरू नहीं हुआ. कोई तैयार मॉडल नहीं था. एक बातचीत थी, कुछ सवाल थे और उन्हें सुनने की इच्छा थी.
आज उन सवालों का दायरा बड़ा हो चुका है. मासिक धर्म से लेकर NCDs तक. स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा और रोजगार तक.
लेकिन मूल विचार वही है. पहले सुनो. फिर समझो. उसके बाद काम करो.
तेजस्विनी के लिए सफलता शायद उस दिन नहीं होगी जब MJWF सबसे ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा. वह दिन ज्यादा महत्वपूर्ण होगा जब समुदाय अपनी जरूरतें खुद पहचानने लगेगा और अपने फैसले खुद लेने की स्थिति में होगा.
अंत में तेजस्विनी कहती हैं, “अगर किसी दिन उन्हें हमारी जरूरत न पड़े, तो शायद वही हमारे काम की सबसे बड़ी सफलता होगी.”
शायद एक सामाजिक संस्था के लिए इससे बेहतर मंजिल भी कोई नहीं हो सकती.



