पीरियड्स पर निकाली Pad Yatra, अब मशरूम की खेती से महिलाओं को बना रहीं आत्मनिर्भर — डॉ. सुरभि कुमारी की कहानी
कभी पत्रकार रहीं डॉ. सुरभि कुमारी आज बिहार के गांवों में PeriodShaala, Pad Yatra और मशरूम खेती के जरिए महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और आजीविका को नई दिशा दे रही हैं. जानिए कैसे उनकी पहल ने हजारों महिलाओं और किशोरियों की जिंदगी में बदलाव की नई कहानी लिखी.
बिहार के गांवों में अब मासिक धर्म को लेकर जागरूकता की नई शुरुआत दिखाई देने लगी है. कई महिलाएं और किशोरियां खुलकर पीरियड्स पर बात कर रही हैं, सही जानकारी हासिल कर रही हैं और इससे जुड़ी पुरानी झिझक को पीछे छोड़ रही हैं. इस बदलाव के पीछे कुछ ऐसे लोगों की लगातार कोशिशें हैं, जिन्होंने गांव-गांव जाकर संवाद शुरू किया और मासिक धर्म को स्वास्थ्य और सम्मान से जोड़ने का संदेश दिया. इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए महिलाओं को मशरूम की खेती से जोड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का अभियान भी चलाया जा रहा है. यह केवल एक सामाजिक पहल नहीं, बल्कि जागरूकता, सम्मान और आत्मनिर्भरता की नई सोच को मजबूत करने की कोशिश है.
यह बदलाव जिन लोगों की सतत कोशिशों से संभव हो रहा है, उनमें एक प्रमुख नाम डॉ. सुरभि कुमारी का भी है.
डॉ. सुरभि कुमारी, जो (MicroX Foundation) की को-फाउंडर हैं, कभी पत्रकारिता से जुड़ी थीं. आज वह बिहार के गांवों में महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और आजीविका को एक साथ जोड़ते हुए बदलाव की नई कहानी लिख रही हैं. पीरियड्स पर खुली बातचीत से लेकर मशरूम की खेती के जरिए महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने तक, उनकी पहल समाज में जागरूकता और सशक्तिकरण की नई मिसाल बन रही है.
उनकी यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब भारत में मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर स्थिति में सुधार तो हुआ है, लेकिन चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार देश में 15-24 वर्ष की लगभग 78 प्रतिशत युवतियां सुरक्षित मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों का उपयोग करती हैं. हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और उपलब्धता दोनों अब भी बड़ी चुनौती हैं.
पत्रकारिता से समाज सेवा तक का सफर
डॉ. सुरभि कुमारी (Dr. Surbhi Kumari) का जन्म बिहार के गया जिले के एक साधारण संयुक्त परिवार में हुआ. परिवार बड़ा था और आर्थिक संसाधन सीमित. उनके दादा सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हो चुके थे और उसी आय से पूरे परिवार का खर्च चलता था. कठिन परिस्थितियों के बावजूद परिवार ने शिक्षा को सबसे बड़ा निवेश माना. यही सोच उनके व्यक्तित्व की नींव बनी.
गया के नाज़रेथ अकादमी से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पटना विमेंस कॉलेज से कम्युनिकेटिव इंग्लिश एंड मीडिया स्टडीज में स्नातक किया. इसके बाद पत्रकारिता एवं जनसंचार में परास्नातक और फिर महिलाओं के स्वास्थ्य एवं मासिक धर्म जागरूकता विषय पर शोध करते हुए पीएचडी पूरी की.
पत्रकारिता के दौरान उन्होंने अनेक सामाजिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग की. लोगों की समस्याएं सुनीं और उनकी कहानियां देश के सामने रखीं. लेकिन समय के साथ उन्हें एहसास हुआ कि केवल समस्याओं को लिखना पर्याप्त नहीं है, समाधान का हिस्सा बनना भी जरूरी है.
YourStory से बातचीत में डॉ. सुरभि कहती हैं, “पत्रकारिता ने मुझे लोगों की जिंदगी को करीब से देखने का अवसर दिया. लेकिन एक समय ऐसा आया जब लगा कि केवल समस्याएं लिखने से बदलाव नहीं आएगा. मैं उन लोगों के बीच रहकर काम करना चाहती थी जिनकी कहानियां मैं लिखती थी. तभी तय किया कि अब कलम के साथ जमीन पर भी काम करना है.”
कोविड-19 महामारी के दौरान वह अपने घर गया लौटीं. यहीं ग्रामीण महिलाओं से बातचीत के दौरान उन्हें पता चला कि मासिक धर्म के दौरान कई महिलाएं चार-पांच दिन तक खेतों में काम नहीं करती थीं. वजह केवल सैनिटरी पैड की कमी नहीं थी, बल्कि जानकारी का अभाव और सामाजिक झिझक भी उतनी ही बड़ी समस्या थी.
यही अनुभव उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गया.

पीरियड्स पर चुप्पी तोड़ने से लेकर मशरूम की खेती तक, डॉ. सुरभि कुमारी की पहल बिहार में ग्रामीण महिलाओं को स्वास्थ्य, सम्मान और आत्मनिर्भरता की नई राह दिखा रही है.
गांवों में पीरियड्स पर चुप्पी तोड़ने की शुरुआत
डॉ. सुरभि ने गांवों में मासिक धर्म जागरूकता सत्र शुरू किए. लेकिन शुरुआत बिल्कुल आसान नहीं थी.
कई बार माताएं अपनी बेटियों को कार्यक्रम के बीच से घर ले जाती थीं. कुछ पुरुष अपनी पत्नियों को यह कहकर वापस बुला लेते थे कि ऐसे विषयों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं होनी चाहिए.
तब उन्हें समझ आया कि सबसे बड़ी समस्या जानकारी की कमी नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही चुप्पी है.
यहीं से PeriodShaala, SABLA और Pad Yatra जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत हुई. इन पहलों का उद्देश्य केवल लड़कियों को जानकारी देना नहीं था, बल्कि परिवार, शिक्षक, पुरुष और पूरे समुदाय को इस संवाद का हिस्सा बनाना था.
गांवों में निकाली जाने वाली पदयात्राएं लोगों को जोड़ती हैं. इसके बाद नुक्कड़ नाटक, सामुदायिक बैठकें और खुले संवाद के जरिए मासिक धर्म से जुड़े मिथकों पर चर्चा होती है.
UNICEF भी मानता है कि मासिक धर्म केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं है. यह शिक्षा, गरिमा, समान अवसर और महिलाओं की भागीदारी से भी जुड़ा हुआ है. विशेषज्ञों के अनुसार जब पुरुष और परिवार इस बातचीत का हिस्सा बनते हैं, तभी सामाजिक व्यवहार में स्थायी बदलाव आता है.
डॉ. सुरभि कहती हैं, “शुरुआत में लोग कहते थे कि पीरियड्स पर बात करना गलत है. लेकिन हमने हार नहीं मानी. हमें समझ आया कि बदलाव केवल लड़कियों से नहीं आएगा. परिवार, पुरुष, शिक्षक और पूरा समाज साथ आएगा तभी चुप्पी टूटेगी. आज वही गांव खुलकर बातचीत कर रहे हैं. यही हमारी सबसे बड़ी सफलता है.”
कई गांवों में उन्हें ऐसी महिलाएं मिलीं जिन्होंने जीवन में पहली बार सैनिटरी पैड देखा था. तब उनकी टीम ने केवल जागरूकता तक सीमित न रहकर स्थानीय स्तर पर सैनिटरी पैड की उपलब्धता और उससे जुड़े आजीविका मॉडल पर भी काम शुरू किया.
जब जागरूकता बनी बदलाव की सबसे बड़ी ताकत
डॉ. सुरभि मानती हैं कि किसी भी सामाजिक पहल की सफलता केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि लोगों के व्यवहार में आए बदलाव से मापी जानी चाहिए.
पिछले कुछ वर्षों में उनकी टीम बिहार के विभिन्न जिलों में 30,000 से अधिक महिलाओं और 10,000 से ज्यादा किशोरियों तक मासिक धर्म स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पहुंचा चुकी है.
लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि आंकड़े नहीं, बल्कि सोच में आया बदलाव है.
एक पदयात्रा के दौरान गांव के कई लड़के सैनिटरी पैड हाथ में लेने तक से झिझक रहे थे. उन्हें लगता था कि यह केवल महिलाओं की चीज है. कुछ समय बाद वही लड़के हाथों में सैनिटरी पैड लेकर पूरे गांव में जागरूकता अभियान का हिस्सा बने और लोगों को समझाने लगे कि मासिक धर्म एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है.
डॉ. सुरभि कहती हैं, “हम अक्सर सोचते हैं कि मासिक धर्म केवल महिलाओं का विषय है. लेकिन ऐसा नहीं है. जब लड़के, पिता, शिक्षक और परिवार इस बातचीत का हिस्सा बनते हैं, तभी असली बदलाव आता है. मैंने अपनी आंखों से देखा है कि जो बच्चे पहले सैनिटरी पैड छूने से भी झिझकते थे, वही बाद में पूरे गांव में जागरूकता फैलाने लगे.”
एक घटना आज भी उन्हें भावुक कर देती है.
एक महिला ने बताया कि वह मासिक धर्म के दौरान जानबूझकर स्नान नहीं करती थी. उसे लगता था कि शरीर से आने वाली दुर्गंध उसके पति को उससे दूर रखेगी.
कई काउंसलिंग सत्रों के बाद उसने न केवल सही मासिक धर्म स्वच्छता अपनाई, बल्कि अपने स्वास्थ्य, अधिकार और आत्मसम्मान के बारे में भी खुलकर बात करना शुरू किया.

PeriodShaala और Pad Yatra के जरिए डॉ. सुरभि कुमारी गांव-गांव जाकर मासिक धर्म को लेकर फैली झिझक और मिथकों को दूर कर रही हैं.
मशरूम की खेती से महिलाओं को मिली नई पहचान
SumArth की पहचान केवल पीरियड्स जागरूकता तक सीमित नहीं है.
संगठन की शुरुआत ही महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के उद्देश्य से हुई थी. इसके लिए टीम ने मशरूम की खेती को चुना.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार मशरूम उत्पादन कम जगह, कम लागत और कम समय में शुरू किया जा सकता है. यही वजह है कि इसे महिला स्वयं सहायता समूहों और छोटे किसानों के लिए आय बढ़ाने वाले प्रभावी मॉडल के रूप में देखा जाता है.
डॉ. सुरभि और उनकी टीम ने स्थानीय स्तर पर बांस और कुशा घास से बने कम लागत वाले जलवायु-अनुकूल मशरूम हट तैयार किए. ये प्राकृतिक रूप से तापमान और नमी बनाए रखते हैं, जिससे बिजली पर निर्भरता कम होती है और सालभर उत्पादन संभव हो पाता है.
संगठन केवल प्रशिक्षण नहीं देता, बल्कि महिलाओं को तकनीकी सहायता, बाजार और उद्यमिता से भी जोड़ता है.
इस पहल से जुड़ी सबसे प्रेरक कहानियों में से एक है लालसा देवी की.
महादलित समुदाय से आने वाली लालसा देवी के पास रहने के लिए पक्का घर तक नहीं था. SumArth की मदद से उन्होंने जलवायु-अनुकूल मशरूम हट बनाया, प्रशिक्षण लिया और मशरूम उत्पादन शुरू किया.
आज वह नियमित आय अर्जित कर रही हैं और अपने गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं.
डॉ. सुरभि कहती हैं, “जब किसी महिला की पहली कमाई उसके अपने हाथ में आती है, तो केवल उसकी आर्थिक स्थिति नहीं बदलती, उसका आत्मविश्वास भी बदलता है. परिवार में उसकी बात सुनी जाने लगती है. हमारे लिए मशरूम की खेती केवल रोजगार नहीं, बल्कि महिलाओं को सम्मान और पहचान देने का माध्यम है.”
स्वास्थ्य, सम्मान और आजीविका का साझा सपना
डॉ. सुरभि मानती हैं कि सबसे बड़ी चुनौती आज भी संसाधनों की कमी है.
कई स्कूल, पंचायतें और सरकारी संस्थान उनके संगठन को आमंत्रित करना चाहते हैं, लेकिन सीमित फंडिंग के कारण हर जगह पहुंचना संभव नहीं हो पाता.
उनका मानना है कि सामाजिक बदलाव किसी एक कार्यशाला से नहीं आता. इसके लिए समुदाय के साथ लंबे समय तक लगातार संवाद बनाए रखना पड़ता है.
आने वाले वर्षों में उनकी योजना PeriodShaala, SABLA और Pad Yatra को बिहार से आगे दूसरे राज्यों तक ले जाने की है. साथ ही हजारों महिलाओं को जलवायु-अनुकूल मशरूम खेती से जोड़ना उनका लक्ष्य है.
वह ऐसा मॉडल विकसित करना चाहती हैं जिसे भविष्य में दूसरे संगठन और सरकारी संस्थान भी अपनाएं. इसी उद्देश्य से उनकी टीम शोध और दस्तावेजीकरण पर भी विशेष ध्यान दे रही है.
डॉ. सुरभि कहती हैं, “मेरा सपना है कि ऐसा समाज बने जहां कोई लड़की पीरियड्स की वजह से स्कूल न छोड़े, कोई महिला जानकारी के अभाव में अपनी सेहत से समझौता न करे और हर ग्रामीण महिला के पास सम्मानजनक आजीविका का अवसर हो. जब स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता साथ चलते हैं, तभी समाज में स्थायी बदलाव आता है.”
वर्ल्ड बैंक भी मानता है कि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ने से केवल परिवारों की आय नहीं बढ़ती, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था, शिक्षा और सामाजिक विकास पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
आज जब ग्रामीण भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर नई चर्चा हो रही है, तब डॉ. सुरभि कुमारी का सफर एक महत्वपूर्ण संदेश देता है.
बदलाव हमेशा बड़ी योजनाओं से नहीं आता. कभी इसकी शुरुआत एक सवाल से होती है. कभी एक खुली बातचीत से. कभी गांव की गलियों में निकली एक पदयात्रा से. और कभी एक छोटे से मशरूम हट से.
यही छोटे-छोटे कदम मिलकर हजारों महिलाओं की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाते हैं. यही SumArth की सबसे बड़ी कहानी है.




