The Road to 2026: ऑटोमेशन बनाएगा भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब
भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एक निर्णायक मोड़ पर है. ग्लोबल सप्लाई चेन बदलाव के दौर में ऑटोमेशन, AI और स्मार्ट फैक्ट्रियां भारत को 2026 तक भरोसेमंद ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बना सकती हैं. लो-कॉस्ट से कैपेबिलिटी-ड्रिवन ग्रोथ की यह कहानी बड़े कॉर्पोरेट्स की रणनीति पर टिकी है.
भारत का मैन्युफैक्चरिंग फेज अब एक बहुत अहम मोड़ पर खड़ा है. आज जब पूरी दुनिया अपनी सप्लाई चेन के लिए किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय एक सेफ ऑप्शन की तलाश कर रही है और खरीदार केवल कम कीमत के बजाय भरोसेमंद पार्टनर को प्रायोरिटी दे रहे हैं, तब भारत के पास ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का बड़ा मौका है.
भारत की यह काबिलियत केवल उसकी इच्छाशक्ति से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि वह अपनी प्लानिंग को ग्राउंड पर कितनी सटीकता से लागू करता है. बड़ी भारतीय कंपनियों के लिए आने वाले दो साल इस एक सवाल पर टिके होंगे कि वे अपने कारखानों और काम करने के तौर-तरीकों में 'ऑटोमेशन' को किस लेवल तक शामिल कर पाती हैं.
लो-कॉस्ट से लॉन्ग-टर्म मैन्युफैक्चरिंग तक
अब ऑटोमेशन सिर्फ काम को आसान बनाने का जरिया नहीं रह गया है, बल्कि दुनिया भर के मार्केट में अपनी जगह बनाए रखने की सबसे जरूरी बुनियाद बन गया है.
भारत में मैन्युफैक्चरिंग की सफलता हमेशा से सस्ती मजदूरी और कम लागत पर टिकी रही है, लेकिन अब यह पुराना तरीका धीरे-धीरे अपनी चमक खो रहा है. इसकी वजह यह है कि हमारे ग्लोबल कंपटीटर अब रोबोटिक्स, एआई (AI) और डिजिटल फैक्ट्रियों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे उन्हें अब सस्ती लेबर की जरूरत नहीं रह गई है. अगर इंडियन मैन्युफैक्चरर्स को 2026 तक ग्लोबल लेवल पर मुकाबला करना है, तो उन्हें केवल "कम लागत" के भरोसे रहने के बजाय अपनी "काबिलियत" बढ़ानी होगी. उन्हें ऐसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा जहां ऑटोमेशन के जरिए काम में पूरी सटीकता, एक जैसा तालमेल और बड़े पैमाने पर तेज रफ्तार हासिल की जा सके.
बड़ी कंपनियों के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि वे ऑटोमेशन को केवल छोटे-मोटे या अलग-अलग प्रोजेक्ट्स तक सीमित न रखें. इसके बजाय, उन्हें एक ऐसी बडी ऑटोमेशन स्ट्रेटजी अपनाने की जरूरत है जो पूरी कंपनी के हर लेवल पर लागू हो. इसका मतलब है कि कारखाने के शॉप फ्लोर से लेकर सप्लाई चेन, क्वालिटी चेक करने के सिस्टम और यहां तक कि बड़े फैसले लेने की प्रक्रिया को भी ऑटोमेशन के साथ जोड़ दिया जाए.
'स्मार्ट फैक्ट्रियां' बनाना अब ऑप्शनल नहीं
आज के दौर में 'स्मार्ट फैक्ट्रियां' बनाना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक मजबूरी बन चुका है. दुनियाभर में स्मार्ट फैक्ट्रियां अब बेसलाइन बन गई हैं. रोबोटिक्स, मशीन विजन (कैमरे से निगरानी), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) सेंसर और एआई (AI) बेस्ड डेटा एनालिसिस जैसी मॉडर्न टेक्नोलॉजी ही अब तय करती हैं कि कोई कंपनी कितनी बेहतर है. ये सिस्टम इतने स्मार्ट होते हैं कि वे मशीनों में खराबी आने से पहले ही उसकी जानकारी दे देते हैं (प्रिडिक्टिव मेंटेनेंस), क्वालिटी की जांच खुद-ब-खुद कर लेते हैं और जरूरत पड़ने पर प्रॉडक्ट लाइन में बहुत तेजी से बदलाव करने में सक्षम होते हैं.
ऐसी बड़ी भारतीय कंपनियां जिनके कई कारखाने अलग-अलग जगहों पर चल रहे हैं, उनके लिए ऑटोमेशन एक वरदान की तरह है. इसकी मदद से वे हर प्लांट में एक जैसा काम और हाई स्टैंडर्ड सुनिश्चित कर सकती हैं, चाहे वह प्लांट कहीं भी हो या वहां काम करने वाले लोग अलग हों. इंटरनेशनल लेवल पर बड़े कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने और दूसरे देशों के साथ लंबे समय तक एक्सपोर्ट के रिलेशन बनाए रखने के लिए यह बहुत जरूरी है कि आपका सामान हर बार एक जैसा और अच्छी क्वालिटी का हो.

सांकेतिक चित्र
ऑटोमेशन का सबसे बड़ा फायदा
ऑटोमेशन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह काम में 'एक जैसापन और बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन' सुनिश्चित करता है. दुनिया भर के खरीदार हमेशा यही चाहते हैं कि उन्हें बड़ी मात्रा में मिलने वाला हर सामान एक ही क्वालिटी का हो. भारत के सामने लंबे समय से यह चुनौती रही है कि अलग-अलग फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान की क्वालिटी में थोड़ा-बहुत अंतर आ जाता था. ऑटोमेशन इस समस्या को जड़ से खत्म कर देता है. यह काम करने के तरीकों को एक जैसा बना देता है, इंसानी गलतियों की गुंजाइश को कम करता है और यह पक्का करता है कि हर बार प्रोडक्शन बिल्कुल एक जैसा हो.
इसके साथ ही, ऑटोमेशन का एक बड़ा फायदा यह है कि इसकी मदद से कंपनियां बिना मैनपावर बढ़ाए अपना प्रोडक्शन बढ़ा सकती हैं. इससे प्रोडक्टिविटी बढ़ती है और फैक्ट्रियों में सेफ्टी का लेवल भी बेहतर होता है. इतना ही नहीं, ऑटोमेशन की वजह से लेबर की कमी या हड़ताल जैसी समस्याओं के कारण काम रुकने का डर भी कम हो जाता है. आजकल ग्लोबल पार्टनर्स इस चीजों की भी स्क्रूटनी कर रहे हैं.
डिसीजन ऑटोमेशन और AI-समर्थित मैन्युफैक्चरिंग
ऑटोमेशन का अगला पड़ाव अब सिर्फ मशीनों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब फैसले लेने की प्रक्रिया में भी एआई (AI) का इस्तेमाल हो रहा है. एआई बेस्ड डिसीजन अब ऑटोमेशन मैन्युफैक्चरिंग के तरीके को पूरी तरह बदल रहा है. अब कंपनियां समस्या आने के बाद उसका हल नहीं ढूंढती, बल्कि समस्या आने से पहले ही उसका अंदाजा लगा लेती हैं. मशीनों से भविष्य में होने वाली डिमांड का अनुमान लगाना, प्रोडक्शन का सही समय तय करना और स्टॉक (इन्वेंट्री) को सही तरीके से मैनेज करना अब बहुत आसान हो गया है. अगर मार्केट में अचानक कोई बदलाव आए या सप्लाई चेन में कोई रुकावट हो, तो कंपनियां बहुत तेजी से अपना फैसला बदल सकती हैं.
ऐसी बड़ी कंपनियां जो कई देशों में फैली अपनी कॉम्प्लैक्स सप्लाई चेन को मैनेज करती हैं, उनके लिए डिसीजन ऑटोमेशन एक यूनिफाइड इंटेलिजेंस की तरह काम करता है. यह टेक्नोलॉजी सामान की खरीदारी (प्रोक्योरमेंट), प्रोडक्शन, लॉजिस्टिक्स और सेल जैसे अलग-अलग डिपार्टमेंट को एक सूत्र में पिरो देती है. ग्लोबल लेवल पर बड़े टेंडर हासिल करने के लिए यह काबिलियत बहुत जरूरी हो गई है. ये कंपनियों को दूसरों से ज्यादा स्मार्ट और भरोसेमंद बनाती है.
ऑटोमेशन और वर्क फोर्स ट्रांसफॉर्मेशन
अक्सर ऑटोमेशन को नौकरियों के लिए एक खतरे के रूप में देखा जाता है, लेकिन असलियत में यह सिर्फ काम करने के तरीकों और रोल में एक बदलाव है. जब मशीनों के जरिए बार-बार किए जाने वाले काम खुद होने लगते हैं, तो वर्कफोर्स की जरूरत मशीनों की निगरानी करने, डेटा का एनालिसिस करने और काम को और बेहतर बनाने के लिए होती है. भारतीय बड़ी कंपनियों के लिए अब यह जरूरी है कि वे अपने कर्मचारियों को नई टेक्नोलॉजी सिखाने (Upskilling) में इनवेस्ट करें, ताकि उनके एम्प्लॉई ऑटोमेटिक सिस्टम के साथ मिलकर काम कर सकें.
जो कंपनियां ऑटोमेशन को अपनाने के साथ-साथ अपने एम्प्लॉयीज के स्किल पर भी ध्यान देती हैं, उन्हें सबसे ज्यादा फायदा होता है. इससे न केवल हर कर्मचारी की काम करने की क्षमता बढ़ती है, बल्कि एक ऐसी टीम भी तैयार होती है जो भविष्य की नई चुनौतियों और मॉडर्न टेक्नोलॉजी का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार रहती है.
ऑटोमेशन से सस्टेनेबिलिटी और कंप्लायंस
अब स्थिरता केवल कागजों या बातों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह जरूरत बन गई है. ऑटोमेशन इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाता है, क्योंकि इससे एनर्जी मेनेजमेंट, वेस्ट को कम करना और संसाधनों का सही इस्तेमाल करना आसान हो जाता है. साथ ही, यह रीयल टाइम एनवायरमेंट और सामाजिक मानकों (ESG) की निगरानी करने और उनकी रिपोर्ट तैयार करने में भी मदद करता है. खासकर उन कंपनियों के लिए जो एक्सपोर्ट करती हैं, ऑटोमेशन के जरिए सामान के बनने से लेकर पहुंचने तक की पूरी जानकारी रखना और डिजिटल ऑडिट करना आसान हो जाता है. इससे नियमों के उल्लंघन का खतरा कम होता है और मार्केट में कंपनी की साख भी बनी रहती है.
ग्लोबल बायर्स अब सिर्फ सामान नहीं चाहते, बल्कि वे रीयल टाइम में यह भी देखना चाहते हैं कि प्रोडक्शन की क्वालिटी कैसी है. इस उम्मीद को पूरी विश्वसनीयता के साथ केवल ऑटोमेशन के जरिए ही पूरा किया जा सकता है, क्योंकि मशीनी सिस्टम बिना किसी गलती के रीयल टाइम डेटा उपलब्ध करा सकते हैं.
कॉर्पोरेट के लिए जरूरी
बड़ी भारतीय कंपनियों के पास वह पैसा, स्केल और प्रभाव है जो भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की तस्वीर बदल सकता है. उनका रोल केवल अपनी कंपनी के अंदर कामकाज को बेहतर बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें सफलता के ऐसे नए मानक सेट करने होंगे जिनका फायदा पूरी सप्लाई चेन और उनसे जुड़ी छोटी कंपनियों (MSMEs) को भी मिले.
2026 तक का सफर बहुत छोटा है, यानी हमारे पास समय कम है. भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ग्लोबल लेवल पर मुकाबला तभी कर पाएगा, जब वह छोटे-मोटे बदलावों के बजाय 'ऑटोमेशन' के जरिए पूरी तरह से कायाकल्प करने का फैसला ले. आज के कॉर्पोरेट लीडर्स के लिए ऑटोमेशन को अपनाना अब केवल टेक्नोलॉजी की पसंद का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक जरूरी स्ट्रेटेजी बन चुकी है. यही वह फैसला है जो तय करेगा कि दुनिया भर के मैन्युफैक्चरिंग मार्केट में भारत का कद और स्थान कितना बड़ा होगा.
(images: freepik)
(लेखक ‘Alligator Automations’ के फाउंडर और CEO हैं. आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं. YourStory का उनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है.)
Edited by रविकांत पारीक



