‘रुक जाना नहीं’ : किसान की बेटी का सफ़र, मुरादाबाद से ऑक्सफ़ोर्ड और फिर IPS

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‘रुक जाना नहीं’ मोटिवेशनल सीरीज़ में आज हमारे सामने है एक अविश्वसनीय कहानी। यू.पी. के एक छोटे शहर मुरादाबाद के एक क़स्बे कुंदरकी के एक रूढ़िवादी परिवार से निकली एक किसान की बेटी कैसे दिल्ली यूनिवर्सिटी से ऑक्सफ़ोर्ड पहुँची और फिर कैसे स्वदेश लौटकर सिविल सेवा अधिकारी बनी। सचमुच बेहद प्रेरक कहानी!


इल्मा अफ़रोज, IPS ऑफिसर


मेरा नाम इल्मा अफरोज़ है। सिविल सेवा परीक्षा मैं 217 रैंक के साथ मुझे भारतीय पुलिस सेवा (हिमाचल प्रदेश काडर) आवंटित की गयी। मेरा घर क़स्बा कुन्दरकी, जिला मुरादाबाद में है। दुनिया भर में मुरादाबाद पीतलनगरी के नाम से मशहूर है। हमारे यहाँ के हुनरमंद कारीगर बड़ी मेहनत से हस्तशिल्प बनाते हैं। मुरादाबाद की गलियों में अपने फन में मसरूफ कारीगरों से “सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स” का पहला पाठ सीखा।

मेरे पिता एक किसान थे। हर साल अप्रैल मैं स्कूल का नया सत्र शुरू होता। अप्रैल में ही गेहूं की फसल सरकारी लेवी पर देकर मेरे बाबा, फिर फ़ौरन ही शहर जाके मेरी और भाई की किताबें, पेंसिले लाते थे। मुझे MSP की फुल फॉर्म तो नहीं पता थी तब, लेकिन मेरी किताबों का बण्डल ज़रूर आ जाता था।

कभी किसी काम से बाबा अगर जिला कलेक्टर या SDM साहब के कार्यालय जाते थे, तो मैं भी साथ चली जाती थी. गाँव –गाँव से ज़रूरतमंदों की भीड़ आई होती थी।

मैं 14 साल की थी जब मेरे बाबा का देहांत हो गया। मेरी अम्मी ने मेरे छोटे भाई की और मेरी परवरिश खुद की। उन्हें अक्सर सुनना पड़ता था की, “लौंडिया को इतना सर पे मत बिठाओ। यह तो जाने की चीज़ है, दूसरे के घर की हो जाएगी।”

अम्मी ने मुझे जीवन में संघर्ष एवं कड़ी मेहनत, लगन एवं अटूट विश्वास के ज़रिये से अपने पैरों के नीचे की ज़मीन ढूँढने की, निरंतर आगे बढ़ने की सीख दी। शिकायत करने, कमियां निकलने के बजाए वक़्त और हालात की आँखों में आँखें डाल कर मुकाबला करना सिखाया। खामियां, चुनौतियाँ चाहें कितनी भी हों, अम्मी हमेशा सिखाती हैं की, तुझे अर्जुन की तरह सिर्फ मछली की आँख दिखनी चाहिए।



एक बार छात्रवृत्ति के काम से मैं कलक्ट्रेट गयी थी। दफ्तर के बाहर खड़े सफ़ेद वर्दी वाले अर्दली ने कहा “किसी बड़े के साथ आओ। बच्चों का क्या काम..?” मैं सीधे अंदर चली गयी। स्कूल की वर्दी में एक छात्रा को देख कर डीएम साहब मुस्कुराये, मेरे फार्म पर हस्ताक्षर किये, बोले -“सिविल सर्विसेज ज्वाइन करो इल्मा!”

दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज से मैंने दर्शनशास्त्र में बी.ए.ऑनर्स डिग्री हासिल की। जो तीन साल मैंने सैंट स्टीफेंस कॉलेज के प्रांगण में बिताए, वो अब तक के मेरी ज़िन्दगी के सबसे प्यारे साल हैं।

सैंट स्टीफेंस कॉलेज में हर शुक्रवार की दोपहर होने वाली दर्शनशास्त्र समिति की बैठकों मैं मैंने खुद से पेपर लिख कर, विषय वस्तु पर लाजवाब विद्वानों से शास्त्रार्थ करने का अनूठा अनुभव प्राप्त किया. सैंट स्टीफेंस कॉलेज में दर्शनशास्त्र की क्लास में जैन दर्शन के ‘अनेकान्तवाद’ एवं ‘स्यादवाद’ को पढ़ा था। ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन में वाद –विवाद करते हुए, यहाँ विचारों की विविधता में, जीवन शैलियों की बहुलता में भारतीय दर्शन को आत्मसात करने का लाभ मिला। भारतीय दर्शन में मैंने ‘निष्काम कर्मयोग’ भी पढ़ा। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’... यानी आसक्तिरहित होकर कर्म करना चाहिए।

ऑक्सफ़ोर्ड विश्विद्यालय, इंग्लैंड के वुल्फ्सन कॉलेज से मैंने स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। दुनिया भर से आये छात्रों से विचारों का आदान –प्रदान करना, उनके नज़रियों को समझना, दुनिया में नित नए नवाचारों से प्रेरणा लेना मैंने ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन में सीखा। उसके बाद न्यूयॉर्क सिटी, में कार्य अनुभव प्राप्त किया।



 न्यूयॉर्क की चमक-दमक के बीच हमेशा अपनों का ख्याल आता था कि अम्मी वहां कुन्दरकी में अकेली हैं, उनको मेरी ज़रुरत है। क्या मेरी शिक्षा इसलिये है की वह किसी दूसरे मुल्क की ग्रोथ स्टोरी का हिस्सा बने? जब भी मैं कभी छुट्टियों में घर वापस आती थी, लोगों की आँखें मुझे देख कर चमक जातीं – “हमारी लल्ली जहाज में उड़ के गयी थी पढ़ने !” की शायद मेरी शिक्षा से उनकी ज़िन्दगी में कुछ सुकून आ जाये.....मैंने देश वापस आने का फैसला कर लिया।

अपने भाई के प्रोत्साहन पर मैंने सिविल सेवा की परीक्षा दी। सिविल सेवा की परीक्षा मैं अपने आस पास की घटनाओं पर पैनी नज़र रखने से बहुत मदद मिलती है। पुस्तकालय/रीडिंग कक्ष जाना अच्छा रहता है। सिविल सेवा परीक्षा मैं मेरा वैकल्पिक विषय दर्शनशास्त्र था। मैंने केवल बी .ए. (दर्शनशास्त्र) मैं सैंट स्टीफेंस कॉलेज में पढ़ी गयी किताबों को दोहराया। अभ्यर्थी अक्सर यूनिवर्सिटी में बी.ए. पाठ्यक्रम मैं पढाई जाने वाली चुनिन्दा मुख्य किताबें पढ़ने के बजाए तमाम तरह के नोट्स , गाइड बुक्स का अम्बार कमरे में लगा लेते हैं।

सैंट स्टीफेंस कॉलेज मैं पहले दिन मैंने कॉलेज के सभागार मैं मोटे–मोटे अक्षरों में लिखा हुआ पढ़ा था – “सत्यमेव विजयते नानृतम” ( मुण्डक उपनिषद)। यह कॉलेज मैं मेरा पहला पाठ था और हमेशा मुझे रास्ता दिखायेगा।


गेस्ट लेखक निशान्त जैन की मोटिवेशनल किताब 'रुक जाना नहीं' में सफलता की इसी तरह की और भी कहानियां दी गई हैं, जिसे आप अमेजन से ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं।

(योरस्टोरी पर ऐसी ही प्रेरणादायी कहानियां पढ़ने के लिए थर्सडे इंस्पिरेशन में हर हफ्ते पढ़ें 'सफलता की एक नई कहानी निशान्त जैन की ज़ुबानी...')

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