बीमारी ने दिया बिजनेस आइडिया, PF के पैसों से की शुरुआत और हर्षवर्धन चौहान ने खड़ा कर दिया हेल्थ ड्रिंक्स ब्रांड Tribe Kombucha
कॉरपोरेट वर्ल्ड से ऑन्त्रप्रेन्योरशिप तक हर्षवर्धन चौहान का सफर कई मोड़ों से गुजरा. बीमारी के बाद हेल्थ ड्रिंक का आइडिया आया और Tribe Kombucha की शुरुआत हुई. आज ब्रांड 2,000 से अधिक डिस्ट्रीब्यूशन पॉइंट और करीब 25 करोड़ रुपये के रेवेन्यू रन रेट तक पहुंच चुका है.
भारत में हेल्थ और वेलनेस से जुड़ी चीजों का बाजार तेजी से बदल रहा है. लोग अब सिर्फ स्वाद नहीं देखते. वे यह भी जानना चाहते हैं कि जो चीज वे रोज खा या पी रहे हैं, उसका उनकी सेहत पर क्या असर होगा. लेकिन इस बदलाव के बीच एक चुनौती भी है. हेल्दी विकल्प अक्सर महंगे, सीमित और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से दूर नजर आते हैं.
इसी जगह को भरने की कोशिश कर रहा है Mountaintribe Foods का ब्रांड Tribe Kombucha. कंपनी की शुरुआत 2018 में हुई थी, जबकि Tribe Kombucha को 2022 में लॉन्च किया गया. हर्षवर्धन चौहान Tribe Kombucha के फाउंडर और CEO हैं. उनका सफर कॉरपोरेट वर्ल्ड से शुरू हुआ और पहाड़ों की यात्राओं से गुजरते हुए एक ऐसे बिजनेस तक पहुंचा, जहां हेल्थ और स्वाद दोनों को साथ रखने की कोशिश की गई.
YourStory ने हाल ही में हर्षवर्धन चौहान से उनके अब तक के सफर, Tribe Kombucha के बिजनेस मॉडल, फंडिंग, रेवेन्यू, चुनौतियों और भविष्य की योजनाओं पर बात की.
कॉरपोरेट वर्ल्ड में सीखा बिजनेस
हर्षवर्धन चौहान का बचपन सहारनपुर में बीता. यह शहर शिवालिक की पहाड़ियों के करीब है. आगे की पढ़ाई के लिए वे देहरादून गए. पहाड़ों के करीब बिताए उस दौर ने उनके व्यक्तित्व पर गहरा असर डाला. वीकेंड पर ट्रेकिंग और पहाड़ियों में लंबी सैर उनके जीवन का हिस्सा बन गई.
इसके बाद उन्होंने IIM कलकत्ता से पढ़ाई की. करियर की शुरुआत मीडिया और बिजनेस से जुड़ी भूमिकाओं में हुई. Reliance Broadcast Network और HT Media में उन्होंने क्लाइंट स्ट्रैटेजी और बिजनेस डेवलपमेंट पर काम किया. इन अनुभवों ने उन्हें ब्रांड बनाने, बातचीत करने और किसी प्रोडक्ट को बाजार तक ले जाने की समझ दी.
हर्षवर्धन बताते हैं, “कॉरपोरेट जीवन ने मुझे बिजनेस की बुनियादी समझ दी. लेकिन भीतर हमेशा कुछ अपना बनाने की इच्छा थी. एक समय लगा कि रोज की भागदौड़ से थोड़ा दूर जाना चाहिए. पहाड़ों पर एक कठिन ट्रेक ने मुझे चीजों को अलग नजर से देखने का मौका दिया. वहां से एक सोच बनी कि जिंदगी में सिर्फ शोर के साथ आगे बढ़ना जरूरी नहीं है. कभी पीछे हटकर यह देखना भी जरूरी है कि हम वास्तव में बनाना क्या चाहते हैं.”
बीमारी ने दिया कोम्बुचा का आइडिया
ऑन्त्रप्रेन्योरशिप की तरफ उनका कदम सिर्फ पहाड़ों से मिली सोच का नतीजा नहीं था. उनकी निजी जिंदगी का एक मुश्किल दौर भी इसमें जुड़ा था. हर्षवर्धन को बेल्स पाल्सी (Bell's palsy) हुआ था. रिकवरी के दौरान उन्हें बड़ी मात्रा में प्रोबायोटिक्स लेने की सलाह दी गई.
इलाज से फायदा हुआ. लेकिन उन्हें यह अनुभव काफी क्लिनिकल और सीमित लगा. यहीं से उनके मन में सवाल आया कि क्या हेल्थ से जुड़े प्रोडक्ट ऐसे नहीं हो सकते जिन्हें इस्तेमाल करना किसी बोझ जैसा न लगे.
इसी तलाश में उनकी नजर कोम्बुचा पर गई. यह एक फर्मेंटेड पेय है, जिसे आमतौर पर प्रोबायोटिक्स और अपने अलग स्वाद के लिए जाना जाता है. यहीं से Tribe Kombucha का आइडिया आगे बढ़ा.
हर्षवर्धन बताते हैं, “मेरे लिए कोम्बुचा की खोज सिर्फ एक नए पेय की खोज नहीं थी. मैंने खुद महसूस किया था कि हेल्थ प्रोडक्ट कितना उपयोगी होते हुए भी कितना नीरस लग सकता है. मुझे लगा कि सेहत और स्वाद को एक दूसरे का विरोधी नहीं होना चाहिए. यहीं से Tribe का विचार आया. मेरा मकसद ऐसा पेय बनाना था जिसे लोग सिर्फ किसी हेल्थ रूटीन के हिस्से के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में खुशी से शामिल कर सकें.”
हेल्थ ड्रिंक मार्केट में जगह बनाने की कोशिश
जब Tribe शुरू हुआ, तब भारत में कोम्बुचा अभी एक सीमित बाजार का हिस्सा था. एक तरफ बाजार में शुगर वाली सोडा और एनर्जी ड्रिंक्स की भरमार थी. दूसरी तरफ कुछ महंगे और मुश्किल से मिलने वाले वेलनेस प्रोडक्ट्स थे.
Tribe ने इन दोनों के बीच जगह बनाने की कोशिश की. कंपनी का लक्ष्य कोम्बुचा को केवल वेलनेस ड्रिंक की छवि से बाहर निकालकर रोजमर्रा के पेय के तौर पर पेश करना था.
शुरुआती दौर में हर्षवर्धन ने कारोबार को खुद के पैसों से आगे बढ़ाया. उन्होंने अपने प्रोविडेंट फंड (PF) से बचाई गई छोटी रकम लगाई. बाद में कारोबार बढ़ने के साथ बाहरी निवेश भी आया.
हर्षवर्धन कहते हैं, “शुरुआत में मैंने अपने प्रोविडेंट फंड से कुछ पैसे निकालकर बिजनेस में लगाए. उस समय यह मेरे लिए काफी निजी फैसला था, क्योंकि कोई गारंटी नहीं थी कि बाजार इस प्रोडक्ट को स्वीकार करेगा. धीरे-धीरे जब हमें ग्राहकों और बाजार से संकेत मिलने लगे, तो दूसरे निवेशक भी साथ आए. मैंने हमेशा कोशिश की कि पूंजी से पहले प्रोडक्ट और ग्राहक की जरूरत को समझा जाए.”
2,000+ पॉइंट्स से ₹25 करोड़ रन रेट तक
आज Tribe Kombucha का कारोबार कई चैनलों में फैला हुआ है. कंपनी का मॉडल D2C (डायरेक्ट टू कंज्यूमर) सब्सक्रिप्शन, क्विक कॉमर्स, मॉडर्न रिटेल और इंस्टीट्यूशनल तथा HORECA पार्टनरशिप पर आधारित है.
Tribe के प्रोडक्ट Swiggy Instamart, Blinkit, Flipkart Minutes, BB Now और Amazon जैसे प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं. कंपनी के अनुसार उसका वितरण नेटवर्क 2,000 से ज्यादा पॉइंट तक पहुंच चुका है. इंस्टीट्यूशनल सेगमेंट में Wow Momo, Compass Group और Dal Chini जैसे नामों के साथ साझेदारी की गई है.
Wow Momo के साथ साझेदारी ने भी ब्रांड की पहुंच बढ़ाने में भूमिका निभाई है. कंपनी के मुताबिक इस सहयोग से Tribe 90 से ज्यादा शहरों में मौजूदगी बना पाया है. Google, Microsoft और WeWork जैसी कंपनियों के साथ इंस्टीट्यूशनल पार्टनरशिप ने भी नए ग्राहकों को प्रोडक्ट आजमाने का मौका दिया.
कंपनी ने अब तक करीब 1.5 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई है. इसमें Morde Chocolates के हर्षल मोर्डे, Bikaji के दीपक अग्रवाल और कुछ फैमिली इन्वेस्टर्स शामिल हैं.
वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो पिछले दो से तीन वित्त वर्षों में Tribe की आय करीब ₹5 करोड़ तक पहुंची. इसके बाद कारोबार में तेजी आई और कंपनी का मौजूदा रेवेन्यू रन रेट करीब ₹25 करोड़ बताया गया है.
हर्षवर्धन बताते हैं, “हमारे लिए पार्टनरशिप सिर्फ डिस्ट्रीब्यूशन का जरिया नहीं हैं. इनसे लोगों को कोम्बुचा को पहली बार आजमाने का मौका मिलता है. जब कोई व्यक्ति इसे अपने ऑफिस, किसी रेस्तरां या रोजमर्रा की खरीदारी के दौरान देखता है, तो प्रोडक्ट खुद अपनी बात कहता है. हमारा मकसद कोम्बुचा को किसी खास वर्ग तक सीमित रखना नहीं है. हम इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों की रोजमर्रा की कंजम्प्शन हैबिट्स का हिस्सा बनाना चाहते हैं.”
चुनौतियां और भविष्य की योजनाएं
कोम्बुचा को भारत में मेनस्ट्रीम बेवरेज बनाना आसान नहीं रहा है. बड़ी चुनौती लोगों को इसके बारे में समझाना है. कई लोग आज भी इसे शराब से जोड़ते हैं या इसे सिर्फ एक महंगा वेलनेस प्रोडक्ट मानते हैं.
इसके अलावा कोल्ड चेन, शेल्फ स्टेबिलिटी और कीमत भी महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं. भारत में सस्ते शुगर वाले बेवरेज की आदत वाले बाजार में किसी नए फंक्शनल बेवरेज के लिए जगह बनाना आसान नहीं है. Mountaintribe ने अपने स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता भी विकसित की. कंपनी के अनुसार भारत में डेडिकेटेड कमर्शियल कोम्बुचा फैसिलिटी की कमी थी, इसलिए प्रोडक्टन क्षमता खड़ी करना भी एक बड़ी चुनौती रही.
Tribe खुद को केवल इंग्रीडिएंट्स के आधार पर अलग नहीं करना चाहता. कंपनी का जोर फ्लेवर, पर्सनैलिटी और कल्चर पर है. इसके उत्पादों को क्लीन लेबल, नेचुरली फर्मेंटेड और बिना ऐडेड शुगर तथा प्रिजर्वेटिव्स के तौर पर पेश किया जाता है.
हर्षवर्धन कहते हैं, “आगे हमारा लक्ष्य सिर्फ ज्यादा कोम्बुचा बेचना नहीं है. हम भारत के अलग अलग शहरों में पहुंच बढ़ाना चाहते हैं और टियर 2 तथा टियर 3 बाजारों में भी जाना चाहते हैं. इसके साथ मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ानी होगी. भविष्य में फंक्शनल हाइड्रेशन और दूसरे बेटर फॉर यू बेवरेज में भी जाने की योजना है. Mountaintribe की बड़ी सोच ऐसे ब्रांड बनाने की है जो लोगों को बेहतर और ज्यादा इंटेंशनल तरीके से जीने में मदद करें, लेकिन उनकी जिंदगी से मजा और पर्सनैलिटी खत्म न हो.”
Tribe Kombucha के सामने अब अगला सवाल सिर्फ कारोबार बढ़ाने का नहीं है. सवाल यह भी है कि क्या कोम्बुचा भारत में एक स्थायी मेनस्ट्रीम बेवरेज कैटेगरी बन पाएगा. कंपनी फिलहाल इसी दिशा में अपनी डिस्ट्रीब्यूशन, मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्ट पोर्टफोलियो बढ़ा रही है.
Mountaintribe के लिए Tribe पहला बड़ा कदम है. हर्षवर्धन का लक्ष्य इसे भारत का प्रमुख कोम्बुचा ब्रांड बनाने का है. इसके आगे वे Mountaintribe को फंक्शनल फूड और बेवरेज इकोसिस्टम के रूप में देख रहे हैं. आने वाले वर्षों में यह सफर कितना बड़ा होता है, इसका जवाब बाजार और भारतीय उपभोक्ताओं की बदलती पसंद देगी.



