कभी स्कूल फीस के पैसे नहीं थे, आज गांव के बच्चों को AI और Robotics सिखा रहे हैं विकास कुमार
कुशीनगर के विकास कुमार ने बचपन की आर्थिक मुश्किलों से सीख लेकर NGO संकल्प शिक्षा की शुरुआत की. पेड़ की छांव में बच्चों को पढ़ाने से शुरू हुआ यह सफर आज डिजिटल क्लासरूम, स्किल डेवलपमेंट, AI और रोबोटिक्स तक पहुंच चुका है.
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में कभी बच्चों की पढ़ाई पेड़ की छांव या एक छोटी-सी झोपड़ी तक सीमित थी. लेकिन आज वहां डिजिटल क्लासरूम और ई-लाइब्रेरी हैं. और बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं.
इस बदलाव का श्रेय जाता है विकास कुमार को, जिन्होंने अपने बचपन की आर्थिक मुश्किलों और गांव के बच्चों के सीमित अवसरों को शिक्षा के मिशन में बदल दिया. उनका NGO संकल्प शिक्षा (Sankalp Shiksha) अब ग्रामीण छात्रों को पढ़ाई के साथ कौशल और तकनीक से जोड़ने की कोशिश कर रही है.
यह कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीण भारत में स्कूल तक पहुंच बढ़ने के बावजूद गुणवत्तापूर्ण सीखने और डिजिटल कौशल की चुनौती बनी हुई है. ASER 2024 रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण भारत में कक्षा 5 के 48.7% बच्चे ही कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ पा रहे थे. रिपोर्ट ने 14-16 वर्ष के बच्चों के डिजिटल एक्सेस और कौशल पर भी पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़े जुटाए.
आर्थिक तंगी में बीता बचपन
कुशीनगर के एक गांव में पले-बढ़े विकास कुमार के पिता ग्रुप डी कर्मचारी थे. नौकरी के कारण परिवार बाद में उस कस्बे में चला गया जहां उनकी पोस्टिंग थी, लेकिन गांव से उनका जुड़ाव बना रहा.
बचपन में उन्होंने खुद आर्थिक तंगी देखी. कई बार फीस जमा न होने के कारण उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं मिलती थी. चौथी कक्षा में बीमारी के बाद पिता की मृत्यु ने परिवार की मुश्किलें और बढ़ा दीं. एक समय परिवार कुशीनगर में एक कमरे में रहता था और करीब 20 लोगों के साथ साझा शौचालय इस्तेमाल करता था.
इन परिस्थितियों के बावजूद विकास ने पढ़ाई नहीं छोड़ी. दसवीं के बाद वह JEE की तैयारी के लिए गोरखपुर गए और आगे चलकर NIT हमीरपुर में दाखिला लिया.
यहीं से उनके मन में एक सवाल मजबूत होता गया: अगर सही अवसर मिले तो गांव का बच्चा भी आगे बढ़ सकता है, फिर ऐसे अवसर गांव के दूसरे बच्चों को क्यों न मिलें?

कोविड में किया सोशल वर्क
कोविड-19 के दौरान विकास ने अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ मिलकर गांव में मदद करने की योजना बनाई. शुरुआत में सैनिटाइजर बनाने का विचार था, लेकिन जरूरी अल्कोहल उपलब्ध नहीं हो सका.
इसके बाद टीम ने स्थानीय जरूरतों को समझा और राशन वितरण शुरू किया. कॉलेज के सीनियर्स और एलुमनाई की मदद से 10-15 गांवों में करीब 400-500 परिवारों तक राशन किट पहुंचाई गई.
राहत के इस काम ने विकास को यह समझाया कि संकट के समय मदद जरूरी है, लेकिन लंबे समय का बदलाव शिक्षा और कौशल के जरिए ही संभव है.
चार कमरों से शुरू हुआ नया चैप्टर
संकल्प शिक्षा फाउंडेशन का औपचारिक पंजीकरण नवंबर 2020 में हुआ और विकास कुमार इसके निदेशकों में शामिल हैं.
हालांकि, शुरुआत में NGO को पूर्णकालिक रूप से चलाना विकास की योजना नहीं थी. NIT हमीरपुर से पढ़ाई के बाद जुलाई 2021 में उन्हें कैंपस प्लेसमेंट से नौकरी मिली. वह सिविल सर्विसेज की तैयारी करना चाहते थे.
फिर एक सीनियर के प्रोत्साहन और बाद में Work From Home की सुविधा ने उन्हें सामाजिक काम के लिए अधिक समय दिया.
इस बीच विकास ने अपने काम के बारे में लिंक्डइन पर पोस्ट करना शुरू किया. उनकी कंपनी के CEO ने इन पोस्ट को देखा और पहले कंबल वितरण में मदद की. बाद में उन्होंने विकास से फंडिंग प्रस्ताव मांगा.
विकास ने ₹4 लाख की फंडिंग के लिए आवेदन किया, जिसे करीब 10 दिन में मंजूरी मिल गई. इसी रकम से चार कमरे किराये पर लिए गए और 10 जून 2023 को स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम की औपचारिक शुरुआत हुई.

झोपड़ी से डिजिटल क्लासरूम तक
शुरुआती दिनों में विकास और उनकी टीम ने मुशहर बस्तियों में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. छोटी-सी झोपड़ी बनाई गई. कई जगह पेड़ों के नीचे कक्षाएं लगीं. करीब 40-50 स्वयंसेवक इस काम से जुड़े.
लेकिन जल्द ही एक समस्या सामने आई. बच्चों को कक्षा तक लाना आसान था, उन्हें नियमित बनाए रखना मुश्किल. कुछ बच्चे एक सप्ताह आते और फिर कई दिनों तक गायब रहते. इससे सीखने की निरंतरता टूट जाती थी.
विकास ने इस अनुभव से अपना मॉडल बदला. 2023 में NGO ने कई सामाजिक मुद्दों के बजाय तकनीकी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर फोकस करने का फैसला किया.
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के प्रतिभाशाली बच्चों की पहचान के लिए परीक्षाएं शुरू हुईं. छात्रों से ₹200 की मामूली फीस ली जाती है, ताकि परिवार और बच्चे दोनों पढ़ाई के प्रति प्रतिबद्ध रहें.
इसके बाद संकल्प डिजिटल पाठशाला ने इस मॉडल को आगे बढ़ाया. NGO की वेबसाइट के अनुसार, सलेमगढ़ में डिजिटल लर्निंग, कंप्यूटर शिक्षा और ई-लाइब्रेरी की सुविधा उपलब्ध कराई गई है. इसका उद्देश्य ग्रामीण बच्चों को बेहतर शैक्षणिक संसाधन उपलब्ध कराना और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मदद करना है.

अब बच्चे बना रहे हैं सेंसर, रोबोट और रॉकेट
संकल्प शिक्षा का मॉडल अब केवल किताबों तक सीमित नहीं है.
जून 2026 में प्रकाशित द लॉजिकल इंडियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, संगठन के तीन प्रमुख कार्यक्रमों में ग्रेजुएट्स के लिए ‘स्किल डेवलपमेंट’, कक्षा 6 से 12 के छात्रों के लिए Innovators of Tomorrow और डिजिटल लाइब्रेरी शामिल हैं. संगठन Physics Wallah की शैक्षणिक सामग्री को डिजिटल बोर्ड और ऑफलाइन शिक्षकों के मार्गदर्शन के साथ इस्तेमाल करता है. यहां रोबोटिक्स लैब और AI स्पेस भी है. चार सरकारी स्कूलों में AI, रोबोटिक्स और कंप्यूटर शिक्षा के साप्ताहिक सत्र आयोजित किए जाते हैं.
NGO के मुताबिक, उसके मौजूदा काम में ड्रोन, सर्किट और ऑटोमेशन जैसे विषयों पर बच्चों को हाथों से सीखने का अवसर भी दिया जा रहा है.
नवंबर 2024 में सलेमगढ़ में आयोजित विज्ञान प्रदर्शनी में छात्रों ने सेंसर आधारित मॉडल, प्रदूषण नियंत्रण, बिजली बचाने और बिना चालक की सेंसर आधारित कार जैसे प्रोजेक्ट प्रस्तुत किए थे.
यह बदलाव महत्वपूर्ण है. ग्रामीण बच्चे टेक्नोलॉजी के सिर्फ उपभोक्ता न बनें, बल्कि उसे समझें और बनाएं, संकल्प शिक्षा इसी दिशा में काम कर रही है.
आगे की राह
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, NGO के साथ करीब 250 नियमित लाभार्थी और आठ-नौ शिक्षक जुड़े हैं. लगभग 125 छात्र स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम में हैं और संगठन के सहयोग से 40-50 युवाओं को रोजगार मिलने की बात कही गई है. पिछले पांच वर्षों में शुरुआती राहत कार्यों सहित करीब 2,000-2,200 छात्रों तक पहुंच का दावा किया गया है.
अब विकास अपनी नौकरी छोड़कर संकल्प शिक्षा को पूर्णकालिक समय देने की योजना बना रहे हैं. उनका तत्काल लक्ष्य विस्तार से ज्यादा कुशीनगर में मौजूदा मॉडल को मजबूत करना है.
उनका सपना है: पैसों की कमी किसी बच्चे की पढ़ाई रोकने की वजह न बने और ग्रामीण बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए अपना गांव छोड़ने की मजबूरी न हो.
कभी जिस पहल की शुरुआत राशन की किट से हुई थी, वह आज किताबों से आगे बढ़कर AI और रोबोटिक्स तक पहुंच चुकी है. चार किराये के कमरों से शुरू हुई यह यात्रा अभी लंबी है, लेकिन कुशीनगर के बच्चों के लिए एक बात जरूर बदल रही है: अब उनके सपनों की शुरुआत के लिए शहर जाना जरूरी नहीं, गांव भी एक विकल्प हो सकता है.



