मेजर लाइचट पॉल वांगपान: 8वीं के बाद पढ़ाई छूटी, चौकीदारी की और फिर बने मेजर
अरुणाचल प्रदेश के लोंगफोंग गांव से निकलकर भारतीय सेना में मेजर बनने वाले लाइचट पॉल वांगपान की कहानी हौसले और मेहनत की मिसाल है. कभी नाइट वॉचमैन और फिर सिपाही रहे वांगपान ने कठिन परिस्थितियों को मात देकर वांचो समुदाय के पहले कमीशंड ऑफिसर और पहले मेजर बनकर इतिहास रच दिया.
रात के अंधेरे में चौकीदारी करने वाला शख्स शायद ही कभी सोचता होगा कि एक दिन वही भारतीय सेना में मेजर की वर्दी पहनकर हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बनेगा. लेकिन सपनों की कोई सीमा नहीं होती. अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत लगातार की जाए तो हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, मंजिल तक पहुंचा जा सकता है. मेजर लाइचट पॉल वांगपान (Major Laichat Paul Wangpan) की कहानी इसी सच्चाई को साबित करती है.
अरुणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh) के एक छोटे से गांव से निकलकर भारतीय सेना (Indian Army) में इतिहास रचने वाले मेजर लाइचट पॉल वांगपान आज लाखों युवाओं के लिए मिसाल बन चुके हैं. उन्होंने न केवल अपने परिवार और राज्य का नाम रोशन किया, बल्कि अपने वांचो समुदाय (Wancho community) के लिए भी एक नया रास्ता खोला. उनका जीवन बताता है कि सफलता किसी बड़े शहर, महंगे स्कूल या संपन्न परिवार की मोहताज नहीं होती.
अरुणाचल प्रदेश के लोंगडिंग जिले के लोंगफोंग गांव में जन्मे लाइचट पॉल वांगपान एक साधारण वांचो परिवार से आते हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी. बचपन कई मुश्किलों के बीच बीता. उन्होंने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की और आठवीं कक्षा तक की शिक्षा वहीं पूरी की.
घर की जिम्मेदारियां कम उम्र में ही उनके कंधों पर आ गई थीं. परिवार की मदद करने के लिए उन्होंने जनरल रिजर्व इंजीनियर फोर्स (GREF) में नाइट वॉचमैन का काम शुरू किया. यह संगठन सीमा सड़क संगठन (BRO) के अंतर्गत काम करता है. रात भर चौकीदारी करना आसान नहीं था, लेकिन लाइचट ने कभी शिकायत नहीं की. वह जानते थे कि संघर्ष ही उन्हें आगे बढ़ाएगा.
इसी दौरान उनके मन में देश सेवा का सपना और मजबूत होने लगा. वह भारतीय सेना की वर्दी पहनना चाहते थे. आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और वह भारतीय सेना में सिपाही के रूप में भर्ती हो गए.
सेना में भर्ती होने के बाद उनकी जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ. एक जवान की जिंदगी अनुशासन, कठिन प्रशिक्षण और जिम्मेदारियों से भरी होती है. ड्यूटी के लंबे घंटे होते हैं. आराम का समय बहुत कम मिलता है. लेकिन लाइचट के सपने यहीं नहीं रुके.
उन्होंने नौकरी के साथ अपनी पढ़ाई जारी रखी. रिमोट एजुकेशन के माध्यम से उन्होंने माध्यमिक और उच्च माध्यमिक परीक्षाएं पास कीं. इसके बाद कॉलेज की पढ़ाई भी पूरी की. दिन में सैनिक की जिम्मेदारियां निभाना और खाली समय में पढ़ाई करना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.
उनके मन में एक बड़ा लक्ष्य था. वह सिर्फ जवान नहीं रहना चाहते थे. वह भारतीय सेना में अधिकारी बनना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड (SSB) की तैयारी शुरू की. सेना में सेवा करते हुए अधिकारी बनने का रास्ता बेहद कठिन माना जाता है. इसके लिए कड़ी मेहनत, आत्मविश्वास और धैर्य की जरूरत होती है.
कई चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी. आखिरकार उनकी मेहनत सफल हुई. जून 2020 में उन्होंने चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी से प्रशिक्षण पूरा किया और भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त किया.
यह सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी. इसके साथ ही वह वांचो समुदाय के पहले व्यक्ति बने जिन्हें भारतीय सेना में कमीशंड ऑफिसर बनने का गौरव हासिल हुआ. यह पूरे अरुणाचल प्रदेश के लिए गर्व का क्षण था.
उनकी इस उपलब्धि की चर्चा पूरे राज्य में हुई. अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने उन्हें बधाई दी और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की. कई सामाजिक संगठनों और छात्र संगठनों ने भी इसे राज्य और वांचो समुदाय के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया.
कमीशन मिलने के बाद लेफ्टिनेंट लाइचट पॉल वांगपान को भारतीय सेना की प्रतिष्ठित रेजिमेंट सिख लाइट इन्फैंट्री में नियुक्त किया गया. यह भारतीय सेना की गौरवशाली रेजिमेंटों में से एक मानी जाती है. इसकी बहादुरी और सैन्य परंपराओं का लंबा इतिहास रहा है.
अरुणाचल प्रदेश से आने वाले युवा अधिकारी का सिख लाइट इन्फैंट्री में गर्मजोशी से स्वागत किया गया. सेना की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वहां व्यक्ति की पहचान उसके क्षेत्र, भाषा या समुदाय से नहीं बल्कि उसकी क्षमता, चरित्र और समर्पण से होती है. लाइचट वांगपान भी अपने साथियों के बीच जल्द ही सम्मानित अधिकारी बन गए.
उन्होंने पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभाईं. समय के साथ उनका अनुभव बढ़ता गया और सेना में उनका सफर आगे बढ़ता रहा.
जून 2026 में उन्होंने एक और इतिहास रच दिया. उन्हें मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया. इसके साथ ही वह वांचो समुदाय के पहले अधिकारी बन गए जिन्होंने भारतीय सेना में मेजर का पद हासिल किया.
यह उपलब्धि केवल उनके लिए नहीं बल्कि पूरे समुदाय के लिए गर्व का विषय बन गई. जिस समाज से पहले कोई कमीशंड अधिकारी नहीं निकला था, वहां से अब एक मेजर तैयार हो चुका था.
कमीशन मिलने के कुछ समय बाद जब वह अपने जिले लोंगडिंग लौटे तो छात्रों और युवाओं के साथ एक विशेष कार्यक्रम में शामिल हुए. वहां उन्होंने अपने संघर्ष और अनुभव साझा किए. उन्होंने बताया कि गरीबी और कठिन परिस्थितियां किसी व्यक्ति की सफलता को नहीं रोक सकतीं, यदि उसके पास मेहनत करने का जज्बा हो.
उन्होंने युवाओं को सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए लगातार प्रयास करने की सलाह दी. इस दौरान उन्होंने माता पिता के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश दिया. उन्होंने कहा कि बच्चों को जीवन की शुरुआत में जरूरत से ज्यादा सुविधाएं नहीं देनी चाहिए. संघर्ष व्यक्ति को मजबूत बनाता है और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.
आज मेजर लाइचट पॉल वांगपान की कहानी सिर्फ एक सैन्य अधिकारी की सफलता की कहानी नहीं है. यह उम्मीद, मेहनत और आत्मविश्वास की कहानी है. यह उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो छोटे गांवों से आते हैं, आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हैं और बड़े सपने देखने से डरते हैं.
लोंगफोंग गांव का वह लड़का जिसने कभी परिवार चलाने के लिए रात में चौकीदारी की थी, आज भारतीय सेना में मेजर बनकर देश की सेवा कर रहा है. उनकी यात्रा साबित करती है कि मंजिल उन्हीं को मिलती है जो परिस्थितियों के सामने झुकते नहीं, बल्कि हर चुनौती को अपनी ताकत बना लेते हैं.
मेजर लाइचट पॉल वांगपान की कहानी आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करती रहेगी.



