खोजी महिलाएं: मैरी वॉल्‍टन की कहानी, जिन्‍होंने बनाया था दुनिया का पहला एयर प्‍योरीफायर

By Manisha Pandey
December 08, 2022, Updated on : Fri Dec 09 2022 02:07:44 GMT+0000
खोजी महिलाएं: मैरी वॉल्‍टन की कहानी, जिन्‍होंने बनाया था दुनिया का पहला एयर प्‍योरीफायर
मैरी वॉल्‍टन एक फेमिनिस्‍ट भी थीं, जिन्‍हें यकीन था कि औरतें मर्दों से किसी भी मामले में कम नहीं.
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Share on
close

जब हम दुनिया की महान वैज्ञानिक खोजों, आविष्‍कारों के बारे में पढ़ते हैं तो 100 में से 99 बार वैज्ञानिक कोई पुरुष होता है. बचपन में स्‍कूल किताबों में भी हमेशा पुरुषों के नाम का ही जिक्र होता था, जिसे पढ़कर नन्‍ही बच्चियों को भी लगता कि मानो ये दुनिया सिर्फ पुरुषों ने ही बनाई है. जीत के सारे सेहरे सिर्फ उनके सिर बंधे हैं.


जबकि सच तो ये है कि ये बात बिलकुल सच नहीं. इतिहास में ऐसी असंख्‍य महिलाएं हुईं, जिनका वैज्ञानिकों खोजों में, आविष्‍कारों में बड़ा योगदान रहा. मानवता आज जिनकी ऋणी है. ये बात अलग है कि उनकी कहानियां हमने किताबों में नहीं पढ़ी. न बहुत बार उनका जिक्र किया गया. आपको शायद यह जानकर आश्‍चर्य भी न हो कि कितनी महिलाओं को तो उनकी वैज्ञानिक खोज और उपलब्धि का श्रेय भी उनके जीवन काल में नहीं मिला.


इस सीरीज में हम आपको रोज ऐसी ही एक महिला की कहानी सुनाएंगे. आज की कहानी मैरी वॉल्‍टन की.

मैरी के पास विज्ञान की कोई डिग्री नहीं थी

मैरी वॉल्‍टन का जन्‍म कब और कहां हुआ, किताबों में और इंटरनेट पर इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती. औरतों की कहानियों को तब कोई सहेजकर रखता भी नहीं था. 1884 के ‘वीकली’ में छपा उनका इंटरव्‍यू मिलता है, जिसमें वो कहती हैं कि उनका कोई भाई नहीं था. घर में सिर्फ लड़कियां ही थीं. तो पिता ने बेटियों को भी बेटों की तरह पाला. लड़कियों की शिक्षा पर उनका बहुत जोर होता था.

हमें इसकी भी कोई जानकारी नहीं मिलती कि उन्‍होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी या इनवायरमेंट साइंस का कोई विधिवत प्रशिक्षण लिया था. हम बस इतना ही जानते हैं कि उन्‍होंने जो आविष्‍कार किया, उसने भविष्‍य की बुनियाद रखी.    

प्रदूषण के खिलाफ मैरी की मुहिम

इससे हम सिर्फ ये अनुमान लगा सकते हैं कि संभवत: उनका जन्‍म 1950 से 60 के बीच कभी अमेरिका में हुआ होगा. उन्‍होंने इतिहास की जो दो महत्‍वपूर्ण खोजें की, वो भी हवारी हवा को प्रदूषण से बचाने वाला एक उपकरण और दूसरा एक ऐसे रेडरोल का मॉडल, जो उस समय की ट्रेनों और पटरियों की तरह कर्कश शोर नहीं करता था.


यानी उनकी दोनों खोजों का सीधा संबंध प्रदूषण को कम करने से था- वायु प्रदूषण और ध्‍वनि प्रदूषण.

अमेरिकी गृहयुद्ध और औद्योगिक क्रांति का दौर

आज जितनी पर्यावरण की, खराब होती हवा की बात होती है, आज से डेढ़ सौ साल पहले भी स्थिति कोई बहुत अच्‍छी नहीं थी. और इसकी सबसे बड़ी वजह थी इंडस्ट्रियल रेवोल्‍यूशन यानी औद्योगिक क्रांति. इंसानों ने बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां तो खड़ी कर दी थीं, लेकिन उन फैक्ट्रियों का सारा धुंआ हवा में जाकर वायुमंडल को प्रदूषित करता था.


अमेरिका में यह गृहयुद्ध का दौर था. बड़ी संख्‍या में लोग गांव छोड़ शहरों की ओर पलायन कर रहे थे. नई-नई फैक्ट्रियां लग रही थीं, जिनमें जलने वाला हजारों टन कोयला रोज हवा में रोज सैकड़ों टन जहर घोल रहा था.  


मैरी वॉल्‍टन ने हवा में फैल रहे इस जहर के असर को कम करने का एक तरीका निकाला. उन्‍होंने एक ऐसी तकनीक विकसित की, जिससे उस धुंए को हवा में छोड़ने से पहले उसे पानी से होकर गुजारा जाता. धुंए में मौजूद कार्बन के सारे कण पानी में ही रह जाते और जो धुंआ निकलता, वो अपेक्षाकृत कम कार्बन और प्रदूषण फैलाने वाला होता था. बाद में उस पानी को सीवरों में प्रवाहित कर दिया जाता.

न्‍यूयॉर्क में फैक्ट्रियों में मैरी का एयर प्‍योरीफायर

1979 के समय यह तकनीक काफी सराही गई. मैरी वॉल्‍टन ने इसका पेटेंट हासिल किया. सबसे पहले न्‍यूयॉर्क में फैक्ट्रियों ने इस तकनीक का इस्‍तेमाल करना शुरू किया. फिर मैरी अपनी इस खोज को लेकर इंग्‍लैंड गईं. वहां की सरकार ने इसकी सराहना की और अपने यहां फैक्ट्रियों में इसका इस्‍तेमाल शुरू किया. 

कम शोर करने वाले रेलरोड की खोज

मैरी वॉल्‍टन ने एक और आविष्‍कार किया था. कम आवाज करने वाली रेल की पटरियों का. उस जमाने में जिस तरह की पटरी पर रेलें चला करती हैं, वो किर्र-किर्र की बड़ी ही कर्कश आवाज करतीं. और जब ड्राइवर उस ट्रेन में ब्रेक लगाता तो बड़ी दूर तक घिर्र- घिर्र की ऐसी गगनभेदी कानफोडू आवाज आती कि लोग अपने कानों में उंगली डाल लेते. 


मैरी को लगा, कुछ तो तरीका होगा कि इस आवाज को कम‍ किया जा सके. मैरी ने मैनहट्टन के अपने घर के बेसमेंट में एक मॉडल रेलमार्ग बनाया. उन्‍हें लोहे की पटरियों के नीचे लकड़ी से बना एक फ्रेम लगाकर ऐसी पटरियां तैयार कीं, जो ज्‍यादा शोर नहीं करती थीं. उन्‍होंने इन पटरियों को टार से रंगा और उसके बीच में कपास और रेत भर दी. इस तकनीक ने आवाज को सोखने का काम किया.


जब यह तकनीक कारगर रही तो उन्‍होंने इसका एक बड़ा वर्जन तैयार किया, जिस पर सचमुच की भारी-भरकम ट्रेन चल सके. तकनीक कारगर रही. इस पटरी पर ट्रेन पहले से बहुत कम शोर करके सर्राटे से भाग रही थी.


वर्ष 1881 में उन्‍हें अपनी इस खोज के लिए दूसरा पेटेंट दिया गया. यह तकनीक बाद में उन्‍होंने न्यूयॉर्क की रेलरोड अथॉरिटीज को 10 हजार डॉलर में बेच दी. जल्‍द ही पूरे शहर और फिर देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में इस तकनीक का प्रयोग करके नई रेलवे पटरियां बिछाई गईं, जो बिलकुल शोर नहीं करती थीं.


आज हम जो रेलवे ट्रैक देखते हैं, वह मैरी वॉल्‍टन की खोजी उस तकनीक का ही एडवांस्‍ड वर्जन है.

मैरी वॉल्‍टन एक फेमिनिस्‍ट भी थीं, जिन्‍हें यकीन था कि औरतें मर्दों से किसी भी मामले में कम नहीं. इतिहास और मनुष्‍यता इस महान वैज्ञानिक स्‍त्री की ऋणी है.