YouTube वीडियो देख टीचर ने खड़ा किया वर्मी कम्पोस्ट का बिजनेस
फिरोजाबाद के शिक्षक विपिन राठौर ने ट्यूशन और सरकारी नौकरी की तैयारी छोड़कर वर्मी कम्पोस्ट का माइक्रो उद्यम शुरू किया. YouTube वीडियो, कृषि विज्ञान केंद्र की ट्रेनिंग और यूपी सरकार की ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ योजना के लोन से उन्होंने किसानों के लिए जैविक खाद का टिकाऊ मॉडल खड़ा किया.
उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में रहने वाले विपिन राठौर की जिंदगी लंबे समय तक किताबों और कॉपियों के बीच ही बीती. वह बच्चों को पढ़ाते थे. साथ ही सरकारी नौकरी की तैयारी भी करते रहे. टीजीटी जैसी कई प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो पाया. समय बीतता गया, मेहनत जारी रही, लेकिन स्थिरता नहीं मिली.
विपिन राठौर मूल रूप से फर्रुखाबाद के रहने वाले हैं. उनका गांव उस इलाके के पास है, जिसे नीम करोली बाबा से जोड़ा जाता है. करीब पच्चीस से तीस साल पहले वह फिरोजाबाद आ गए थे. यहां उन्होंने प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और उसी से घर चलाते रहे. लेकिन बार-बार की असफलताओं के बाद उन्होंने सोचना शुरू किया कि अब किसी नए रास्ते पर चलना होगा.
वीडियो ने बदली सोच
इस बदलाव की शुरुआत एक साधारण YouTube वीडियो से हुई. वीडियो में वर्मी कम्पोस्ट बनाने और उससे जुड़ी संभावनाओं के बारे में बताया गया था. विपिन को यह काम व्यावहारिक लगा. इसमें खेती से जुड़ाव भी था और आसपास के किसानों की जरूरत भी. उन्होंने तय किया कि इस दिशा में गंभीरता से सीखेंगे.
सरकारी योजना से मिला सहारा
काम को जमीन पर उतारने का मौका यूपी सरकार की ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ योजना (CM YUVA Yojana) से मिला. जिला उद्योग केंद्र (DIC) की मदद से विपिन को पांच लाख रुपये का लोन मिला.
विपिन बताते हैं कि अधिकारियों ने पूरी प्रक्रिया में सहयोग किया. खास तौर पर आकाश नाम के एक अधिकारी का जिक्र करते हैं, जिन्होंने हर कदम पर मार्गदर्शन दिया.
विपिन के अनुसार यह योजना केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि सही तरीके से काम करने वालों को आगे बढ़ाने पर जोर देती है.
प्रशिक्षण से आई आत्मविश्वास की मजबूती
यूनिट शुरू करने से पहले विपिन ने फिरोजाबाद स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में प्रशिक्षण लिया. यह केंद्र जिला उद्योग कार्यालय से करीब तीन किलोमीटर दूर है. यहां उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट बनाने की तकनीक को व्यावहारिक रूप से सीखा. प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्हें प्रमाण पत्र भी मिला. इसके बाद उन्होंने अपना यूनिट शुरू किया और अब इसे पूरे समय देते हैं.
उनका काम करने का तरीका बहुत सादा और खर्च को ध्यान में रखकर बनाया गया है. पास की एक गौशाला से गोबर लिया जाता है. इससे गौशाला को कचरा प्रबंधन में मदद मिलती है और यूनिट को नियमित कच्चा माल मिलता रहता है. कम्पोस्ट बेड एक पतली पॉलीथीन शीट पर बनाए जाते हैं, ताकि केंचुए नीचे न चले जाएं. हालांकि विपिन बताते हैं कि यह जरूरी नहीं है, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने इसे अपनाया है.
एक कम्पोस्ट बेड आमतौर पर तीस फीट लंबा और चार फीट चौड़ा होता है. ऊंचाई मौसम के अनुसार रखी जाती है. सर्दियों में करीब दो फीट और गर्मियों में डेढ़ फीट. इससे अंदर की गर्मी संतुलित रहती है. ताजा गोबर डालने के बाद सात दिन तक सुबह और शाम पानी दिया जाता है, ताकि गर्मी और गैस बाहर निकल जाए.
इसके बाद केंचुए डाले जाते हैं. विपिन आइसेनिया फेटिडा प्रजाति का इस्तेमाल करते हैं, जिसे आमतौर पर रेड विगलर या ऑस्ट्रेलियन केंचुआ कहा जाता है. जिस दिन केंचुए डाले जाते हैं, उसकी तारीख लिख ली जाती है, ताकि पूरे चक्र पर नजर रखी जा सके.
करीब एक महीने में ऊपर की पांच से छह इंच की परत तैयार हो जाती है. इसे धीरे से एक हाथ के औजार से निकाला जाता है. इससे केंचुए नीचे चले जाते हैं और उन्हें नुकसान नहीं होता. पूरे बेड को पूरी तरह खाद में बदलने में करीब दो महीने का समय लगता है.
पानी का सही संतुलन इस काम की सबसे अहम बात है. गर्मियों में दिन में दो बार हल्का पानी दिया जाता है. इतना कि नमी बनी रहे, लेकिन पोषक तत्व बहें नहीं. सर्दियों में एक या दो दिन का अंतर भी ठीक रहता है. विपिन बताते हैं कि यह केंचुआ पांच डिग्री से लेकर पैंतालीस पचास डिग्री तक के तापमान में जीवित रह सकता है, जो फिरोजाबाद जैसे इलाकों के लिए उपयुक्त है.
किसानों तक कैसे पहुंचती है खाद
तैयार खाद को बेड के किनारे जमा किया जाता है और फिर अलग ढेर में रखा जाता है. कुछ किसान बिना छनी खाद लेना पसंद करते हैं, तो कुछ को छनी हुई और बोरी में भरी खाद चाहिए होती है. यूनिट का रोजमर्रा का काम दो लोग संभालते हैं, जिनमें खुद विपिन भी शामिल हैं. एक तीस फीट का बेड तैयार करने में करीब आधा दिन लगता है.
यह यूनिट पूरी तरह स्थानीय संसाधनों पर आधारित है. गौशाला से गोबर, कृषि विज्ञान केंद्र से मार्गदर्शन और आसपास के किसान ग्राहक के रूप में. विपिन का मानना है कि इससे लागत कम रहती है, जैविक चक्र बनता है और छोटे किसानों को भरोसेमंद जैविक खाद मिलती है.
फिलहाल विपिन राठौर का ध्यान बड़े विस्तार पर नहीं है. उनकी प्राथमिकता गुणवत्ता बनाए रखना, सही समय पर खाद तैयार करना और आसपास के किसानों को नियमित सप्लाई देना है. ट्यूशन से शुरू हुआ यह सफर अब मिट्टी की सेहत सुधारने में लगा है. और यही उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है.
Edited by रविकांत पारीक



