कबाड़ इकट्ठा करने वाले बच्चों के लिए निःशुल्क सेंटर चला रहे तरुणा और सुशील

कूड़ा बीनते, मेहनत-मजदूरी करते बच्चों की गाजियाबाद की मलिन बस्तियों में निःशुल्क पाठशालाएं (सात कोचिंग सेंटर) चला रहे हैं बैंक मैनेजर तरुणा विधेय और रेलवे के अभियंता सुशील कुमार मीणा...

कबाड़ इकट्ठा करने वाले बच्चों के लिए निःशुल्क सेंटर चला रहे तरुणा और सुशील

Monday June 25, 2018,

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हमारे देश में पाँच से तेरह वर्ष उम्र के लगभग 18 लाख बच्चे प्रचंड गर्मी, शीत लहर, भरी बरसात में भी फटे जांघिये पहने, खुले बदन रोजाना सुबह से ही दो जून की रोटी के लिए कूड़ों के ढेरों पर रेंगते रहते हैं। एक महिला बैंक मैनेजर और दूसरे रेलवे के अभियंता अधिकारी ऐसे ही बच्चों की जिंदगी संवारने के लिए गाजियाबाद-मेरठ में निःशुल्क आधा दर्जन से अधिक कोचिंग सेंटर चला रहे हैं।

बच्चों को पढ़ाते सुशील मीणा

बच्चों को पढ़ाते सुशील मीणा


गुटखा बेचते, कबाड़ बीनते, सुलेशन व्हाइटनर पीते बच्चे हमारे देश के किस तरह के भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, यह सवाल हर किसी को विचलित कर सकता है, लेकिन सच तो यही है। ये बच्चे जोड़-जुगाड़ कर बनाए गए एंप्लीफायर पर गाना सुनते भी मिल जाते हैं।

कूड़ा बीनते, मेहनत-मजदूरी करते बच्चों की गाजियाबाद की मलिन बस्तियों में निःशुल्क पाठशालाएं (सात कोचिंग सेंटर) चला रहे हैं बैंक मैनेजर तरुणा विधेय और रेलवे के अभियंता सुशील कुमार मीणा। ये मलिन बस्तियां गाजियाबाद शहर की निर्माणाधीन बिल्डिंगों, अपार्टमेंट्स के आसपास हैं। वहां की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले ये ज्यादातर बच्चे आर्थिक अभावों में इससे पहले पढ़ाई-लिखाई की बजाए कबाड़ बीनते थे। इन पाठशालाओं में आजकल लगभग डेढ़ हजार बच्चे पढ़-लिख रहे हैं। विधेय और मीणा दोस्त हैं, जो इन बच्चों के लिए रोजाना कम से कम तीन घंटे समय देते हैं। गौरतलब है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम प्रभावी होने के बाद भी कबाड़ बीनने वाले तमाम बच्चे स्कूलों की देहरी तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

विडंबना यह है कि एक ओर स्कूल चलो अभियान चलाया जा रहा है, वहीं तमाम मासूम अब भी कबाड़ बीनने में व्यस्त पाए जा रहे हैं। इन हालात में अधिनियम के क्रियान्वयन पर प्रश्न चिह्न लग चुका है। इससे चौदह वर्ष तक के हर बच्चे को शिक्षा के अधिकार अधिनियम का कोई महत्व समझ में नहीं आता है, जबकि विभागीय अफसर ऐसे बच्चों को स्कूल चलो अभियान के दौरान विद्यालय तक लाने के झूठे दावे करते रहते हैं। प्रचंड गर्मी में फटे जांघिये पहने, खुले बदन हजारों बच्चे रोजाना सुबह से ही दो जून की रोटी के लिए कूड़ों के ढेरों पर रेंगते रहते हैं। इन बच्चों को कूड़े के ढेरों में समाई मिनरल वॉटर की बोतलों, पोलिथीन बैग, प्लास्टिक के घरेलू सामानों, रबर के टूटे खिलौनों की तलाश रहती है। हमारे देश में करीब पाँच से तेरह वर्ष उम्र के लगभग 18 लाख बच्चे या तो अपने परिवार में कलह या अति दयनीय अवस्था के कारण या फिर किसी परिजन की गंभीर बीमारी में पूरी आमदनी के खर्च हो जाने के चलते यह काम करने को मजबूर होते हैं। जब कूड़े बीनने से भी काम नहीं चलता तो वे भीख माँगने लगते हैं। ऐसे हालात में हमे विधेय और मीणा के मिशन की अहमियत समझ में आती है।

विधेय और मीणा गाजियाबाद और मेरठ में पिछले चार-पांच वर्षों से इन गरीब बच्चों के लिए आठ निःशुल्क कोचिंग सेंटर चला रहे हैं। रेलवे में वरिष्ठ खंड अभियंता सुशील कुमार मीणा मूलतः राजस्थान के हैं और इंद्रापुरम में रह रहीं यूनियन बैंक मैनेजर तरुणा विधेय सोतीगंज (मेरठ) की हैं। तीन साल पहले उन्होंने ‘निर्भेद फाउंडेशन’ नाम से अपनी एक संस्था भी बना ली है, जिसके तहत ये 18 साल तक के बच्चों के लिए इन्द्रापुरम, विजयनगर, प्रताप बिहार, वैशाली, वसुंधरा आदि में ‘निर्माण कोचिंग संस्थान’ चला रहे हैं। इन कोचिंग सेंटरों में रोजाना लगभग साढ़े चार सौ और सप्ताहांत में कुल 1752 बच्चों की उपस्थिति रहती है। सेंटर की ओर से इन बच्चों को रोजाना दूध-स्नेक्स और सप्ताह में दो दिन भोजन भी मिलता है।

विधेय और मीणा से शिक्षित हो रहे ये बच्चे न स्वयं पढ़ रहे, बल्कि अपने से छोटे बच्चों को पढ़ाने भी लगे हैं। तरुणा बताती हैं कि हर कोई नौकरी से कुछ अलग अपने मन का भी कोई काम करना चाहता है। वह इसीलिए नया कुछ कर रही हैं। उन्होंने पढ़ाने की शुरुआत तीन बच्चों से की थी, अब हर दिन सैकड़ों बच्चे पढ़ रहे हैं। इससे मन प्रसन्न रहता है। हम उन बच्चों को मुफ्त में पढ़ाई का पूरा सामान भी देते हैं। पहले उन्होंने ही इस मिशन की शुरुआत की थी। बच्चे बढ़ने लगे तो मीणा भी उनके साथ हो लिए। मीणा कहते हैं कि हमारी कोशिश है, इन बच्चों को भी अपने जीवन में बेहतर प्लेटफ़ॉर्म मिले। हमारे सहयोग और इन बच्चों के भविष्य की बेहतरी के लिए हमारे कई मित्र भी इस मिशन में मददगार बनने लगे हैं। हर सप्ताह वे भी इन बच्चों को पढ़ाने आ जाया करते हैं। ये सेंटर हम (तरुणा-मीणा) दोनो अपनी सेलरी से चला रहे हैं। इनका सिलेबस उच्च गुणवत्ता का है, यहां की लाइब्रेरी में 10,000 से ज्यादा किताबें हैं।

तरुणा विधेय

तरुणा विधेय


गुटखा बेचते, कबाड़ बीनते, सुलेशन व्हाइटनर पीते बच्चे हमारे देश के किस तरह के भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, यह सवाल हर किसी को विचलित कर सकता है, लेकिन सच तो यही है। ये बच्चे जोड़-जुगाड़ कर बनाए गए एंप्लीफायर पर गाना सुनते भी मिल जाते हैं। जब कोई कहता है कि बच्चे जिंदगी कूड़ा-करकट कबाड़ बीनने में नहीं, योगा में बिताएं तो उनकी कथनी पर तरस आता है। ऐसे बच्चों की दुनिया की तस्वीर खींचती हुई कवयित्री अनामिका लिखती हैं - 'उन्हें हमेशा जल्दी रहती है, उनके पेट में चूहे कूदते हैं और खून में दौड़ती है गिलहरी! बड़े-बड़े डग भरते चलते हैं वे तो उनका ढीला-ढाला कुर्ता तन जाता है फूलकर उनके पीछे, जैसे कि हो पाल कश्ती का! बोरियों में टनन-टनन गाती हुई रम की बोतलें, उनकी झुकी पीठ की रीढ़ से कभी-कभी कहती हैं - कैसी हो?, कैसा है मंडी का हाल?' आइए, कवयित्री नीता पोरवाल के शब्दों में 'कबाड़ बीनते बच्चे' की जिंदगी से कुछ इस तरह भी रूबरू हो लेते हैं:

घना कोहरा ही होता है

मुफ़ीद वक्त

इन मासूमों को

अपने पेट की भूख का इन्तजाम करने के लिए

जब ठण्ड से सिकुड़े होते हैं मवेशी भी

और छिपे होते है हम गर्म रजाइयो में,

आँख खोलते ही आ जाते हैं बोरे

इन नौनिहालों के कंधों पर

क्या सचमुच नहीं आता

इनके जीवन में एक भी ऐसा दिन

यह कह माँ की गोद में दुबक जाने का

“कि थोड़ा और सोने दो न माँ, आज बहुत सर्दी है”

कश्मकश में हूँ कि

क्या इनकी उंगलियाँ

हाड़ मांस की ही है?

ठीक हमारी उंगलियों की तरह

जो नहीं सुन्न होती

कडकडाती ठण्ड में भी?

सूती इकलौती कमीज़

और चप्पलो में भी

नहीं कटकटाते देखे कभी इनके दांत

यकीन करना ही होगा हमें

नहीं ये किसी अन्य ग्रह के जीव

हर सुबह ताकते हैं

पल भर के लिए धुंध भरा आसमान

और कर जाते हैं मासूमियत से प्रार्थना -

‘काश, और देर से उगे आज का भी सूरज...!’

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