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'यूज़्ड टी बैग्स' का इस्तेमाल करके ऋतु दुआ बैंकर से 'आर्टिस्ट' बन गईं

कुछ लोगों के लिए कला खुद को व्यक्त करने का एक तरीका है, जबकि बाकियों के लिए एक पागलपन। 47 वर्षीय ऋतु दुआ के लिए कला ज़िन्दगी जीने का एक तरीका है, तभी तो पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षक और बैंकर होने बावजूद ऋतु आर्टिस्ट बन गईं।

'यूज़्ड टी बैग्स' का इस्तेमाल करके ऋतु दुआ बैंकर से 'आर्टिस्ट' बन गईं

Friday May 05, 2017 , 6 min Read

"ऋतु दुआ एक ऐसी महिला हैं, जिनमें अपने आसपास की चीजों में सुंदरता को देखने की जन्मजात क्षमता है और अपनी इसी खूबी का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने यूज़्ड टी बैग्स का एक खूबसूरत उपयोग शुरू कर दिया। कलाकारी का नशा ऐसा की बैंकर की नौकरी तक छोड़ डाली।"

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ऋतु में दुनिया को एक ऐसे परिप्रेक्ष्य से देखने की क्षमता है, जो न केवल अद्वितीय है बल्कि रचनात्मक भी है। उनके हिसाब से कूड़ा-कचरा सिर्फ कल्पना की विफलता है। कोई भी अनिश्चितता पसंद व्यक्ति किसी भी बेकार सामग्री को कचरा समझ कर फेंक देगा, लेकिन ऋतु उसी कचरे को आसानी से एक खूबसूरत, अनोखा आकार और रंग दे देती हैं।

कुछ लोगों के लिए कला खुद को व्यक्त करने का एक तरीका है, जबकि दूसरों के लिए ये एक पागलपन जैसा है। 47 वर्षीय ऋतु दुआ के लिए कला ज़िन्दगी जीने का एक तरीका है। एक बैंकर और एक स्नातकोत्तर शिक्षक से कलाकार बन गयी ऋतु कहती हैं, "मैंने खुद को पूरी तरह ड्राइंग और पेंटिंग के लिए समर्पित कर दिया है, क्योंकि मुझे इससे मोहब्बत है और यही मेरा जुनून है।"

रितू को अपने आप को व्यक्त करने और दुनिया को अपने आसपास की देखी सुंदरता के बारे में जानकारी देने की तीव्र इच्छा थी। चाहे वो रंग का जादू हो या हर दिन देखे जाने वाले विभिन्न पैटर्नों के अविश्वसनीय रहस्य हों। वो दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों के बारे में बात करना चाहती थी, कि वे किस तरह के वस्त्र पहनते हैं, किस तरह की एक्सेसरीज का इस्तेमाल करते हैं। इन सब बातों ने उन्हें 2012 में उनकी कला और लेखन को समर्पित ‘Beneath my heart- Art’ नाम से एक ब्लॉग शुरू करने के लिए प्रेरित किया। ऋतु का ब्लॉग एक ऐसा मंच है जहां वह उन चीजों को दुनिया के साथ साझा करती हैं, जिन्हे वो अपने आसपास देखती हैं।

वह अपने ब्लॉग का उपयोग उन शब्दों को अभिव्यक्त करने के लिए करती हैं, जिन्हे वो अपनी कलात्मक आंखों के माध्यम से देखती हैं। ऋतु के लिए उनका ब्लॉग उन्हें दुनिया के हर हर कोने के लोगों से जोड़ने का एक माध्यम है। ऋतु कहती हैं, "मेरे पति की नौकरी के कारण हम लंबे समय से नियमित रूप से भारत में और भारत के बाहर रहे हैं। परिस्थितियों के चलते मुझे अपनी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा और मैंने कला को अपनी हॉबी के रूप में पूरी तरह से अपना लिया। मेरा मानना ​​है कि जब आप ऐसे स्थान की ओर रुख करते हैं, जहां कुछ भी सुनिश्चित नहीं है तो ये चित्ताकर्षक होने के साथ ही चुनौतीपूर्ण भी होता है। मेरी पेंटिंग्स मेरी अपनी कविताओं और लेखों से प्रेरित होती हैं। मैं जो काम कर रही हूं ये मेरी रचनात्मक सोच को प्रज्वलित करता है। कला और कविता के रूप में आश्चर्य और प्रसन्नता को प्रेरित करने के लिए ये एक स्पष्ट प्रतिबद्धता है। मैं दिल से एक सच्ची जिप्सी हूँ। मुझे संगीत में रंग, वास्तुकला में संगीत और लाइनों और ब्रश स्ट्रोक में कविता दिखाई देती हैं। ये सभी चीजें गहन रूप से जुड़ी हुई हैं और इन सब ने मेरी बहुत मदद की है"  ऋतु इन दिनों मुंबई में रहती हैं। अपने ब्लॉग के द्वारा वो अपने पाठकों से विभिन्न प्रदर्शनियों, कला त्योहारों और ईको फेयर्स के बारे में सूचनाएं साझा करती हैं, जिसमें वो भाग लेती हैं।

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ऋतु ने यूज़्ड टी बैग्स से बनाई गई कला की एक श्रृंखला पूरी कर ली है, जिसे वो 'फीलिंग्स 77' कहती हैं, जिसमें 77 दिन के लिए इस्तेमाल किए गए हर एक टी बैग पर एक दिन का अनुभव और भावना होती है।

ऋतु में दुनिया को एक ऐसे परिप्रेक्ष्य से देखने की क्षमता है जो न केवल अद्वितीय है, बल्कि रचनात्मक भी है। उनकी राय में कचरा केवल किसी की कल्पना की विफलता है। कोई भी अनिश्चितता को पसंद करने वाला व्यक्ति किसी भी बेकार सामग्री को कचरा समझ कर फेंक देगा, लेकिन ऋतु अपने कचरे को आसानी से अनोखा आकार, बनावट और रंग दे देती हैं। वो कहती हैं, "मुझे लगता है कि उनकी निष्ठाहीनता और व्यर्थता की स्थिति के विपरीत ऐसी सभी चीजों की एक कहानी होती है। ऐसे ही एक खुशनुमा दिन जब मैं पेंटिंग करते हुए अपनी चाय के हर एक घूँट का आनंद ले रही थी, तभी मैंने चाय के खूबसूरत दाग को टी बैग पर देखा।" चाय बैग पर चाय के अविश्वसनीय रंगों ने ऋतु की कल्पना को उड़ान दे दी और फिर उन्होंने उबालते समय चाय के विभिन्न रंगों को देखा और उन्होंने इस्तेमाल की हुई टी बैग्स से शिल्प बनाना शुरू कर दिया। ऋतु कहती है, "शुरू में, मैं कुछ खास हासिल करने में विफल रही, क्योंकि उस पर काम करने के लिहाज से बैग बहुत पतला और झीना था लेकिन अंततः मैं धीरे-धीरे इस पर काम करने में सफल हो सकी और आखिरकार मैं उस से लघु कलाकृतियां बना सकी।" इसमें माहिर होने के बाद (ऋतु जिसे "time-consuming yet fulfilling artwork" कहती हैं) पिछले साल मुंबई में ‘Kala Ghoda Art Festival’ में उन्होंने अपनी इन लघु कृतियों को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया, जो 'Without Borders' नामक एक थीम पर आधारित थी। कला महोत्सव में ऋतु की ये प्रस्तुति 'My Chai Tamaasha' के नाम से हुई थी। जिसमें उनक प्रस्तुती में रीसाइक्लड टी बैग्स ने डेढ़ हज़ार कप चाय को सिम्बोलाइज किया।

ऋतु के अनुसार, "प्रत्येक छोटे टी बैग के दिल में एक कहानी होती है। खुशियों के पल, हँसी, नई शुरुआत और कुछ दुःख भरी कहानियाँ भी। उनमें से प्रत्येक में आपके हृदय के तारों को झंकृत करने की ताकत होती है। ये स्वाद, सुगंध और स्मृति का एक ऐसा मिश्रण है, जो इस शिल्प में जीवंत हो उठता है।" ऋतु ने यूज़्ड टी बैग्स से बनाई गयी कला की एक श्रृंखला पूरी कर ली है, जिसे वह 'फीलिंग्स 77' कहती हैं, जिसमें 77 दिन के लिए इस्तेमाल किए गए हर एक टी बैग पर एक दिन का अनुभव और भावना होती है। 77 की सँख्या के पीछे के कारण के बारे में पूछने पर, ऋतु कहती हैं कि उन्हें एहसास हुआ कि ये संख्या आत्म-खोज के लिए आने वाले परिवर्तनों को इंगित करती है या अपने आप को समझने के माध्यम से ज्ञान बढ़ाते हुए अंततः प्रेरणा, परिवर्तन या स्वतंत्रता की ओर ले जाती है। नवंबर 2016 में ऋतु ने नवी मुंबई के "शौर्य आर्ट गैलरी" और जनवरी 2017 में 'कल्चर कनेक्ट' में अपनी कला की प्रस्तुति दी।

भविष्य की योजनाएं

ऋतु अब विशेष बच्चों के लिए एक रेसिपी-बुक पर काम कर रही हैं। वे इस तरह के बच्चों के लिए अत्यंत आसान नॉन-कुक व्यंजनों की अच्छी संख्या की रेसिपी वाली पुस्तक तैयार करना चाहती है।

ऋतु कहती हैं, "पहले की अपेक्षा बच्चे अब ग्राफिक के माध्यम से बहुत कुछ सीखते हैं। कला निस्संदेह प्रक्रिया को प्रोत्साहित करने, सोचने और चीज़ों को बेहतर बनाने का एक सशक्त माध्यम है। मुझे दृढ़ विश्वास है, कि मेरा रेसिपी इलस्ट्रेशन इन बच्चों के लिए केवल चित्रों की एक आभासी दावत नहीं होगा, बल्कि उन्हें स्वयं के लिए कुछ बनाने का प्रयास करने और अपने विशेष तरीके से एक 'विशेष बावर्ची' बनाने के लिए निश्चित रूप से प्रोत्साहित करेगाऋतु की रेसिपी-बुक में सामग्री से निर्देशों तक सब कुछ सचित्र होगा। साथ ही उनमें ऐसी रेसिपीज़ होंगी, जो आसानी से पकाई जा सकती हैं और और उन्हें माता-पिता की देखरेख में आसानी से पकाया जा सकता है।

-प्रकाश भूषण सिंह