दोनों पैरों से अपंग होने के बाद भी हिम्मत नहीं हारीं, एमडी में रहीं प्रदेश की टाॅपर

वर्ष 2007 में एक कार दुर्घटना में बैंगलोर की दंत चिकित्सक डा. राजलक्ष्मी एस.जे. की रीढ़ की हड्डी हुई क्षतिग्रस्त चोट की वजह से दोनों पैर लकवाग्रस्त हो गए और उन्हें बाकी जिंदगी के लिये आना पड़ा व्हीलचेयर परवर्ष 2010 में परस्नातक की डिग्री हासिल करने के लिये लड़ी एक लंबी कानून लड़ाईविकलांगता को कमजोरी न मानते हुए बनाया अपनी ताकत और वर्ष 2014 में मुंबई में आयोजित हुई मिस व्हीलचेयर की बनीं विजेता

18th Jul 2015
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वर्ष 2014 में मुंबई में आयोजित मिस व्हील चेयर प्रतियोगिता की विजेता बेहद जिंदादिल और साहसी व्यक्तित्व की धनी 29 वर्षीय दंत चिकित्सक डा. राजलक्ष्मी एस.जे. कहती हैं, ‘‘मैं अपने आप को बेहद धन्य मानती हूँ कि मैं एक ही जीवनकाल में जो जीवन व्यतीत कर पा रही हूँ - एक सामान्य व्यक्ति का और दूसरा एक विकलांग का।’’ वे कहती हैं कि अगर उनका सामना इस विकलांगता से नहीं हुआ होता तो वे कभी भी एक विकलांग व्यक्ति के जीवन में आने वाली चुनौतियों के बारे में जान नहीं पाती।

अपनी एक यात्रा के दौरान राजलक्ष्मी

अपनी एक यात्रा के दौरान राजलक्ष्मी


वे एक सामान्य व्यक्ति का जीवन जी रही थीं कि वर्ष 2007 में हुई एक कार दुर्घटना ने उनका जीवन ही बदल दिया। चेन्नई के रास्ते में उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई जिसके चलते उनकी रीढ़ की हड्डी क्षतिग्रस्त हो गई जिसके परिणामस्वरूप उनके दोनों पैर लकवाग्रस्त हो गए। बैंगलोर की रहने वाली डा. राजलक्ष्मी बीती बातों को याद करते हुए बताती हैं, ‘‘बीडीएस की परीक्षा में टाॅप करने और स्वर्ण पदक जीतनेे के बाद मैं अपने प्रोफेसरों के बताये अनुसार नेश्नल कांफ्रेस के लिये कुछ कागज जमा करवाने जा रही थी और उसी दौरान मेरी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई।’’

हालांकि यह एक अलग बात है कि उन्होंने इस विकलांगता को अपने रास्ते का रोड़ा नहीं बनने दिया है। इस दुर्घटना के छः महीने बाद तक भी वे अपने आप बैठने के सक्षम भी नहीं थीं और वे व्हीलचेयर को उपयोग करने मात्र के विचाार से ही इस कदर चिढ़ जाती थीं कि इस दौरान उन्होंने इसपर बैठने से ही मना कर दिया। राजलक्ष्मी कहती हैं, ‘‘कुछ समय बाद मुझे अहसास हुआ कि अगर मैं इसी प्रकार व्हीलचेयर को मना करती रहूंगी तो मैं एक ही जगह पर बंधकर रह जाऊंगी और यह एक ऐसी स्थिति होती जिसे मैं किसी भी सूरत में सहन और वहन नहीं कर सकती थी। और आज वही व्हीलचेयर मेरी सबसे अच्छी दोस्त है।’’

इस दुर्घटना ने उन्हें झझकोर कर रख दिया लेकिन वे कहती हैं, ‘‘अगर यहह दुर्घटना नहीं हुई होती तो निश्चित रूप से मैं इतनी सफल और दृढ़-निश्चयी नहीं होती।’’ उनका पूरा परिवार उनके समर्थन में खड़ा था लेकिन उन्हें इस बात का अब भी दुख होता है कि उनके आसपास के कई लोगों ने उनकी मदद करने की जगह उनसे मुंह मोड़ लिया। वे आते और बस यहीं कहते ‘अय्यो, तुम्हारा तो एक्सीडेंट हो गया,’ और औपचारिकता निभाकर चलते बनते। इस दुर्घटना के बाद भी उन्होंने अपना हौसला नहीं खोया और एमडी में 73 प्रतिशत अंकों के साथ कर्नाटक की टाॅपर बनने में सफल रहीं। राजलक्ष्मी कहती हैं, ‘‘मैं इस तरह की बातों से बहुत चिढ़ जाती थी। किसी भी विकलांग व्यक्ति को आपकी सहानुभूति या हमदर्दी की दरकार नहीं होती है बल्कि वह सिर्फ आपका समर्थन होता है जो उनके लिये बेहद आवश्यक होता है। औग अगर आप ऐसे में उन्हें समर्थन नहीं दे सकते तो कम से कम उन्हें हतोत्साहित तो मत करिये।’’

इसके बाद भी उनके लिये राह इतनी आसान नहीं थी। भारत के संविधान में शिक्षण संस्थानों में विकलांगों के लिये 3 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है लेकिन कोई इसका पालन नहीं करता है। वर्ष 2010 में उन्हें एक शिक्षण संस्थान से परस्नातक की डिग्री हासिल करने के लिये एक लंबी कानून लड़ाई लड़नी पड़ी। वे एक सरकारी काॅलेज में दंत चिकित्साधिकारी के पद पर कार्यरत होना चाहती थीं लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया और इसके बाद दो वर्ष पूर्व उन्होंने अपना एक दंत चिकित्सालय (डेंटल क्लीनिक) प्रारंभ किया।


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एक डाॅक्टर के रूप में

राजलक्ष्मी बहुत छोटी उम्र से ही डाॅक्टर बनने के सपने देखा करती थीं। चूंकि उन्होंने बचपन से ही अपने माता-पिता दोनों को घर की इमारत से क्लीनिक संचालित करते हुए देखा था इसलिये राजलक्ष्मी खुद भी उनके जैसा ही करना चाहती थीं। ‘‘स्थानीय लोग मेरे पिताजी को ‘देवारु’ कहते थे जिसका मतलब कन्नड़ में भगवान होता है क्योंकि वे उनका जीवन बचाते थे।’’ जब वे दसवीं कक्षा में पढ़ रही थीं तभी उनके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो गई।

एक डाॅक्टर बनने के अलावा वे एक सफल माॅडल बनने के सपने भी देखती थीं और इसी क्रम में उन्होंने एक बार अपनी पढ़ाई से ब्रेक लेकर फैशन डिजाइनिंग करने की ठानी। और ऐसे में जब उनके सामने एक सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर आया तो उन्होंने बिना सोचे उसमें भाग लेने के लिये हामी भर दी। इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये राजलक्ष्मी ने व्हीलचेयर बैठे-बैठे ही खुद को जिम करने से लेकर बालों की देखभाल और डायटिंग इत्यादि करने के लिये तैयार और प्रेरित किया।


प्रतियोगिता

मिस व्हीलचेयर इस दांतो की डाॅक्टर के लिये एक बहुत ही रोमांचक अनुभव साबित हुई। प्रारंभ में शामिल हुए 250 प्रतिभागियों से यह मुट्ठीभर तक सीमित हुई और फिर वे इस खिताब को जीतने में सफल रहीं।

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वह शायद उनसे पूछे गए एक सवाल के जवाब में उनकी प्रतिक्रिया रही जिसमें जजों और दर्शकों सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्हें दोबारा जीवन जीने का अवसर मिले तो वे किसका जीवन चुनेंगी और राजलक्ष्मी ने तुरंत जवाब दिया, ‘‘मेरी अपनी जिंदगी।’’ बहुआयामी व्यक्तित्वों की स्वामिनी राजलक्ष्मी ने आगे कहा, ‘‘तब मैंने एक सामान्य व्यक्ति के रूप में स्वयं द्वारा की गई गलतियों को सुधारा होता और भारत में विकलांगों की स्थिति में सुधार लाने के लिये और अधिक प्रयत्न किये होते।’’ इस बार उन्हें मिस व्हीलचेयर प्रतियोगिता के आयोजन की जिम्मेदारी दी गई है जिसके दिसंबर के महीने में बैंगलोर में आयोजित होने की संभावना है।

वे इस सच्चाई को जानती हैं कि उनकी इस विकलांगता का कोई असरदार इलाज नहीं है और उन्हें अपनी बाकी की बची हुई जिंदगी दोनों लकवाग्रस्त पांवों के साथ ही गुजारनी है। राजलक्ष्मी कहती हैं, ‘‘मौजूदा संसाधन मेरा इलाज करने में नाकाम हैं और इन स्थितियों का इलाजज करने में सक्षम स्टेम सेल शोध पर अभी काम चल रहा है जिसमें समय लगने की उम्मीद है। अगर आप मुझसे पूछें तो मैं आपसे सिर्फ यही कहूंगी कि इसका कोई इलाज नहीं है।’’

इस दुर्घटना के बाद हुए कई दौरों के फिजियोथैरेपी सत्रों के बाद अंततः राजलक्ष्मी अब स्वतंत्र हैं। वे खुद अपनी कार चलाती हैं, उनमें बेहद दृढ़ इच्छा शक्ति है और वे व्हीलचेयर पर होने के बावजूद यात्रा करने की बेहद शौकीन हैं और खूब यात्राएं करती हैं। यह युवा डाॅक्टर देश के अधिकांश भागों के अलावा कई अन्य देशों की यात्रा का भी लुत्फ उठा चुकी है लेकिन आखिर में वे भारत को ही सबसे खूबसूरत देश के रूप में पाती हैं। वास्तव में घर वहीं जहां आपका दिल है।

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