28 जून: इस दिन ने रखी दो विश्व युद्धों की नींव, जानिए कैसे!
28 जून का दिन इतिहास में कई बड़ी घटनाओं का गवाह रहा है—महारानी विक्टोरिया की ताजपोशी, संथाल विद्रोह, प्रथम विश्व युद्ध की चिंगारी, वर्साय संधि और स्टोनवॉल दंगे. जानिए इस दिन की वो कहानियां जो दुनिया बदलने की वजह बनीं. पढ़िए आज का रोचक तथ्य.
हर तारीख अपने साथ इतिहास की कई परतें समेटे हुए होती है. 28 जून (28 June Ka Itihas) का दिन भी विश्व और भारत दोनों के इतिहास में गहरा महत्व रखता है. यह दिन एक ओर जहां प्रथम विश्व युद्ध की चिंगारी बनने वाली घटना का साक्षी बना, वहीं दूसरी ओर भारत इसे संथाल विद्रोह के रूप में भी याद किया जाता है.
आज का इतिहास (History of the day) सीरीज़ में हम आपको ले चलते हैं समय की उस यात्रा पर, जहां 28 जून के दिन (28 June History) घटी प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं, जन्मी महान हस्तियां और हुई अहम बदलावों की चर्चा करते हैं. यह सीरीज़ न केवल ऐतिहासिक जानकारी देती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे एक दिन कई मायनों में इतिहास का हिस्सा बन जाता है.
आइए जानते हैं इस तारीख से जुड़ी कुछ अहम ऐतिहासिक घटनाएं जो आज भी हमारे वर्तमान को आकार देने में भूमिका निभाती हैं —
भारत और विश्व के इतिहास में 28 जून की प्रमुख घटनाएं
1838 — महारानी विक्टोरिया की ताजपोशी
28 जून 1838 को महारानी विक्टोरिया का वेस्टमिंस्टर ऐबी, लंदन में भव्य रूप से राज्याभिषेक (Coronation of Queen Victoria) हुआ. वह केवल 18 वर्ष की उम्र में ब्रिटिश साम्राज्य की रानी बनी थीं, जब उनके चाचा विलियम चतुर्थ (William IV) की मृत्यु के बाद उन्होंने सिंहासन संभाला. विक्टोरिया का यह राज्याभिषेक समारोह इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि उनके शासनकाल में ब्रिटेन ने औद्योगिक, वैज्ञानिक और साम्राज्यवादी विस्तार की ऊंचाइयों को छुआ. यह ताजपोशी ब्रिटिश साम्राज्य के उस युग की शुरुआत मानी जाती है, जिसे आज हम "विक्टोरियन युग" के नाम से जानते हैं—जो सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली रहा.
1855 — संथाल विद्रोह की शुरुआत
28 जून 1855 को सिद्धू (Sidhu) और कान्हू मुर्मू (Kanhu Murmu) के नेतृत्व में संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) की शुरुआत हुई, जिसे संथाल हूल (Santhal Hool) भी कहा जाता है. यह विद्रोह भोगनाडीह (वर्तमान झारखंड के साहिबगंज ज़िले में) से शुरू हुआ था, जब लगभग 10,000 संथाल आदिवासियों ने ज़मीन हथियाने वाले ज़मींदारों, सूदखोर महाजनों और अंग्रेजी हुकूमत की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ हथियार उठाए. संथालों ने लंबे समय से चल रहे आर्थिक और सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ संगठित होकर आवाज़ बुलंद की. यह भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहला संगठित आदिवासी जनआंदोलन माना जाता है. हालाँकि अंग्रेजों ने इसे बेरहमी से कुचल दिया, लेकिन यह विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव में एक प्रेरक चिंगारी बन गया.
1914 — आर्चड्यूक की हत्या: WWI की चिंगारी
28 जून 1914 को ऑस्ट्रिया-हंगरी के युवराज (आर्चड्यूक) फ्रांज फर्डिनेंड (Archduke Franz Ferdinand of Austria) और उनकी पत्नी सोफी (Sophie) की सरायेवो (वर्तमान बोस्निया और हर्जेगोविना की राजधानी) में हत्या कर दी गई. यह हमला गव्रिलो प्रिंसिप (Gavrilo Princip) नामक 19 वर्षीय सर्ब राष्ट्रवादी ने किया था, जो "ब्लैक हैंड" नामक चरमपंथी गुप्त संगठन से जुड़ा था, जो ऑस्ट्रिया से सर्बियाई क्षेत्रों की स्वतंत्रता चाहता था. यह हत्या एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी और इसे उस समय की राजनीतिक अस्थिरता और उग्र राष्ट्रवाद ने हवा दी थी. यह घटना प्रथम विश्व युद्ध (World War I) का तात्कालिक कारण बनी, क्योंकि इसके बाद ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया पर हमला किया और फिर देखते ही देखते यूरोप के लगभग सभी बड़े देश इस भयावह युद्ध में शामिल हो गए, जिसने लाखों लोगों की जान ली और इतिहास की दिशा ही बदल दी.
1919 — वर्साय संधि पर हस्ताक्षर
28 जून 1919 को वर्साय की संधि (Treaty of Versailles) पर हस्ताक्षर किए गए, जिससे प्रथम विश्व युद्ध का औपचारिक अंत हुआ. यह संधि फ्रांस के वर्साय महल (Palace of Versailles) में जर्मनी और विजयी मित्र राष्ट्रों (Britain, France, USA आदि) के बीच हुई थी. संधि की शर्तें बेहद कठोर थीं—जर्मनी को युद्ध के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया गया, उसे भारी युद्ध क्षतिपूर्ति देनी पड़ी, उसकी सेना सीमित कर दी गई, और कई क्षेत्रों को खोना पड़ा. यह संधि उसी दिन हस्ताक्षरित हुई, जिस दिन 1914 में फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या हुई थी—एक प्रतीकात्मक चयन. वर्साय संधि ने जर्मनी में गहरा असंतोष, आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता पैदा की, जिसने अंततः हिटलर (Adolf Hitler) के उदय और द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) की नींव रखी.
1969 — न्यूयॉर्क में स्टोनवॉल दंगे
28 जून 1969 को अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर (New York City) के ग्रीनविच विलेज (Greenwich Village) इलाके में स्थित एक गे बार "स्टोनवॉल इन" (Stonewall Inn gay bar) पर पुलिस ने छापा मारा, जिसके खिलाफ वहां मौजूद LGBTQ+ समुदाय ने अचानक और संगठित रूप से विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. यह विरोध शांत नहीं था—यह तीव्र प्रतिक्रिया और संघर्ष में बदल गया, जिसे आज हम स्टोनवॉल दंगे (Stonewall Riots) के नाम से जानते हैं. यह घटना LGBTQ+ इतिहास की एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई, जिसने अमेरिका और दुनिया भर में क्वीयर समुदाय के अधिकारों (Gay Rights) और पहचान के लिए आंदोलन की शुरुआत को गति दी. इन दंगों की वर्षगांठ को सम्मान देने के लिए ही हर साल जून को 'प्राइड मंथ' (Pride Month) के रूप में मनाया जाता है. इसलिए 28 जून न सिर्फ विरोध का दिन था, बल्कि यह समानता और स्वीकृति की लड़ाई की शुरुआत भी थी.
28 जून को जन्मे प्रमुख व्यक्ति
1921 — पीवी नरसिम्हा राव, भारत के 9वें प्रधानमंत्री
1971 — ईलॉन मस्क, दक्षिण अफ्रीकी-कनाडाई-अमेरिकी दिग्गज व्यापारी, निवेशक और इंजीनियर
1976 — जसपाल राणा, पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित भारत के प्रसिद्ध निशानेबाज
1995 — मरियप्पन थंगावेलु, भारतीय पैरालिंपिक हाई जम्पर
28 जून को जिन हस्तियों ने दुनिया को कहा अलविदा
1972 — पी. सी. महालनोबिस, प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद
आज का रोचक तथ्य
क्या आप जानते हैं (Did you know) कि आज ही के दिन, 28 जून 1926 को तीन कंपनियों के विलय से प्रसिद्ध ऑटोमोबाइल ब्रांड मर्सिडीज-बेंज (Mercedes-Benz) की स्थापना हुई थी? यह नाम इसकी पूर्ववर्ती कंपनियों से लिया गया था और शुरुआत में इसे डायमलर-बेंज (Daimler-Benz) कहा जाता था. यह विलय जर्मनी की दो प्रमुख कंपनियों — बेंज एंड कंपनी और डायमलर मोटरन गेसलशाफ्ट के बीच हुआ था, जिसने आगे चलकर दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित लग्जरी कार ब्रांडों में से एक को जन्म दिया.
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