एक अर्थशास्त्री, जिन्होंने बच्चों को साक्षर और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए छोड़ दी आराम की ज़िंदगी

By Harish Bisht
February 26, 2016, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:18:13 GMT+0000
एक अर्थशास्त्री, जिन्होंने बच्चों को साक्षर और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए छोड़ दी आराम की ज़िंदगी
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अकसर कहा जाता है कि जिन माहौल में आप रहते हैं उसके आदि हो जाते हैं, उसकी आदत आपकी दिनचर्या में रच-बस जाती है। यही वजह है कि आमतौर पर लोग अपनी आदतों के मोहपाश में इतना बंध जाते हैं कि उसको छोड़ना मुश्किल हो जाता है। लेकिन कई बार कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इन आदतों को त्याग देते हैं, ऐशो-आराम की ज़िंदगी को छोड़ देते हैं और पहुंच जाते हैं बिलकुल विपरीत स्थितियों में। वो इंसान, जिसने अपनी ज़िंदगी का ज्यादातर वक्त मुंबई जैसे महानगर में गुजारा, वो आज एक छोटे से गांव में रह रहा है। वो शख्स जो करीब 40 सालों तक बड़े अर्थशास्त्री की भूमिका में था, वो आज गरीब और निरक्षर बच्चों को ना सिर्फ शिक्षित कर रहा है बल्कि महिलाएं आर्थिक रूप से कैसे अपने पैरों पर खड़ी हों, ये बात उनको सीखा रहा है। गोपाल कृष्ण स्वामी, ये नाम है उस इंसान का, जो उत्तराखंड की राजधानी देहरादून और मसूरी के बीच एक गांव पुरकुल में रहकर अपनी संस्था ‘पुरकल यूथ डेवलपमेंट सोसायटी’ और ‘पुरकल स्त्री शक्ति’ के जरिये समाज को अपनी ओर से कुछ देने की कोशिश कर रहा है।


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गोपाल कृष्ण स्वामी पेशे से अर्थशास्त्री हैं और करीब 40 साल मुंबई में रहकर विदेशी मुद्रा विनियम में, आयातकों और निर्यातकों के साथ सलाहकार के तौर पर काम किया। जब उन्होंने अपने इस काम से रिटायरमेंट के बारे में सोचा तो उन्होंने फैसला लिया वो अपने नवी मुंबई के अपने घर को बेच कर हिमालय क्षेत्र में रहेंगे और समाज के लिए कुछ काम करेंगे। बस उनकी यही सोच उनको अपने परिवार के साथ देहरादून खींच लाई और आज पिछले 20 सालों से वो यहां रहकर निरक्षर बच्चों को ना सिर्फ साक्षर बनाने का काम कर रहे हैं, बल्कि यहां की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में भी जुटे हैं।


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स्वामी का कहना है कि उन्होंने 20 सालों से उत्तराखंड के देहरादून में रहकर समाज के लिये कुछ करने की कोशिश है। यहां पर स्वामी ‘पुरकल यूथ डेवलपमेंट सोसायटी’ के लिये काम कर रहे हैं। पुरकल यूथ डेवलपमेंट सोसायटी शिक्षा से जुड़ा काम करती है। जहां पर चार सौ से ज्यादा बच्चे मुफ्त में पढ़ाई कर रहे हैं और इस साल अप्रैल के बाद ये संख्या 5सौ को पार करने की उम्मीद है। ये प्री क्लास से लेकर 12 तक है दो सीबीएससी से मान्यता प्राप्त है। खास बात ये है कि उनकी संस्था भले ही स्कूल के तौर पर काम करती हो लेकिन यहां पर बच्चों को पढ़ाई के साथ नैतिक शिक्षा और दूसरी तरह की विधाओं में पारंगत किया जाता है। स्कूल में पढ़ाई के अलावा कई तरह की एक्टिविटीज करवाई जाती हैं। जिसमें डांस, योग, खेल और बेकिंग सिखाई जाती है। पिछले 16 सालों से स्वामी और उनकी पत्नी इन बच्चों के लिए विकास के लिए पूरी तरह समर्थित है।


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गोपाल कृष्ण स्वामी ने जब इस स्कूल की शुरूआत की थी तब यहां पर दूर दूर तक कोई स्कूल नहीं था और गांव वालों की हालत काफी बदतर थी, लेकिन आज इस स्कूल के खुलने से आसपास के बच्चों को ना सिर्फ मुफ्त शिक्षा दी जाती है बल्कि, कपड़े, खाना और बस की सुविधा भी दी जाती है। स्वामी ने योरस्टोरी को बताया, 

“बच्चे हफ्ते में 6 दिन और दिन के 10 घंटे हमारे साथ रहते हैं। इसलिए हम कोशिश करते हैं कि बच्चों को शिक्षा के साथ उनके स्वास्थ्य, न्यूट्रिशन और प्रोटीन पर ध्यान दें। इसके पीछे आइडिया ये है कि बच्चों का विकास सही तरीके से हो।” 

यही वजह है कि आज करीब 15-16 सालों से बच्चे इनके साथ रह रहे हैं। स्वामी का कहना है कि जब उन्होंने स्कूल की शुरूआत की थी तब वो सिर्फ 10 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को अपने यहां रखते थे लेकिन अब 3 से 4 साल के बच्चे भी उनके यहां पढ़ने के लिए आ रहे हैं। इनमें से कई बच्चे काफी अच्छा काम कर रहे हैं। स्वामी की कोशिश है कि यहां पढ़ने वाले बच्चों को हॉस्टल की सुविधा भी दें ताकि बच्चों का विकास बेहतर तरीके से हो। 


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‘पुरकल स्त्री शक्ति’ के जरिये महिलाओं में कौशल को निखारने का काम किया जाता है। यहां पर महिलाएं पेचवर्क से जुड़ा काम करती हैं और 45 से ज्यादा उत्पाद तैयार करती हैं। महिलाओं के बनाये इन उत्पाद को ऑर्डर दिलाने में ये उनकी मदद करते हैं साथ ही महिलाओं के बनाये उत्पादों के लिये नया बाजार तैयार करते हैं। आज करीब 180 महिलाएं इनके साथ जुड़ी हैं। जिनको ये ना सिर्फ काम करने की जगह मुफ्त में देते हैं बल्कि दूसरी कई तरह की सुविधाएं भी मुहैया कराते हैं ताकि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। इसके अलावा महिलाओं ने इनकी मदद से सेल्फ हेल्प ग्रुप भी तैयार किये हैं जहां मिलकर ये कई तरह के उत्पाद बनाती हैं।


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इसके अलावा पुरकल से करीब 10 किलोमीटर दूर दो दूसरे सेंटर भी हैं जहां पर 90 महिलाएं काम करती हैं। यहां आने जाने के लिए महिलाओं को मुफ्त में बस की सुविधा मिली है। साथ ही यहां आने वाली नई महिलाओं को मुफ्त में काम सीखाया जाता है। महिलाओं को रियायत दर पर खाना मिलता है और मेडिकल सुविधाएं भी मुहैया कराती है। यहां आने वाली महिलाओं के बच्चों को स्कूल में मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था की गई है।


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स्वामी ना सिर्फ शिक्षा और महिलाओं के क्षेत्र में काम कर रहे हैं बल्कि जिन गांव में टॉयलेट की सुविधा नहीं है वहां पर उसे बनवाने का काम कर रहे हैं। ये अब तक उत्तराखंड में 50 से ज्यादा घरों में टॉयलेट की सुविधा दे चुके हैं। इस साल इनका लक्ष्य पास के शिवली गांव में 20 से ज्यादा टॉयलेट बनाने की है। 

वेबसाइट : www.purkal.org


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