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भारी स्कूली बस्तों का एक समाधान ‘येलो बैग’, जो है थ्री इन वन

भारी स्कूली बस्तों का एक समाधान ‘येलो बैग’, जो है थ्री इन वन

Thursday March 03, 2016 , 6 min Read

हर सुबह स्कूल जाते बच्चों के चेहरे पर उनके बस्ते का बोझ साफ देखा जा सकता है। इस बोझ को कम करने के लिये कई लोगों ने सोचा, कई सरकारों ने नीतियां तक बनाई लेकिन ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। बावजूद एक इंसान ने इस समस्या को गंभीरता से लिया और ऐसा स्कूल बैग तैयार किया जिसका वजन ही सिर्फ दो सौ ग्राम है, इस बैग में पानी का बिल्कुल असर नहीं होता और सबसे खास बात ये कि जमीन पर बैठकर कोई भी बच्चा इसे टेबल के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है। इतनी सारी खूबियों के बावजूद इस बैग की एक ओर खूबी है और वो है इसमें लगी सोलर लाइट। ताकि जिन इलाकों में बिजली की समस्या है वहां भी बच्चे रोशनी में अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।


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देश में शिक्षा पाना हर बच्चे का मौलिक अधिकार है और सरकार भी हर बच्चे तक शिक्षा पहुंचाने के लिए लगातार कोशिश में लगी रहती है। सरकार की अनेक योजनाएं हैं जिनके जरिये कई स्कूलों में बच्चों को मुफ्त में किताबें, ड्रेस और दोपहर का भोजन बच्चे को उपलब्ध कराया जाता है, जिससे की गरीब से गरीब बच्चा भी शिक्षा हासिल कर सके। इन सबके बावजूद बच्चों के सामने जो सबसे बढ़ी परेशानी आती है वो है की स्कूल से मिलने वाली किताबों को वो किसमें रखें क्योंकि इन बच्चों के पार कोई भी अच्छा स्कूल बैग नहीं होता। बच्चों की इसी समस्या को दूर करने की कोशिश की है राजस्थान उदयपुर में रहने वाले मनीष माथुर ने।


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मनीष ने स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उदयपुर के एक कॉलेज से बीबीए किया। इसके बाद उन्होने साल 2009 में गुड़गांव के स्काई लाइन बिजनैस स्कूल से मानव संसाधन जैसे विषय पर एमबीए किया। मनीष ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद 1 साल तक उदयपुर के ताज लेक पैलेस में एचआर एक्जयूक्यूटिव के रूप में नौकरी की उसके बाद उन्होने ज़ोनल मैनेजर के रूप में 2 साल तक पायरोटैक वर्क्स स्पेस में काम किया। नौकरी के दौरान मनीष सोचने लगे कि कुछ ऐसा किया जाये जो दूसरों से अलग हो और उसका फायदा समाज को मिले, यही वजह थी कि उन्होने पढ़ाई खत्म करने के बाद तीन साल अलग अलग जगहों पर काम किया।


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मनीष ने योर स्टोरी को बताया कि “मैंने उदयपुर के सरकारी स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान मैंने देखा कि उदयपुर के आस-पास कई जनजातीय इलाके हैं जहां के सरकारी स्कूलों में कई बच्चे पढ़ते थे। इन स्कूलों में बच्चों को अप्रैल-मई में जो किताबें मिलती थी वो बारीश में भीगने के कारण अगस्त सितंबर तक फट जाती थी और जब फरवरी मार्च तक उनकी परीक्षाएं होती थीं तब तक उनके पास वो किताबें किसी काम की नहीं होती थीं।” मनीष का मानना है कि आज हम कितनी भी विकास की बातें क्यों न कर लें लेकिन गांवों में आज भी कक्षा 1 से 5वीं तक के बच्चे जमीन में बैठकर ही पढ़ाई करते हैं और घर पहुंचने पर उन्हें लाइट न होने पर लैंप की रोशनी में ही पढ़ाई करनी पड़ती हैं। इन दोनों समस्याओं की वजह से एक तो उनकी रीढ़ की हड्डी पर बुरा असर पड़ता है इस कारण कुछ वक्त बाद पीठ दर्द जैसी समस्या हो सकती हैं और दूसरा कम रोशनी की वजह से उनकी आँखें भी खराब हो सकती हैं।


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मनीष ने साल 2014 में अपनी नौकरी छोड़ अपनी सोच को साकार करने का फैसला लिया। उन्होने तय किया कि वो एक ऐसा बैग बनाएंगे जो इन बच्चों के लिए फायदेमंद हो और उनकी किताबें भी सुरक्षित रहें। इस तर करीब 6 महीने तक वो और उनके दोस्त इस बैग पर काम करते रहे और अक्टूबर 2014 में उन्होने एक ऐसा बैग तैयार किया जो उनकी सोच के मुताबिक था।


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मनीष ने अपने इस बैग को नाम दिया येलो। इस बैग की खासियत ये है कि स्कूल आते जाते समय ये स्कूल बैग का काम करता है साथ ही बारीश और पानी का इस बैग पर कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि ये बैग पालीप्रोपलीन से बना है। किताबें रखने के साथ ये बैग पढ़ाई के दौरान 35 डिग्री के कोण पर टेबल का काम भी करता है। इस बैग में एक सोलर एलईडी बल्ब लगा है जिससे की बच्चे रात में आराम से उजाले में पढ़ाई कर सकें।


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मनीष कहते हैं किसी भी स्टार्टअप को शुरू करने में परेशानी तो आती ही हैं और अगर वो स्टार्टअप सामाजिक हो तो उसमें कोई भी सहयोग करने को तैयार नही होता है क्योंकि इसमें जल्दी रिर्टन नहीं मिलता। मनीष शुरूआती निवेश के बारे में बताते हुए करते हैं कि ‘येलो बैग’ में उन्होने अपनी बचत का पैसा लगाया है और कुछ पैसा उन्होने दोस्तों और रिश्तेदारों से उधार लिया है। वे बताते हैं इस काम में उनको और उनके दोस्तों के साथ परिवार के लोगों ने बहुत मदद की है।


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मनीष ने ‘‘येलो बैग’’ को गरीब बच्चों को ध्यान में रखकर बनाया है। पालीप्रोपलीन से तैयार एक मजबूत और पानी में बेसअसर रहने वाला ये प्लास्टिक बैग है। इस बैग में कोई भी जोड़ नहीं है इसे सिर्फ एक सीट से ही तैयार किया गया है जिससे की सिलाई उधड़ने का डर न रहे। इस बैग का वजन सिर्फ दो ग्राम है। मनीष के मुताबिक ये बैग बिना किसी परेशानी के एक साल तक आराम से चल सकता है।


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मनीष ने ‘येलो बैग’ को न्यूनतम लागत पर तैयार किया है उन्होंने जब ‘येलो बैग’ को बाजार में उतारने की तैयारी की तब उन्होने सोचा- “मैंने जिन बच्चों को ध्यान में रखकर इस बैग को तैयार किया है वे तो 50 रूपये की कोई चीज भी नहीं खरीद सकते जबकि ये बैग 799 रुपये का है इसे वे कैसे खरीदेंगे।” मनीष ने तब इसे एनजीओ, कॉरपोरेट और सरकारी विभागों के जरिये इस बैग को मुफ्त में गरीब बच्चों तक पहुंचाने के बारे में सोचा। उन्होंने देखा कि कई कॉरपोरेट सीएसआर योजना के तहत शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देते हैं। मनीष ने कई औद्योगिक और व्यापारिक घरानों जिनमें प्रमुख हैं महिंद्रा एंड महिंद्रा, एलएंनटी, टाटा, एचडीएफसी हैं के जरिये करीब 5 हजार बैग अब तक गरीब बच्चों को बांट चुके हैं। इस बैग को उन्होने चैन्नई, कोयम्बटूर, मुंबई, कल्यान, छत्तीसगढ़, और राजस्थान में बांट चुके हैं। सरकारी स्तर पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय में भी उनकी बात चल रही है इसके अतिरिक्त कई दूसरे संगठनों से भी इस बैग के बारे में वो बात कर रहे हैं।


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भविष्य की योजनाओं बारे में मनीष का कहना है कि “इस साल हमारा लक्ष्य करीब 20 हजार बच्चों तक इस बैग को पहुंचाने का है। जबकि देश में इस तरह के करीब 4 करोड़ बैगों की जरूरत है अगर हमें सरकारी सहयोग मिले तो हम इन सभी बच्चों तक इस बैग को पहुंचाना चाहते हैं।”