आप भी जानिए, कैसे एक शख्स बना ईंट-भट्ठे पर मजदूरी और ठेले पर चाय बेचकर ‘मिस्टर दिल्ली'...

By Husain Tabish
April 12, 2016, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:17:16 GMT+0000
आप भी जानिए, कैसे एक शख्स बना ईंट-भट्ठे पर मजदूरी और ठेले पर चाय बेचकर ‘मिस्टर दिल्ली'...
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सफलता का कोई शॉट-कट रास्ता नहीं होता, और न ही कामयाबी की इबारत कभी रातों-रात लिखी जाती है। हर एक सफलता के पीछे संघर्ष की एक लंबी और अंतहीन-सी दास्तान होती है, जिसे पार कर एक कामयाब शख्स उस मुकाम पर पहुंच पाता है। और यह तभी मुमकिन होता है जब इंसान तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार और वफादार बना रहता है। इस तरह के सतत् लगन, समर्पण और कठिन परिश्रम के बाद मिली सफलता हमेशा टिकाऊ होती है और वह तमाम वैसे लोगों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनती है, जो समान लक्ष्य की दिशा में प्रयत्नशील होते हैं। ऐसी ही कामयाबी की एक मिसाल हैं दिल्ली के बॉडी बिल्डर विजय कुमार। विजय कुमार को 10 अप्रैल 2016 को ‘मिस्टर दिल्ली’ चुने जाने पर गोल्ड मेडल से नवाजा गया है। विजय कुमार की ये सफलता 11 अप्रैल को अखबारों और खबरिया चैनलों में सुर्खियों में रही। देखते ही देखते विजय कुमार दिल्ली और एनसीआर के उन तमाम बॉडी बिल्डरों के लिए एक आदर्श बन गए, जो जिंदगी में मिस्टर दिल्ली या इस तरह का कोई अन्य खिताब पाना चाहते हैं। लेकिन कामयाबी की इस मंजिल तक पहुंचने में विजय कुमार के संघर्षों का वह कांटों भरा सफर और पांव में पड़े छालों को शायद किसी ने नहीं देखा होगा। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने ईंट-भट्ठे में मजदूरी करने से लेकर दूध बेचने और दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी में चाय का ठेला लगाने तक का काम किया है। दिन -रात एक कर, जी तोड़ मेहनत से अपने लक्ष्य को साधा है। पर इस कामयाबी के बाद भी उनके कदम ज़मीन पर हैं। वह अपना बीता हुआ कल नहीं भूले हैं, और अपने ही जैसे युवाओं को मुफ्त में दे रहे हैं बॉडी बिल्डर बनने के टिप्स। आखिर क्या हैं ‘मिस्टर दिल्ली’ बनने का सच और उनकी भविष्य की योजनाएं? विजय ने साझा किया योर स्टोरी से अपना अनुभव।


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बाल मजदूरी से लेकर दूध तक बेचा

एक गरीब के सर से बाप का साया उठने का मतलब क्या होता है, ये विजय कुमार से बेहतर शायद ही कोई जानता हो। जब विजय की उम्र महज 10 साल की थी, तभी उनके दिहाड़ी मजदूर पिता का देहांत हो गया। पिता की मौत के बाद अपने पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े विजय के सर पर मानों दु:खों का पहाड़ टूट गया। विजय ने फिर कभी पलट कर न अपना बचपन देखा न अपना किशोरावस्था। वह अचानक बड़े से हो गए। विजय का कहना है, 

"घर का खर्चा चलाने के लिए मां ने पिता के साथी मजदूरों के साथ मुझे ईंठ-भट्ठे पर मजदूरी के लिए भेज दिया। वहां जी तोड़ मेहनत करने पर रोजाना 10 से 15 रुपए मिल जाते थे, जिसे लाकर मैं अपनी मां के हाथ में रख देता था। ये सिलसिला सालों तक यूं ही चलता रहा। एक अरसे के बाद हमने मजदूरी से जमा की गई रकम से एक भैंस खरीदी, जिसके बाद मैंने मजूदरी छोड़ कर कुछ अपनी और कुछ किसानों से खरीदे हुए दूध को शहर जाकर बेचने का काम शुरू किया।" 

जिंदगी के इन तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद विजय के दिल में एक अरमान पल रहा था। वह अक्सर गांव के अखाड़ों पर मुस्टंडे पहलावानों को आपस में दो-दो हाथ कर अपनी ताकत आजमाते हुए देखा करते थे। पहलवानों की बॉडी उन्हें लुभाती थी। वह उनकी तरह अखाड़े में किसी से लड़ना और भिड़ना चाहते थे, लेकिन हालात से मजबूर विजय ने अपने इस शौक को सालों तक बस अपने दिल में दबाए रखा। अपने सपनों को जिंदा रखा।


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दिल्ली में मिला मंजिल का रास्ता

लगभग पांच-छह सालों तक उत्तर प्रदेश के मेरठ के केहावी गांव में संघर्ष करने वाले विजय 15 साल पहले रोजी-रोटी की तलाश में मेरठ से दिल्ली आ गए। यहां उन्होंने डिफेंस कॉलोनी के पास चाय की एक दुकान लगानी शुरू कर दी। इस नए व्यवसाय के संभलते ही विजय ने वर्षों से अपने अंदर पल रहे शौक के बारे में सोचा और उसपर अमल करना शुरू कर दिया। बॉडी बिल्डिंग के लिए उनका नया ठिकाना बना लाजपत नगर में अशोक भाई का जिम। विजय बताते हैं, 

"यहां के जिम मालिक सुभाष भड़ाना को लगा कि मैं बॉडी बिल्डिंग में अच्छा कर सकता हूं। उन्होंने मेरी प्रतिभा को पहचाना और उसे निखारने की पहल की। सुभाषा भड़ाना जी मेरे गुरु और मेंटर हैं। असल में सुभाष भड़ाना जी खुद बॉडी बिल्डिंग में चैम्पियन रह चुके हैं, और वह युवाओं को बॉड बिल्डिंग के लिए आगे बढ़ाते हैं।" 

विजय ने इस जिम में अपनी बॉडी के लिए जी तोड़ मेहनत की। वह अकसर दिन में काम और रात में बॉडी बिल्डिंग के लिए मेहनत करते थे। एक बॉडी बिल्डर के डायट के मुताबिक उन्हें कभी ढंग का आहार नहीं मिला। इसके बावजूद वह घंटों जिम में अपना खून पसीना बहाकर अपनी बॉडी को आकार देते रहे। इस काम में सुभाष भड़ाना ने उनका भरपूर सहयोग किया। विजय अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरु को देते हैं।


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जब यूपी का छोड़ा बना ‘मिस्टर दिल्ली’

विजय कुमार की सालों की मेहनत उस वक्त रंग लाई जब वह 10 अप्रैल 2016 को दिल्ली में वर्ल्ड बॉडी बिल्डिंग फेडरेशन और दिल्ली बॉडी बिल्डिंग फेडरेशन द्वारा आयोजित कम्पटीशन में दिल्ली सहित कई राज्यों से आए बॉडी बिल्डरों को पछाड़ते हुए गोल्ड मेडल जीता। इस जीत के साथ ही उन्हें ‘मिस्टर दिल्ली’ घोषित कर सम्मानित किया गया। हालांकि विजय की ये कोई पहली जीत नहीं है। इससे पहले वह कई मुकाबलों में हिस्सा लेकर टॉप रैंकिंग में अपनी जगह बना चुके हैं। वह दिल्ली में ‘मिस्टर वाईएमसी’ भी रह चुके हैं। वर्ष 2011 में मिस्टर कोलकाता के मुकाबले में वह पांचवे स्थान पर रह गए थे। वह मिस्टर एशिया खिताब में भी हिस्सा ले चुके हैं, लेकिन वहां वह मेडल नहीं जीत पाए। इसकी वजह वह पैसे की कमी को बताते हैं, क्योंकि उन्हें वह सारी सुविधाएं नहीं मिल पाती थी जो एक बॉडी बिल्डर के लिए जरूरी होती है। अब आगे विजय का लक्ष्य मिस्टर इंडिया, मिस्टर एशिया और मिस्टर यूनिवर्स है। वह देश के लिए आगे के मुकाबले में हिस्सा लेकर जीतना चाहते हैं। फिलहाल मेरठ जिले के एक गांव के छोड़े की इस सफलता पर दिल्ली सहित मेरठ में उत्साह का माहौल है। बॉडी बिल्डिंग में लगे मेरठ के तमाम लोगों के लिए विजय किसी प्रेरणा से कम नहीं।


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गांव में जिम खोलकर चाहते हैं मिटटी का कर्ज अदा करना

दिल्ली से सटे नोएडा के सेक्टर-93 में आज ‘हेल्थ क्लब’ नाम से विजय कुमार का अपना एक जिम है। यहां वह लोगों को सामान्य फिटनेस से लेकर प्रोफेशनल बॉडी बिल्डिंग तक की ट्रेनिंग देते हैं। ये जिम उन्होंने कभी दोस्तों से उधार लेकर खोली थी, लेकिन आज यह काफी अच्छा चल रहा है। इस जिम में ढेर सारे वैसे लोग भी ट्रेनिंग ले रहे हैं, जिनके पास सुविधाओं का अभाव है। वह पैसे देने के काबिल नहीं हैं। विजय ऐसे लोगों को मुफ्त में ट्रेनिंग देते हैं। विजय इस समय विपिन त्यागी, कुलदीप त्यागी, अमित पाल, कंचन लोहिया, सुरजीत चौधरी और प्रशांत चौधरी सहित कुल छह लोगों को मिस्टर इंडिया कंपटिशन के लिए ट्रेनिंग दे रहे हैं। उनका एक और सपना है। विजय का कहना है, 

"मेरा एक सपना है। मैं अपने पैतृक गांव में भी ऐसी प्रतिभाओं को कोचिंग देकर आगे बढ़ाना चाहता हूं, जिनके पास पैसे की कमी हो पर टैलेंट की भरमार हो। मैं उनके लिए गांव में एक जिम खोलना चाहता हूं। गांव की मिट्टी का बड़ा कर्ज है, जिसे मैं उतारना चाहता हूं।" 

आखिर जिंदगी के बुरे दौर में गांव में ही उन्हें जीने का सहारा मिला था। उनकी मां आज भी उसी गांव में रहती हैं, और आज भी उनके घर में एक भैंस है। विजय को बस एक बात का मलाल है कि जिंदगी की कशमकश में उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई।

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