उस बहादुर महिला आईपीएस की कहानी जिसकी देखरेख में कसाब और याकूब को दी गई फांसी

By जय प्रकाश जय
May 06, 2018, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:15:18 GMT+0000
उस बहादुर महिला आईपीएस की कहानी जिसकी देखरेख में कसाब और याकूब को दी गई फांसी
बहादुर महिला IPS मीरा जिनकी देखरेख में दी गई कसाब और याकूब को फांसी...
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देश की सबसे बहादुर महिला आइपीएस अधिकारियों में एक नाम है फ़ाजिल्का (पंजाब) की मीरा चड्ढा बोरवांकर का, यद्यपि अक्तूबर 2017 में वह महाराष्ट्र के पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ब्यूरो के डायरेक्टर जनरल पद से रिटायर हो चुकी हैं लेकिन किरण बेदी से प्रेरित इस महिला आइपीएस की उपलब्धियों और कामयाबियों पर आज पूरे फाजिल्का को गर्व होता है। मुंबई पुलिस के डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में वह पहली ऐसी महिला आइपीएस रही हैं, जिन्हें लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा।

मीरा बोरंवकर (फोटो साभार- इंडिया ओपिनियन)

मीरा बोरंवकर (फोटो साभार- इंडिया ओपिनियन)


कसाब को फांसी देने के मामले को गुप्त रखने के उन्हें सरकार से खास निर्देश थे। यहाँ तक कि इसकी भनक मीडिया को भी न लगे। इसलिए उनको अपनी गाड़ी छोड़कर गनर की बाइक से यरवदा जेल जाना पड़ा। 

महाराष्ट्र कैडर की पहली महिला आईपीएस हैं मीरा बोरवंकर। पूरा नाम है - मीरा चड्ढा बोरवांकर। देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी उनकी प्रेरणास्रोत रही हैं, और 'मर्दानी' की अभिनेत्री रानी मुखर्जी की आदर्श रही हैं मीरा बोरवंकर। मीरा चड्ढा बोरवांकर का जन्म और पढ़ाई-लिखाई फाज़िल्का (पंजाब) में हुई थी। उनके पिता ओपी चड्ढा बीएसएफ (बॉर्डर सिक्यूरिटी फ़ोर्स) में रहे। उनकी पोस्टिंग फाज़िलका में ही थी। इसी दरमियान मीरा ने मैट्रिक तक शिक्षा पाई। इसके बाद 1971 में उनके पिता का तबादला हुआ तो उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई जालंधर से की। वहीं डीएवी कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया।

मीरा शुरू से ही ही बहुमुखी प्रतिभा की धनी रही हैं। बाद में उन्होंने अमरीकी विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। हुबर्ट हम्फ्रे फैलोशिप के लिए 1997 में उन्हें राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया। इसके अलावा भी उन्हें कई पुरस्कार मिले। नब्बे के दशक में उनके कार्यकाल में जलगांव सेक्स घोटाले की जाँच हुई थी। उनके पति अभय बोरवंकर भी आइएएस रहे हैं। महाराष्ट्र कैडर की इस पहली महिला आईपीएस अधिकारी से जब कोई पूछता कि उन्होंने क्योंकि पुलिस विभाग को ही अपने जीवन का लक्ष्य चुना तो उनका साफ जवाब होता कि 'मैं पढ़ाई में भी अच्छी थी, नाटकों में भाग लेने में भी अच्छी थी, वाद-विवाद में भी और मैं पंजाब के क्रिकेट टीम में भी अच्छी थी। मुझे यकीन था कि जीवन में कुछ नया करूंगी। स्वयं को सिर्फ शादीशुदा जीवन तक सीमित नहीं रखूंगी। जब मैं 1971-72 के दौरान कॉलेज में थी, किरण बेदी पहली महिला आईपीएस बनकर लहर पैदा कर रही थीं। एक दिन मेरे शिक्षकों ने मुझे फोन कर कहा कि मुझे भी आईपीएस करियर को विकल्प बनाना चाहिए। अंग्रेजी से एमए करने के बाद मैंने यूपीएससी परीक्षा दी, सेलेक्ट हुई और एसवीपी राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद प्रशिक्षण लेने चली गई।'

आज मीरा चड्ढा बोरवांकर की गणना देश के गिने-चुने अत्यंत साहसी आपीएस में होती है। उनको अंडरवर्ल्ड को थर्राने वाली एक 'लेडी सुपरकॉप' के नाम से जाना जाता है। आइपीएस बनने के बाद मीरा की महाराष्ट्र के कई बड़े शहरों में पोस्टिंग हुई। इस दौरान मुंबई में उनका अंडरवर्ल्ड से सामना हुआ। उन्होंने डॉन अबु सलेम के प्रत्यर्पण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आतंक का राज खत्म करने के लिए उनके नेतृत्व में ही डॉन दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन गैंग के तमाम कुख्यात सलाखों में डाल दिए गए। वह याकूब मेमन की फांसी के समय एडीजीपी (जेल) थीं। मुंबई में 26/11 के अटैक के मुजरिम अजमल आमिर कसाब को भी मीरा की देख-रेख में ही फांसी पर चढ़ाया गया।

कसाब को वर्ष 2012 में और मेमन को वर्ष 2015 में फांसी की सजा दी गई थी। मीरा ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब उनसे सरकार ने कसाब और याकूब की फांसी की सजा को सुपरवाइज करने के सम्बंध में पूछा तो उन्होंने इसलिए इनकार नहीं किया कि कहीं उनकी अस्वीकृति को महिला होने नाते किसी और अर्थ में ले लिया जाए। कसाब को फांसी देने के बाद उनसे लोगों ने पूछा था कि क्या आप बेहोश तो नहीं हुई थीं। हां, उस दौरान उनको खास सतर्कता जरूर बरतनी पड़ी थी। कसाब को फांसी देने के मामले को गुप्त रखने के उन्हें सरकार से खास निर्देश थे। यहाँ तक कि इसकी भनक मीडिया को भी न लगे। इसलिए उनको अपनी गाड़ी छोड़कर गनर की बाइक से यरवदा जेल जाना पड़ा। नागपुर सेंट्रल जेल में मेमन ने उनसे कहा था- मैडम, चिंता मत करिए। मुझे कुछ नहीं होगा। यह बात सुनकर वह चौंक गईं थी।

मीरा चड्ढा बोरवांकर उस समय भी सुर्खियों में रहीं, वर्ष 1994 में उनके नेतृत्व में पुलिस ने जलगांव के एक बड़े सेक्स रैकेट पर हाथ डाला। ये गिरोह स्कूल-कॉलेज की लड़कियों को देह व्यापार के धंधे में धकेल रहा था। इससे पहले मीरा चड्ढा बोरवांकर वर्ष 1981 में महाराष्ट्र कैडर की आईपीएस अधिकारी बनी थीं। वह 1987 से 91 तक मुंबई में पुलिस उपायुक्त रहीं। इसके अलावा औरंगाबाद, सतारा आदि में जिला पुलिस अधीक्षक के अलावा स्टेट सीआईडी की अपराध शाखा में भी रहीं। बाद में उनको मुंबई में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की आर्थिक अपराध शाखा में स्थानांतरित कर दिया गया। नई दिल्ली में वह सीबीआई के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की डीआईजी बनीं।

उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र पुलिस फ़ोर्स देश के सबसे बड़े पुलिस बलों में एक है, जो अपराध पर लगाम लगाने के साथ-साथ प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाए रखने में अहम रोल अदा करता है। जब मीरा ने मुंबई की कमान संभाली, अंडरवर्ल्ड में सनसनी सी फैल गई। स्वाभाविक भी था। आगे चल कर सचमुच इस कड़क आइपीएस की धमक ने दाऊद, छोटा राजन समेत पूरे आतंकी कुनबे को थरथरा कर रख दिया। आज मीरा की उपलब्धियों और कामयाबियों पर पूरे फाजिल्का को गर्व होता है। अक्तूबर 2017 में मीरा चड्ढा बोरवांकर पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ब्यूरो के डायरेक्टर जनरल पद से रिटायर हो गईं। मुंबई पुलिस के डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में वह पहली ऐसी महिला पुलिस अफसर रहीं, जिन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा।

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