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ऊंचे पहाड़ों पर जोखिम भरी चढ़ाई करके महिलाओं की मदद कर रहा है ये युवा

ऊंचे पहाड़ों पर जोखिम भरी चढ़ाई करके महिलाओं की मदद कर रहा है ये युवा

Thursday January 11, 2018 , 4 min Read

रचित अरोड़ा, अपनी कमाई, वक्त और ज़िंदगी सबकुछ एक ऐसी सोच के पीछे खर्च कर रहे हैं, जिसके बारे में कोई भी आम आदमी शायद ही सोचता हो।

साभार: ट्विटर

साभार: ट्विटर


महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये और अपने जुनून को पूरा करने के लिये 26 साल के रचित ट्रेकिंग करते हैं। हर ट्रेकिंग से होने वाली कमाई को रचित गरीब, पिछड़ी महिलाओं को निर्बल से सबल बनाने के लिये इस्तेमाल करते हैं।

रचित अरोड़ा, अपनी कमाई, वक्त और ज़िंदगी सबकुछ एक ऐसी सोच के पीछे खर्च कर रहे हैं, जिसके बारे में कोई भी आम आदमी शायद ही सोचता हो। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये और अपने जुनून को पूरा करने के लिये 26 साल के रचित ट्रेकिंग करते हैं। पेशे से एक ऑयल एंड गैस कंपनी में एचआर हैं रचित ।

बकौल रचित, 'जिन लोगों से अब तक में ट्रेकिंग के दौरान मिला हूं जो ऊंचाई से डरते हैं, पर ट्रेकिंग कर लेने के बाद उनके मन से ये डर भी गायब होते देखा है मैंने।' मुंबई आने के बाद रचित की मुलाकात कुछ ऐसे युवाओं से हुई जो समाज को बदलने और बेहतरी के लिये काम करते थे। हमेशा से लोगों की मदद करने की चाह ने रोड़ा को इन लोगों के साथ जोड़ लिया, और हर ट्रेकिंग से होने वाली कमाई को उन्होंने गरीब, पिछड़ी महिलाओं को निर्बल से सबल बनाने के लिये इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। महिलाओं की पढाई और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में उनकी एनजीओ काम कर रही है।

देहरादून में पले बढ़े रचित अरोड़ा अपने बचपन से ही ट्रेकिंग करते आ रहे हैं। वो बताते हैं, 'पहाड़ों की बीच रहने वाला हमारी फैमिली हमेशा ट्रेकिंग को पसंद करती थी। मैं शुरूआत में उंचाई से डरता था पर पहाड़ों पर चढ़ते-चढ़ते ये डर कब दूर हो गया पता ही नहीं चला।' विदेशों के अलावा भारत में कई उंचे पहाड़ों पर अरोड़ा ट्रेकिंग कर चुके हैं। काफी कम उम्र में शुरू की गई उनकी अपनी कंपनी भी ट्रेकिंग के लिये अच्छा काम कर रही है। उच्च शिक्षा के लिये पुणे आने के बाद कई ट्रेकिंग एक्सपीडिशनों में अरोड़ा ने हिस्सा लिया। उनके साथ कुछ दोस्त भी जुड़ते गए और सबने मिलकर कंपनी ही खड़ी कर दी।

साभार: इंडियाटाइम्स

साभार: इंडियाटाइम्स


रचित बताते हैं, 'शून्य के कई डिग्री नीचे का तापमान, जहां सांस ले पाना भी मुश्किल है, शरीर का तापमान भी जहां गिर जाता है, वहां आपका साथी सिर्फ कुल्हाड़ी और रस्सियां हैं। उस उंचाई से 20000 फुट नीचे तक कोई आपकी मदद करने वाला नहीं है। मुश्किल तो है, पर उस वक्त का रोमांच अद्भुत है। और ऐसा करते रहने से अगर मैं समाज के अच्छे के लिये कुछ कर सकता हूं, तो उन लोगों के जिंदगी में बदलाव लाने के लिये मैं ये बार बार करूंगा।'

अगले कुछ सालों में अपनी नौकरी जारी रखते हुए अरोड़ा 7 बड़ी चढाईयां करना चाहते हैं, जिनमें एक माउंट एवरेस्ट भी है। जिनमें से एक वो रूस के माउंट अल्बरस पर चढ़ाई कर पूरा कर चुके हैं। माउंट अल्बरस दुनिया का दसवां और रूस का सबसे उंचा माउंटेन है। उससे हुई कमाई के 22 ऐसी महिलाओं के नए रोज़गार के लिये फंडिंग की गई, जोमुंबई के पिछड़े इलाकों से आती हैं।

वो चाहते हैं कि कम से कम 100 महिलाओं की जिंदगी इसी तरह बेहतर बना सकें। महिलाएं जितनी सशक्त होंगी, रचित के लिए लिये उतना गौरवशाली क्षण होगा। रचित से अक्सर लोग कहते हैं कि उन्हें नौकरी छोड़ देनी चाहिये, और बस अपनी चाहत को पूरा करना चाहिये ट्रेकिंग के ज़रिये, पर भारत जैसे देश मे रहते हुए लोगों के लिये। लेकिन बकौल रचित, यह कहना बहुत आम है। मैं एक आम भारतीय नागरिक हूं जिसके लिये नौकरी जरूरी है। इसके साथ ही मैं अपनी चाहतों को भी पूरा करूंगा।

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