ट्यूशन पढ़ाकर पूरी की पढ़ाई: अंतिम प्रयास में हिंदी माध्यम से UPSC क्लियर करने वाले आशीष की कहानी

28th Aug 2018
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इसे आशीष का साहस कहें, उत्साह कहें हौसला या धृष्टता कि उन्होंने हार न मानने की कसम खा ली थी। इस कसम का उन्हें प्रतिफल मिला जब 2017 के यूपीएससी की अंतिम सूची में उनका भी नाम दर्ज मिला।

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फर्स्ट ईयर के एग्जाम के बाद गर्मी की छुट्टियों में उनके सारे ट्यूशन बंद हो गए और उन्हें मजबूर अपना सामान लेकर घर वापस आना पड़ा। उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि परिवार और रिश्तेदार इतने समृद्ध थे कि उनकी मदद कर सकें, लेकिन किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया।

"मुश्किल का सामना हो तो हिम्मत न हारिए, हिम्मत है शर्त साहिब-ए-हिम्मत से क्या न हो" किसी शायर ने जब ये पंक्तियां लिखी होंगी तो शायद उसे अंदाज़ा रहा होगा कि ऐसे साहिब-ए-हिम्मत लोग इस दुनिया में होंगे जो मुफलिसी के भंवरों से लड़ते और मुश्किलों के तूफान को रौंदते अपना मुकाम हासिल करेंगे। आपको हम मुश्किलों से लड़कर सफलता हासिल करने वाले शख्स की दिलचस्प दास्तां बताएं उससे पहले ये जान लीजिए कि साहिब-ए-हिम्मत का मतलब होता है, हिम्मत वाला इंसान। अपने 9वें और अंतिम प्रयास में हिंदी माध्यम से यूपीएससी की परीक्षा में सफलता हासिल करने वाले आशीष कुमार की कहानी प्रेरणा के लिए शायद कुछ ज्यादा ही अहम है।

इसे आशीष का साहस कहें, उत्साह कहें हौसला या धृष्टता कि उन्होंने हार न मानने की कसम खा ली थी। इस कसम का उन्हें प्रतिफल मिला जब 2017 के यूपीएससी की अंतिम सूची में उनका भी नाम दर्ज मिला। यूपीएससी द्वारा ली जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा दुनिया में सबसे कठिन परीक्षा मानी जाती है। लेकिन यह परीक्षा और कठिन हो जाती है जब आपके पास तैयारी करने के संसाधन न हों। कुछ ऐसा ही हुआ उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के आशीष के साथ।

कानपुर से सटे उन्नाव जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर ईशापुर चमियानी गांव में पैदा हुए आशीष की जिंदगी संघर्षों से जूझती रही। उनके पिता अच्छे-खासे पढ़े जरूर थे, लेकिन उनके पास कोई सरकारी नौकरी नहीं थी। आशीष बताते हैं, 'पिताजी ने अपने जमाने में इतिहास से एम ए और बीएड. किया था। वे जिंदगी भर संघर्ष करते रहे लेकिन कोई सरकारी नौकरी न पा सके। हालांकि मेरे दादाजी काफी संपन्न थे, लेकिन पारिवारिक मामलों के चलते पिताजी को उनसे अलग होना पड़ा।' आशीष और उनके परिवार के लिए यह मुश्किल वक्त था। उनके पिता ने घर का खर्च चलाने के लिए गांव के ही एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन इस नौकरी में 5 लोगों के परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था।

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इतने मुश्किल हालात में भी आशीष के पिता ने अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने की कोशिश की। हालांकि आशीष बताते हैं कि उनके पिता मानते थे कि बिना घूस और जुगाड़ के अब सरकारी नौकरी नहीं मिलती। आशीष ऐसा नहीं सोचते थे। 2002 का वक्त था जब आशीष ने 12वीं की की परीक्षा पास की और आगे की पढ़ाई के लिए पिता से गांव छोड़कर उन्नाव में रहने की इजाजत मांगी। घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते उनके पिता ने उन्हें सीधे मना कर दिया कि वे उनका खर्च नहीं उठा पाएंगे। लेकिन आशीष भी जिद्दी प्रवृत्ति के इंसान हैं। उन्होंने अपने पिता से कहा कि वे सिर्फ फीस का प्रबंध कर दें, बाकी के खर्च के लिए वे ट्यूशन पढ़ा लेंगे।

आशीष ग्रैजुएशन के लिए उन्नाव आ गए और यहां उन्होंने एसएससी, बैंक जैसी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। यहां वे बीएससी कर रहे थे और साथ ही खर्च चलाने के लिए बच्चों को ट्यूशन भी दे रहे थे। लेकिन यहां भी मुश्किलों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। फर्स्ट ईयर के एग्जाम के बाद गर्मी की छुट्टियों में उनके सारे ट्यूशन बंद हो गए और उन्हें मजबूर अपना सामान लेकर घर वापस आना पड़ा। उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि परिवार और रिश्तेदार इतने समृद्ध थे कि उनकी मदद कर सकें, लेकिन किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया। आशीष अब उन दिनों को याद भी नहीं करना चाहते।

आशीष ने अपनी मेहनत जारी रखी। इस बीच उन्होंने कई सारे एग्जाम दिए और लिखत परीक्षाओं में सफलताएं भी अर्जित की लेकिन फाइनल सेलेक्शन 2008 में एसएससी की परीक्षा में हुआ। इसी बीच उनके ऊपर फिर से दुखों का पहाड़ टूटा। सरकारी नौकरी जॉइन करने से कुछ ही दिन पहले उनके पिता ब्रेन हैमरेज की वजह से उनका साथ छोड़कर चले गए। इस बात का उन्हें सबसे ज्यादा दुख है। आशीष ने यूपीपीसीएस, सीपीएफ, हाईकोर्ट रिव्यू ऑफिसर जैसी कई परीक्षाएं पास कीं, लेकिन उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा को पास करना था। उन्हें 2010 में कमर्चारी चयन आयोग की परीक्षा में एक्साइज एंड कस्टम विभाग में इंस्पेक्टर के पद हेतु चुना गया और अहमदाबाद , गुजरात में उनकी पोस्टिंग थी। इस नौकरी से उनकी कुछ आर्थिक दिक्कतें तो दूर हुईं पर अब उन्हें नौकरी के साथ अपने लक्ष्य के लिए समय निकाल पाना मुश्किल लग रहा था। उनके मन में हमेशा से से था कि कुछ भी हो आईएएस तो बनना ही है। इसलिए वह अपने समय का कुशलता से सदुपयोग करते हुए वे फिर से यूपीएससी की तैयारी में लग गए।

पहली बार 2009 में आशीष ने यूपीएससी की परीक्षा दी। अपनी स्कूल की पूरी पढ़ाई हिंदी माध्यम से करने की वजह से उन्होंने इस परीक्षा के लिए हिंदी माध्यम को चुना। नौकरी के साथ ही वह तैयारी में लगे रहे और उन्होंने इस परीक्षा की पहली बाधा यानी प्री एग्जाम भी क्वॉलिफाई कर लिया। लेकिन वह मेन्स में रुक जाते। यह सिलसिला 9 सालों तक चलता रहा। कभी वे मेन्स क्वॉलिफाई करते तो इंटरव्यू में रह जाते। उन्होंने 6 बार मेन्स परीक्षा लिखी और 3 बार इंटरव्यू तक पहुंचे लेकिन फिर भी अंतिम लिस्ट में उनका नाम नहीं होता। किसी भी इंसान को हताश कर देने के लिए इतनी असफलताएं काफी होती हैं लेकिन आशीष हार मानने वाले इंसान नहीं थे।

2017 में जब यूपीएससी का फॉर्म निकला तो उन्होंने देखा कि अब उनके पास सिर्फ एक अटेंप्ट बचा हुआ है। उन्होंने सोचा कि अगर इस बार उनका सेलेक्शन नहीं हुआ तो वे दोबारा फिर कभी इस परीक्षा में भी नहीं बैठ पाएंगे। आशीष ने पूरे जी जान से परीक्षा के लिए तैयारी शुरू कर दी। एक दिलचस्प बात साझा करते हुए आशीष बताते हैं, 'नौकरी मिल जाने के बाद ठीक तरीके से मैं पढ़ नहीं पाया। तीन साल पहले मैंने एक प्रण लिया था कि जब तक मेरा सेलेक्शन नहीं हो जाता तब तक मैं फेसबुक पर कुछ नहीं लिखूंगा।' रात दिन की यह मेहनत रंग लाई और इस बार फाइनल लिस्ट में उनका नाम दर्ज हो गया। इसके बाद उन्होंने फेसबुक पर अपने सफर को बयां किया।

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आशीष कहते हैं यह ऐसी परीक्षा है जिसमें अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों का दबदबा रहता है। हिंदी, गुजराती या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा देकर सफल हुए परीक्षार्थियों की संख्या नाम मात्र की होती है। इन सब बातों का उनपर कैसा असर पड़ता था, इस बारे में वे कहते हैं, 'मेरा तो यही कहना है कि अगर हिंदी माध्यम का एक भी उम्मीदवार परीक्षा पास करता है तो कल्पना कीजिए कि वह आप ही होंगे। इस रवैये से ही सफलता अर्जित की जा सकती है।' वे कहते हैं कि इस परीक्षा के लिए आपके अंदर तमाम जरूरी गुणों के अलावा धैर्य भी होना चाहिए।

वे कहते हैं, 'यूपीएससी की तैयारी की दौरान जब भी मैं खुद को निराश पाता था तो मैं अपने पुराने संघर्ष के दिनों को याद करता था। मैं अपनी भावनाओं को अपनी डायरी में लिखता था। जब असफलता से हताश होता तो मै सिविल सेवा के बारे में खूब सोचता और नए तरीक़े से अपनी पढ़ाई शुरू करता।' यही आशीष की सफलता का मूलमंत्र रहा। डायरी लेखन की आदत ने उन्हें एक अच्छा लेखक भी बना दिया और कई पत्र पत्रिकाओं में उनके लेख समय समय पर प्रकाशित भी हो चुके हैं। हालांकि आशीष की जिंदगी में यह साल सफलता की खबर जरूर लेकर आया लेकिन इस साल एक हादसे में उनके छोटे भाई की मौत हो गई। इतने लंबे सफर में जब आशीष को सफलता मिली तो उसे साझा करने के लिए उनकी जिंदगी के दो महत्वपूर्ण इंसान पिता और भाई उनके साथ नहीं हैं।

आशीष की प्रेरणादायक सफलता को अनेक मंचो से सराहा व सम्मानित किया गया। उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री माननीय विजय रुपानी द्वारा एक सम्मान समारोह में प्रशस्ति पत्र द्वारा सम्मानित किया। आशीष लंम्बे समय से हिंदी माध्यम के प्रतियोगी छात्रों को फेसबुक व ब्लॉग के जरिये सफलता की राह दिखाते रहे हैं। योर स्टोरी से बात करते हुएआशीष ने संर्घषरत लोगों के लिए सन्देश दिया है, "सफलता के लिए अपने आपको पूरी तरह से डूबा दो, हारने का ख्याल मत लाओ अपने मन में हमेशा जीत के ही विचार रखो।"

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