एक ऐसे स्टेशन मास्टर जो पढ़ाते हैं गांव के बच्चों को स्टेशन पर,पहले सैलरी और अब पेंशन के पैसे लगाते हैं बच्चों की पढ़ाई पर

By Ravi Verma
February 16, 2016, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:18:13 GMT+0000
एक ऐसे स्टेशन मास्टर जो पढ़ाते हैं गांव के बच्चों को स्टेशन पर,पहले सैलरी और अब पेंशन के पैसे लगाते हैं बच्चों की पढ़ाई पर
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बी पी राणा लगभग 38 साल पहले स्टेशन मास्टर बनकर छत्तीसगढ़ के लाटाबोड़ आए... 

26 साल पहले रेलवे स्टेशन पर गाँव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया....

अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर लगाते थे...

आज अपनी पेंशन से इन बच्चों को पढ़ा रहे हैं....


जीवन में संतोष और सुकून की परिभाषा सबके लिए अलग-अलग है। कोई खुद को बेहतर करके सुकून पाता है, कोई अपने परिवार को बेहतर करके, कोई अपने आस-पड़ोस को बेहतर करके तो कोई समाज के साथ-साथ राष्ट्र का निर्माण करके सुकून पाता है। ऐसे ही हैं बी पी राणा। जिन्होंने ताउम्र अपनी ज़िंदगी लगा दी देश के नौनिहालों का भविष्य संवारने में। जो कमाया सारा बच्चों को पढ़ाने में लगा दिया।

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बी पी राणा पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के निवासी है. रेलवे में नौकरी करते करते 1978 में छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के लाटाबोड़ स्टेशन पर स्टेशन मास्टर बनकर पहुंचे तो यहीं के होकर रह गए. बी पी राणा ने योरस्टोरी को बताया, 

"एक बार इस स्टेशन पर एक मालगाड़ी रुकी. उसके गार्ड ने कुछ समय मेरे साथ बिताया. उन गार्ड ने मेरी अंग्रेज़ी सुनकर मुझसे कहा कि आप इसका लाभ ग्रामीण अंचल के बच्चो को क्यों नहीं देते? इसके बाद से तो मेरा जीवन ही बदल गया और मैंने रेलवे स्टेशन पर ही पहले रेल कर्मचारियों के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया फिर गाँव के बच्चों को भी गणित और अंग्रेज़ी पढ़ाने लगा." 

पैसा एक भी नहीं लेते बल्कि अपने वेतन से स्लेट पेन्सिल किताबें देते. बीच बीच में खाने के लिए भी कुछ न कुछ देते. धीरे धीरे उनकी क्लास के बच्चे अपने स्कूलों में बेहतर रिज़ल्ट लाने लगे तो आसपास के गाँवों के बच्चे भी राणा सर की क्लास में पहुँचने लगे. राणा के वेतन का बड़ा हिस्सा इन बच्चों पर खर्च होने लगा.

इन बच्चों को पढ़ाने में राणा ऐसे रमे कि उन्होंने शादी ही नहीं की और रिटायर होने के बाद अपने घर पर बच्चों को पढ़ाने लगे. अब राणा की क्लास में 60 बच्चे आते हैं और अपनी पेंशन का अधिकांश हिस्सा वे इन बच्चों पर खर्च कर देते हैं. राणा को कुल पन्द्रह हज़ार पेंशन मिलती है जिसमें से अपने खाने पीने और जीने लायक पैसा लेकर वे बाकी सारा पैसा इन बच्चों पर खर्च कर देते हैं. 1994 में जब गाँव में स्कूल बनाने के लिए पैसा कम पड़ने लगा तो राणा ने अपने बोनस की पूरी रकम चंदे के रूप में दे दी.

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62 साल के राणा घर का सारा काम खुद करते हैं. उनके पास एक पुरानी साइकिल है जिस पर सवार होकर वे हर रविवार 15 किलोमीटर दूर स्थित बालोद जाकर अपने दैनिक जीवन का सामान लाते हैं. वे रोज़ सुबह तीन बजे उठकर योग करते हैं और घर में झाडू लगाने से लेकर खाना बनाने तक का काम करते हैं. उनके घर में सामान के नाम पर अंग्रेज़ी और गणित की किताबें ही दिखाई देती हैं. राणा ने पास के गाँव के एक बच्चे को गोद भी लिया था जो आज भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे रहा है.

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गाँव के स्कूल में शिक्षक सीताराम साहू बताते हैं कि ‘राणा की क्लास में जो भी बच्चा लगातार आता है उसे गणित और अंग्रेज़ी में अच्छे नम्बर आते ही हैं.’

गाँव में रहने वाले लोगों का कहना है कि ‘राणा गाँव के विकास के लिए लिखा पढ़ी से लेकर आर्थिक मदद तक का सारा काम करने के लिए तत्पर रहते हैं.’