वो आइकॉनिक डाइरेक्टर जो पैसों के ढेर के सामने झुका नहीं

फिल्मी दुनिया का वो शख्स जिसे पैसा भी अपने हिसाब से बदल नहीं पाया...

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चेतन आनंद, वो अपार प्रतिभाशाली डाइरेक्टर थे जिसकी पहली फ़िल्म ने ही कैन्स फ़िल्म फेस्टिवल में अवार्ड जीतकर अपने नाम का डंका बजा दिया। वो 1946 में हुआ पहला अंतर्राष्ट्रीय कैन्स फ़िल्म फेस्टिवल था, चेतन की पहली फ़िल्म 'नीचा नगर' ने पामे दॉर यानि कि बेस्ट फ़िल्म का अवार्ड अपने नाम कर लिया। उस जमाने में इस ख़िताब का नाम ग्रांड प्रीक के नाम से जाना जाता था।

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ये वही चेतन आनंद थे जिन्होंने सुपर स्टार राजेश खन्ना को 1966 में ब्रेक दिया था। चेतन ने खन्ना को एक एक्टिंग कॉम्पटीशन में देखा और अपनी अगली फ़िल्म के लिए बतौर हीरो साइन कर लिया या फिर कहा जाये तो राजेश खन्ना को फिल्म इंडस्ट्री में लाकर सुपरस्टार का मैडिल पहनाने में इनकी बहुत बड़ी भूमिका थी। ये न होते तो काका भी न होते।

चेतन आनंद वो अपार प्रतिभाशाली डाइरेक्टर थे जिसकी पहली फ़िल्म ने ही कैन्स फ़िल्म फेस्टिवल में अवार्ड जीतकर अपने नाम का डंका बजा दिया। वो 1946 में हुआ पहला अंतर्राष्ट्रीय कैन्स फ़िल्म फेस्टिवल था, चेतन की पहली फ़िल्म 'नीचा नगर' ने पामे दॉर यानि कि बेस्ट फ़िल्म का अवार्ड अपने नाम कर लिया। उस जमाने में इस ख़िताब को ग्रांड प्रीक के नाम से जाना जाता था। चेतन आनंद ने ही राजेश खन्ना को 1966 में ब्रेक दिया था। चेतन ने खन्ना को एक एक्टिंग कॉम्पटीशन में देखा और अपनी अगली फ़िल्म के लिए बतौर हीरो साइन कर लिया। फ़िल्म थी आख़िरी ख़त। पूरी फ़िल्म में कैमरा एक 15 महीने के बच्चे के इर्द गिर्द घूमता रहता है। फ़िल्म में राजेश ने एक स्कल्पचर का क़िरदार निभाया, जो गांव में एक लड़की से प्यार कर बैठता है और वो दोनों एक मंदिर में चोरी छिपे शादी कर लेते हैं। राजेश इसी के बाद अपना करियर बनाने शहर की ओर चल देते हैं। पीछे रह जाती है वो गर्भवती लड़की। सौतेली मां उसे घर से निकाल देती है। हारी हुई वो लड़की अपना 15 महीने का बच्चा लेकर पूरे शहर में भटकती रहती है और एक दिन मर जाती है, पीछे छूट जाता है वो बच्चा जो पेट भरने के लिए पूरे शहर में घूमता रहता है और उसके पीछे घूमता रहता है चेतन का कैमरा। 60 के दशक में बॉलीवुड फ़िल्मों से कहीं आगे की सोच वाली फ़िल्म आख़िरी ख़त ने भर भर के तारीफे़ं बटोरीं। ये फ़िल्म ने 40वें ऑस्कर अवॉर्ड में भी भारत की तरफ से पहुंची।

चेतन और राजेश का अनोखा रिश्ता

सुपरस्टार राजेश खन्ना चेतन की बहुत इज्जत करते थे। राजेश सफल भी हो रहे थे और जल्द ही उन्होंने हिट फ़िल्मों की झड़ी लगा दी और बॉलीवुड के सुपरस्टार का तमगा भी हासिल कर लिया। लेकिन 70 का दशक जैसे जैसे ढल रहा था राजेश खन्ना की जगमगाहट भी धुंधलाने लगी। उन्हें अपने कर्ता धर्ता चेतन आनंद की याद आई। उस वक़्त राजेश के मैनेजर शोराब इरानी बताते हैं, कि राजेश चेतन से मिले और उनके लिए फ़िल्म बनाने की अर्ज की। चेतन आनंद राजी तो हो गए लेकिन मामला पैसे को लेकर फंसता नज़र आया। ऐसे में राजेश ने लपक के कहा कि प्रोड्यूसर तो मैं ऐसे ले आउंगा। चेतन आनंद के पास आइडिया था राजेश के पास स्टारडम। बात बन गई। सुंदर सी फ़िल्म बनी 1981 में, नाम था- कुदरत

उसूलों और पैसे की लड़ाई

राजेश खन्ना ने अपने ख़ास लोगों के लिए फ़िल्म का प्रीमियर रखा। अब उन लोगों ने राजेश को भड़का दिया, कि अरे खन्ना साहब आपका रोल बाकियों के मुक़ाबले तो काफ़ी कमजोर है। राजेश इस बात पर चिढ़ गए, ठान लिया अब तो फ़िल्म उनके हिसाब से एडिट होगी। उन्होंने अपने लिए दूसरा एडिटर बुला लिया। फ़िल्म की नए सिरे से पैकेजिंग शुरू हो गई। अब मसला ये हुआ कि वो नया एडिटर चेतन आनंद का बड़ा वाला क़द्रदान निकला। उसने उठाके सीधे चेतन को फ़ोन कर दिया कि देख लो साहब ये सब उलटफेर हो रहा है। ये सुनके चेतन को काटो तो ख़ून नहीं। पैसा गया चूल्हे में, कला के साथ ऐसा मजाक उनके लिए नाक़ाबिले बर्दाश्त था। उन्होंने राजेश खन्ना, प्रोड्यूसर बीएस खन्ना सबको फ़ोन करके हड़काया। राजेश अपने गुरूर में जब अड़े ही रहे तब चेतन मामला बॉम्बे हाइकोर्ट में ले गए, लंबी बहस चली। राजेश के वक़ील रिरियाने लगे कि अब तो पैसे सारे लग गए फ़िल्म रुकी तो सारे पैसे डूब जायेंगे। एक आदमी की ज़िद से इतने सारे लोगों का नुकसान हो जाएगा। अंत में जज ने राजेश की इस करतूत को कतई ग़लत बताते हुए भी फ़ैसला प्रोड्यूसर के हक़ में ही सुनाया। उसूल हार गया पैसा जीत गया।

ये वो वक़्त था और एक आज का दौर है। बदला अब भी बहुत कुछ नहीं। प्रोड्यूसर का पैसा सबसे ऊपर। हां ये और बात है कि अब ज्यादातर डाइरेक्टर्स ख़ुद को सिचुएशन के हिसाब से मोल्ड कर लेते हैं। विद्रोह नहीं करते, झुक जाते हैं। क्योंकि हर कोई चेतन आनंद नहीं हो सकता।

-प्रज्ञा श्रीवास्तव

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