15 की उम्र में हुई शादी, घर से निकाली गईं... साइकिल पर अचार बेचकर खड़ा किया कारोबार — पद्मश्री ‘किसान चाची’ राजकुमारी देवी की कहानी
15 साल की उम्र में शादी, तानों और आर्थिक संघर्ष के बावजूद बिहार की राजकुमारी देवी ने हार नहीं मानी. साइकिल पर अचार बेचने से शुरू हुए सफर ने उन्हें ‘किसान चाची’ का खिताब दिया और फिर ‘किसानश्री’ और ‘पद्मश्री’ सम्मान तक ले गया. जानिए कैसे उन्होंने हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाई.
जब हालात इंसान का साथ छोड़ देते हैं, तब उसके सामने दो रास्ते होते हैं. पहला, परिस्थितियों के आगे हार मान लेना. दूसरा, उन्हीं मुश्किलों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेना. बिहार (Bihar) के मुजफ्फरपुर जिले की राजकुमारी देवी (Rajkumari Devi) ने दूसरा रास्ता चुना. यही फैसला उन्हें पूरे देश में ‘किसान चाची’ (Kisan Chachi) के नाम से पहचान दिलाने वाला साबित हुआ.
आज राजकुमारी देवी सिर्फ एक सफल किसान नहीं हैं, बल्कि महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) की ऐसी मिसाल हैं, जिन्होंने अपने संघर्ष को हजारों महिलाओं की ताकत बना दिया. कभी जिनके पास अपनी उपज बेचने के लिए बाजार नहीं था, आज उनके बनाए मूल्यवर्धित कृषि उत्पाद देश के कई हिस्सों तक पहुंच रहे हैं.
खेती और ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2019 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ पुरस्कार (Padma Shri) से सम्मानित किया.
आर्थिक तंगी में बीता बचपन
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड के आनंदपुर गांव में जन्मी राजकुमारी देवी का बचपन आर्थिक तंगी में बीता. परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण महज 15 वर्ष की उम्र में उनकी शादी एक किसान परिवार में कर दी गई. शादी के बाद उन्होंने देखा कि परिवार की आय का मुख्य स्रोत तंबाकू की खेती थी, लेकिन उससे घर का खर्च ठीक से नहीं चल पाता था.
शादी के कई साल बाद भी संतान न होने के कारण उन्हें सामाजिक तानों और अपमान का सामना करना पड़ा. कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी जिंदगी को नई दिशा देने का फैसला किया.

साइकिल बनी सफलता की पहली सीढ़ी
उन्होंने खुद खेतों में काम करना शुरू किया. खेतों में उगने वाली सब्जियों और फलों से अचार, मुरब्बा और अन्य खाद्य उत्पाद तैयार किए. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती इन्हें बेचने की थी. गांव और आसपास के लोग इन उत्पादों को खरीदने में खास रुचि नहीं दिखाते थे.
तब राजकुमारी देवी ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने उनकी जिंदगी बदल दी. उन्होंने साइकिल चलाना सीखा. उस दौर में गांव की किसी महिला का साइकिल से बाजार जाकर सामान बेचना सामाजिक तौर पर असामान्य माना जाता था. इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. वह साइकिल पर अचार और मुरब्बे लादकर गांव-गांव, हाट-बाजार और मेलों तक पहुंचने लगीं. शुरुआत में लोगों ने उनका मजाक उड़ाया, लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
खेती के साथ अपनाई फूड प्रोसेसिंग की राह
राजकुमारी देवी समझ चुकी थीं कि सिर्फ मेहनत से बात नहीं बनेगी, खेती में नई तकनीक अपनाना भी जरूरी है. उन्होंने पूसा स्थित कृषि संस्थान और कृषि विज्ञान केंद्र से खेती तथा फूड प्रोसेसिंग का प्रशिक्षण लिया. इसके बाद उन्होंने पपीता समेत कई नकदी फसलों की खेती शुरू की और उनसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए. इससे उनकी आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई.
धीरे-धीरे उन्होंने अपने अनुभव को अन्य महिलाओं के साथ साझा करना शुरू किया. स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को अचार, मुरब्बा, पापड़ और अन्य खाद्य उत्पाद बनाना तथा उन्हें बाजार तक पहुंचाना सिखाया. समय के साथ उनके साथ जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ती गई और कई परिवार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने लगे.

ऐसे बनीं ‘किसान चाची’
खेती और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए बिहार सरकार ने उन्हें ‘किसानश्री’ सम्मान से सम्मानित किया. इसके बाद लोग उन्हें प्यार से ‘किसान चाची’ कहने लगे. वर्ष 2019 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मश्री’ पुरस्कार देकर उनके कार्यों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया.
उनकी प्रेरक यात्रा की चर्चा देशभर में होने लगी. इसी क्रम में उन्हें महानायक अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) के लोकप्रिय क्विज शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (Kaun Banega Crorepati) में भी आमंत्रित किया गया, जहां उनके संघर्ष और सफलता की कहानी ने लाखों दर्शकों को प्रेरित किया.
राजकुमारी देवी का मानना है कि खेती केवल फसल उगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए. किसानों को मूल्यवर्धन पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इससे आय बढ़ाने की सबसे अधिक संभावना होती है.
द बेटर इंडिया से हुई पहले की बातचीत में उन्होंने कहा था, “जब उत्पादन अच्छा होता है, तो उसके लिए सही बाजार की जरूरत होती है. बाजार न मिले तो फसल खराब करने के बजाय उससे दूसरे उत्पाद बनाने चाहिए.”
महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता पर उनका कहना है, “हर महिला के पास कोई न कोई हुनर होता है. बस उसे पहचानकर उसका सही इस्तेमाल करना जरूरी है.”
अपने संघर्ष को याद करते हुए उन्होंने कहा, “मैंने कुछ भी पहले से सोचकर नहीं किया. जैसे-जैसे अवसर मिले, वैसे-वैसे काम करती गई.”
बिजनेस स्टैंडर्ड से हुई बातचीत में उन्होंने कहा था, “यह सिर्फ मेरे लिए नहीं है. मैं हर महिला का पूरा साथ देती हूं, ताकि वह आगे बढ़े, अपना भविष्य बनाए और समाज में अपनी पहचान स्थापित करे.”
हजारों महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा
आज ‘किसान चाची’ हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. उन्होंने साबित किया है कि हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर सीखने की ललक, मेहनत करने का साहस और आगे बढ़ने का संकल्प हो तो जिंदगी की दिशा बदली जा सकती है.
उनकी कहानी केवल एक सफल किसान बनने की कहानी नहीं है. यह आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण की ऐसी मिसाल है, जो बताती है कि बदलाव बड़ी पूंजी से नहीं, बल्कि बड़े इरादों, लगातार सीखने की इच्छा और कभी हार न मानने वाले हौसले से शुरू होता है.



