International Men’s Day : पुरुषों को हमारी मदद चाहिए ताकि मदद करने का एकतरफा बोझ उन पर न रहे

By Manisha Pandey
November 19, 2022, Updated on : Sat Nov 19 2022 06:58:40 GMT+0000
International Men’s Day : पुरुषों को हमारी मदद चाहिए ताकि मदद करने का एकतरफा बोझ उन पर न रहे
इस साल इंटरनेशनल मेन्‍स डे की थीम है- “हेल्पिंग मेन्‍स एंड ब्‍वॉयज.” ये एक सुंदर और जरूरी बात है. लड़कों को और पुरुषों को मदद की बहुत जरूरत है.
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हर साल 8 मार्च के दिन जब कॉरपोरेट दफ्तरों का एचआर डिपार्टमेंट दफ्तर की महिला कर्मचारियों को चॉकलेट और गुलाब देकर महिलाओं के नाम किया गया साल का एक दिन सेलिब्रेट कर रहा होता है तो पुरुष सहकर्मी हल्‍के से मुस्‍कुराकर कहते थोड़ा व्‍यंग्‍य में कहते हैं, “मैम, हम पुरुषों का भी एक दिन होना चाहिए. इंटरनेशनल वुमेन्‍स डे की तरह इंटरनेशनल मेन्‍स डे.”


तो खुश हो जाइए. आज इंटरनेशनल मेन्‍स डे है. हालांकि एक चॉकलेट और गुलाब मिलने पर नाक-भौं सिकोड़ रहे पुरुषों से पूछें कि इस ऑफिस में 80 फीसदी कर्मचारी पुरुष हैं, 100 फीसदी टॉप लीडरशिप में पुरुष हैं, मालिक, संपादक, सीईओ, बिजनेस और मार्केटिंग हेड पुरुष हैं, पुरुषों की सैलरी महिलाओं से 70 गुना ज्‍यादा है, पुरुषों की सेविंग महिलाओं से 82 गुना ज्‍यादा है, उनका रिटायरमेंट प्‍लान और सिक्‍योरिटी महिलाओं से 78 गुना ज्‍यादा है, इन सारी असमानताओं के बारे में आपका क्‍या ख्‍याल है तो वो बगलें भी नहीं झांकते. बस चॉकलेट और गुलाब को देखकर मुस्‍कुराते रहते हैं और इसरार करते हैं कि आधी चॉकलेट उन्‍हें दोस्‍ती के नाम पर खिला दी जाए.


यूं तो असमानता बहुत सारी है दुनिया में. संसार की 51 फीसदी आबादी औरतें हैं. लेकिन संसार में 70 फीसदी गरीब औरतें हैं. 83 फीसदी सिंगल पैरेंट औरतें हैं. 66 फीसदी श्रम औरतें करती हैं. 70 फीसदी उत्‍पादन औरतें करती हैं. लेकिन संसार की कुल आय का सिर्फ 11 फीसदी औरतों को मिलता है. सिर्फ 14 फीसदी संपदा पर उनका हक है और सिर्फ 1 फीसदी लैंड यानी जमीन उनके नाम पर है.  

हां, इंटरनेशनल वुमेंस डे जरूर इंटरनेशनल मेन्‍स डे के मुकाबले कहीं ज्‍यादा पॉपुलर है. देश-दुनिया के कोने-कोने में मनाया जाता है. मीडिया, अखबार, चैनल, पत्रिकाएं कोई इस एक दिन को औरतों के नाम पर याद करना नहीं भूलते. इतना शो और हलचल मेन्‍स डे के नाम पर नहीं दिखाई देती.


लेकिन फिर भी हमें इस दिन को मनाए जाने से कोई गुरेज नहीं. बल्कि इस दिन को महिला दिवस से ज्‍यादा जोर-शोर से मनाया जाना चाहिए. इस दिन हमारे जीवन में, दुनिया में पुरुषों के होने का, उनके काम का, उनके योगदान का सेलिब्रेशन होना चाहिए. उसके बारे में बात होनी चाहिए. आखिर अपने लिए बेहतर और बराबरी की दुनिया का ख्‍वाब देख रही औरतें ऐसी दुनिया की कल्‍पना तो नहीं करतीं, जो पुरुषविहीन होगी. हमारे जीवन में, समाज में, संसार और प्रकृति में पुरुषों का बड़ा योगदान है. हम उस योगदान को स्‍वीकारना और उसके सामने विनम्र होना चाहते हैं.   


इंटरनेशनल मेन्‍स डे की हर साल एक थीम होती है. इस साल की थीम है- “हेल्पिंग मेन्‍स एंड ब्‍वॉयज.” ये एक सुंदर और जरूरी बात है. लड़कों को और पुरुषों को मदद की जरूरत है. हम सबकी सम्मिलित सहयोग और साथ की.

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ये बात अलग है कि सर्वश्रेष्‍ठ और बलशाली होने के नाम पर पुरुषों की पूरी सोशल, कल्‍चरल ट्रेनिंग ही यही है कि उनका काम मदद करना है. औरतों की रक्षा करना, अपने से कमजोरों को बचाना. वो हीरो हैं, सिनेमा और कहानियों के नायक हैं, वो असीमित क्षमताओं से लैस हैं, उनकी भुजाओं में बल है, वो हिम्‍मती, साहसी और मुश्किलों के सामने डटकर खड़े रहने वाले हैं. वो डरी, सहमी, सताई हुई और कमजोर औरतों की रक्षा करते हैं. वो पत्नियों के मालिक पति हैं, वो बहनों के रक्षक भाई हैं. वो घर के मुखिया हैं. स्‍वामी हैं. वो सर्वशक्तिशाली भगवान हैं.  


कोई नहीं कहता कि उनको भी मदद की दरकार है. वो भी कमजोर और वलनरेबल हो सकते हैं, रो सकते हैं, थक सकते हैं, हार सकते हैं. कभी उनका भी हाथ थामे जाने की जरूरत हो सकती है.


संसार में सृजन और निर्माण के काम में पुरुषों का जितना योगदान है, उससे कहीं ज्‍यादा उनका योगदान विध्‍वंस और विनाश के कामों में है. जितना विध्‍वंस, विनाश, बर्बादी, हिंसा होती है, उन सबके केंद्र में पुरुष है. लेकिन इसलिए नहीं कि उसके डीएनए में हिंसा है. इसलिए कि उससे सतत ताकतवर बने रहने की दुनियावी अपेक्षाओं ने उससे उसकी मनुष्‍यता छीन ली है. उसे रूखा और कठोर बना दिया है. कठोर हो जाने के बाद इंसान सिर्फ टूट सकता है, सीख नहीं सकता. बदल नहीं सकता.     


पेड़ वहीं से बढ़ता है, जहां वह हरा, नर्म और मुलायम होता है. वहां से नहीं, जहां वह सूखकर कठोर ठूंठ हो चुका हो. तेज हवा के दबाव में सूखा पेड़ टूट जाता है और नर्म पेड़ हवा के बहाव की दिशा में कुछ देर को झुकता है, परेशानियों के सामने सरेंडर करता है और फिर वापस अपने आकार में लौट आता है.


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लड़कों को सचमुच बहुत मदद की जरूरत है ताकि वह एक दिन उस कठोर ठूंठ में बदलने की बजाय एक नर्म और लचीला पेड़ बन सकें. जो ताकतवर भी हो और कमजोर भी. जो वलनरेबल हो सके, रो सके, मदद मांग सके, विनय कर सके, हाथ जोड़ सके, झुक सके, प्रार्थना कर सके, सिर झुका सके. जो सीख सके, खुद को बदल सके, विनम्र हो सके, प्‍यार कर सके. जो दयालु हो, करुण हो, सहिष्‍णु हो, स्‍नेही हो, मददगार हो.

  

जिस पर हमेशा मजबूत बने रहने का दबाव न हो. जिसका काम सबकी जिम्‍मेदारी उठाना, सबकी रक्षा करना न हो और न ही उसमें इस बात का अहंकार हो कि वो सबकुछ है. जिसका सबसे बड़ा गुण उसका क्रोध और एग्रेशन न हो.

हमारे लड़कों को सचमुच बहुत मदद की जरूरत है ताकि वह ऐसे पुरुषों में तब्‍दील हो सकें, जो कमजोर और वलनरेबल हों. जो संसार में विध्‍वंस नहीं, सृजन कर सकें. जो स्त्रियों को बलपूर्वक हासिल न करें, प्रेम और आदर से उनका प्रेम और भरोसा जीतें. वो मदद करें, लेकिन इसलिए नहीं कि वो महान हैं. इसलिए क्‍योंकि वो वलनरेबल हैं और मदद की जरूरत उन्‍हें भी है.


और इस मदद की जरूरत ठूंठ हो चुके पेड़ों से ज्‍यादा, नर्म लचीली कोमलों हो है. अहंकारी, क्रोधी, हिंसक उम्रदराज पुरुषों से ज्‍यादा छोटे लड़कों को, बच्‍चों को ताकि वो बेहतर मनुष्‍य बन सकें.


स्त्रियों के हक-हुकूक, आजादी और बराबरी की सारी बातों और सारी कोशिशों के नतीजे तब तक सिफर हैं, जब तक इन कोशिशों में लड़के भी शामिल नहीं हैं. आज के लड़के भविष्‍य के प्रेमी हैं, पिता हैं, समाज को गढ़ने मनुष्‍य हैं. उन्‍हें आज मदद की जरूरत है ताकि कल को वो सचमुच मददगार हो सकें, खुद को महान और सर्वशक्तिशाली समझे बिना.