लाइट्स! कैमरा! एक्शन! 'चिल्ड्रेन ऑफ टूमौरो'

By Raj Ballabh
June 01, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
लाइट्स! कैमरा! एक्शन! 'चिल्ड्रेन ऑफ टूमौरो'
दो पूर्व इंजीनियर्स ‘चिल्ड्रेन ऑफ टूमौरो’ को मौका देने के लिए कर रहे हैं काम
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Share on
close

जब स्थानीय सर्विस स्टेशन ने नरेंद्र जे के बाइक की मरम्मत का कबाड़ा कर दिया तो उन्हें गुस्सा आया। वहां पहुंचकर उन्होंने उस व्यक्ति को बुलाने को कहा जिसने इतना घटिया काम किया था। वह ‘व्यक्ति’ डर से कांपता ग्यारह वर्ष का लड़का निकला जिसके हाथ अलकतरा और गैसोलीन से लिथड़े हुए थे। लड़का आतंकित दिख रहा था।

image


शीघ्र ही नरेंद्र और उनके मित्र गोमतेश ने बंगलोर में सूचना प्रौद्योगिकी की आकर्षक नौकरियां छोड़ दीं और ऐसे विषयों पर कहानियां कहने के लिए समर्पित छोटी फिल्म कंपनी सिंफोनी फिल्म्स की स्थापना के लिए कमर कस ली।

उनकी सबसे हाल की पेशकश चिल्ड्रेन ऑफ टूमौरो है - ऐसे बच्चे जैसा भद्दा जीवन जीते हैं, उस पर एक तीखी नजर। बीते दिनों योर स्टोरी ने प्रतिकूल स्थितियों से पार पाने वाले लावारिस बच्चों के बारे में लिखा था जिन्होंने अपने जीवन में कुछ आश्चर्यजनक काम किया था।ऐसी कहानियां जबर्दस्त प्रेरणा तो प्रदान करती हैं लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि ऐसा जीवन जी पाने वाले बच्चे लाखों में एक-दो होते हैं। बाकी बच्चे अंधेरी जगहों मे सड़ते रहते हैं और किनारे कर दिए जाते हैं। ‘चिल्ड्रेन ऑफ टूमौरो‘ के जरिए फिल्म निर्माता हमारी आखें खोलने, जीवन में परिवर्तन लाने और सक्रिय होने के लिए झटका देने की आशा कर रहे हैं। नरेंद्र जी ने आरंभ के रोचक मामले पर योर स्टोरी से बातचीत की कि यह फिल्म बनाने के सिवा उनके पास कोई विकल्प क्यों नहीं था, प्रक्रिया कितनी कठिन थी और भविष्य कैसा है - सिंफोनी फिल्म्स और चिल्ड्रेन ऑफ टूमौरो, दोनो के लिए।

सिंफोनी फिल्म्स किस तरह से अस्तित्व में आई?

जब मैं कॉर्पोरेट (सूचना प्रौद्योगिकी) क्षेत्र में नौकरी करता था, तो मैं अपने सहकर्मी गोमतेश उपाध्ये के साथ रोज कार्यालय के वाहन में यात्रा किया करता था और बंगलोर के ट्रफिक और दूरी, दोनो के कारण हमलोगों को हर रोज लगभग तीन घंटे की यात्रा करनी पड़ती थी। इस दौरान हमलोग अनेक विषयों पर बातचीत किया करते थे। वह फोटोग्राफी में थे और मैं नाटक लेखन और थिएटर में इसलिए हमलोग फिल्म, फिल्म निर्माण और संबंधित सृजनशील मुद्दों पर बातचीत किया करते थे।

image


हमलोग नियमित भुगतान वाले काम में थे। हालांकि हमलोग संतुष्ट नहीं थे क्योंकि हमारे सृजनात्मक कौशलों का उपयोग नहीं हो रहा था। दो वर्षों की अवधि और लंबे सोच-विचार के बाद मैंने तय किया कि मुझे अपनी अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिए। मुझे पता था कि इसमें ढेर सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, हर रोज जोखिम मोल लेना होगा और नियमित भुगतान वाला काम न होने की सोच से मैं परेशान हुआ। मैंने सोचता हूं कि ऐसी निर्णायक घड़ी हर किसी की जिंदगी में आती है और उनका कैरियर/ जीवन उस दौरान किए गए निर्णय पर निर्भर होता है। मैंने पर्याप्त साहस जुटाया और सृजनात्मक आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए कॉर्पोरेट जॉब छोड़ दिया। इसके बाद मैं अगले कदम उठाने के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया में लगा। कुछ महीने बाद गोमतेश ने भी मेरा रास्ता अपनाया और उसके बाद से हमलोगों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

क्या चिल्ड्रेन ऑफ टूमौरो वास्तविक जीवन के विषय से प्रेरित है?

हां। कुछ साल पहले मैं अपनी बाइक लाने स्थानीय सर्विस स्टेशन गया था। मैंने जब बाइक को देखा तो काम की गुणवत्ता को देखकर मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने उस व्यक्ति से बात करना चाहा जिनसे सर्विसिंग की थी। मेरे सामने ग्यारह साल का एक लड़का आ खडा हुआ। जिस समय मैंने उसे देखा वह जैसे आत्मज्ञान का क्षण था। एक सशक्त भावना मेरे मन में पैदा हुई कि जब इस उम्र के बच्चे ने अपना बचपन खो दिया है तो एक समाज के रूप में हम असफल हो गए हैं।

चिल्ड्रेन ऑफ टूमौरो फिल्माने की प्रक्रिया में आपके सामने सबसे कठिन चुनौतियां क्या रही हैं और क्या चीजें दाव पर लगानी पड़ीं?

फिल्म के लिए धनराशि जुटाना बहुत कठिन रहा है और हमारी सबसे कठिन चुनौती बना हुआ है। चूंकि फिल्म की शूटिंग गीत, नृत्य जैसे सामान्य व्यावसायिक तत्वों के बिना हुई है इसलिए हमलोग फिल्म के लिए प्रोड्यूसर की व्यवस्था कर पाने में सक्षम नहीं हैं। अधिकांश लोग महसूस करते हैं इस तरह के निवेश से पैसा निकलना मुश्किल होता है।

इस फिल्म के बारे में सोशल मीडिया की कैसी प्रतिक्रिया नहीं है? क्या आलोचकों या समीक्षकों ने आपको अपना फीडबैक दिया है?

चूंकि हमलोग इंडी फिल्म रहे हैं, इसलिए मार्केटिंग का बजट है ही नहीं। लेकिन हमलोगों को सोशल मीडिया से जबर्दस्त प्यार और समर्थन मिला है और इसके लिए हमलोग आभार महसूस करते हैं।

प्रख्यात कन्नड़ फिल्म निदेशक पवन कुमार ने अपने लोकेशन पर उदारतापूर्वक शूटिंग करने देकर हमारी फिल्म को सहयोग किया है। साथ ही, उन्होंने हमारे अभियान को सोशल मीडिया साइटों पर प्रोमोट भी किया है। कन्नड़ फिल्म अभिनेता श्रुति हरिहरन ने अभियान के लिए उदारतापूर्वक दान दिया है और अभियान को सोशल मीडिया पर प्रोमोट किया है।

अगर कोई आलोचक या दर्शक फिल्म को देखना चाहेंगे, तो हमें इसके लिए खुशी होगी।

इस फिल्म को रिलीज करके आप कौन सा अल्पकालिक लक्ष्य हासिल करने की आशा करते हैं?

हमलोग बाल श्रम और सभ्य समाज की नाक के नीचे भयंकर जीवन जीने वाले छोटे बच्चों के बारे में महत्वपूर्ण संवाद स्थापित करना चाहते हैं। हमलोग आम आदमी को यह भी जानकारी देना चाहते है कि कोई भी व्यक्ति फिल्म बना सकता है। इस क्षेत्र में स्थापित फिल्म निर्माताओं का एकाधिकार नहीं है। अगर आपके पास कहने के लिए कोई कहानी है, और आपको लगता है कि यह उसे कहने का सही माध्यम है, तो आप कौन हैं और कहां से हैं, इससे निपरेक्ष आप फिल्म बना सकते हैं।

हमलोग ऐसे सहमना लोगों का एक समुदाय बनाना चाहते हैं जो सार्थकता और प्रयोजन की श्रेष्ठ पारिस्थितिकी निर्मित करने के लिए परस्पर सहयोग और सह-निर्माण कर सकें, अपने कौशलों और संसाधनों को आपस में शेयर कर सकें।

फिल्म अंग्रेजी में क्यों है?

बाल श्रम एक वैश्विक मुद्दा है और हमलोग चाहेंगे कि हमारी फिल्म उन सारे लोगांे तक पहुंचे जो पूरी दुनिया में इस विषय पर आधारित प्रयासों की सराहना करते हैं। साथ ही, इस समय क्षेत्रीय भाषाओं में इस प्रकार के यथार्थवादी फिल्म निर्माण की सराहना नहीं होती है और ‘कला फिल्मों’ के नाम पर इन्हें नजरअंदाज किया जाता है। हमें लगता है कि अंग्रेजी में होने के कारण ‘चिल्ड्रेन ऑफ टूमौरो’ को भारत के सारे क्षेत्रों से सराहना मिलेगी क्योंकि यह सबसे आम भाषा है, और हमलोग यह भी चाहेंगे कि फिल्म दुनिया भर में अधिकांश दर्शकों तक पहुंचे।

अगर आपका अभियान इसे नहीं बनाता है, तो क्या आपके पास कोई कंटिंजेंसी प्लान है?

हमारी फिल्म में प्राइवेट प्रोड्यूसर नहीं हैं इसलिए हमलोगों को इसे उतनी ही धनराशि से बनाना होगा जितना हम जुटा पाते हैं। लेकिन इससे यह उस गुणवत्ता तक नहीं पहुंच सकता है जैसी हमारी मूल योजना थी। हमें पूरी आशा है कि हमारा अभियान सफल रहेगा।

सिंफोनी फिल्म्स के पास और किन फिल्मों/ परियोजनाओं का आइडिया है?

हमलोग विभिन्न यथार्थवादी, सामाजिक, बौद्धिक और जीवनीमूलक विषयों पर अधिक यथार्थवादी फीचर फिल्में बनाना चाहेंगे।

इस सिनेमा पर काम शुरू करने के मामले में सबसे अच्छी चीज क्या रही है?

‘चिल्ड्रेन ऑफ टूमौरो’ फिल्म बनाने के मामले में सबसे अच्छी चीज सहयोग की भावना रही है जिसे हमलोग पाने में सक्षम रहे हैं। विभिन्न पेशों के लोग इस मकसद से साथ आए हैं जिससे उन्हें कोई मौद्रिक लाभ नहीं होने वाला है। अगर हम ईमानदार, सहयोगमूलक और समाजोपयोगी प्रयास करें, तो जिस तरह यह सामान्य संपर्क हासिल हो जाता है, बहुत हैरतअंगेज बात लगती है।

Clap Icon0 Shares
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Clap Icon0 Shares
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Share on
close