अपने जज़्बे से ताजमहल की खूबसूरती को टक्कर देतीं 5 महिलाएं, 'शीरोज हैंगआउट' से

By Harish Bisht
November 26, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:19:23 GMT+0000
अपने जज़्बे से ताजमहल की खूबसूरती को टक्कर देतीं 5 महिलाएं, 'शीरोज हैंगआउट' से
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5 एसिड पीड़ित मिलकर चला रहे हैं ‘शीरोज हैंगआउट’....

ताजमहल से चंद कदमों की दूरी पर ‘शीरोज हैंगआउट’...

मर्जी से चुकाना होता है खाने पीने का बिल...


आगरा में मौजूद ‘ताजमहल’ के सामने सभी मिसालें फीकीं हैं, लेकिन वहां से चंद कदम दूर है ‘शीरोज हैंगआउट’। ताजमहल को अगर मोहब्बत की निशानी माना जाता है तो ‘शीरोज हैंगआउट’ एक ऐसी जगह है जो प्रेरणा है मानवता की, उम्मीद है ज़िंदगी की, अहसास है तमाम मुश्किलों के बाद भी भी कुछ करने का, हौसला है परिस्थितियों से लगातार लड़कर उबरने का, चाहत है खुद को फिर से संवारने की और एक हिम्मत है ऐसे जाबांज महिलाओं के पुर्नवास का जो एसिड अटैक की शिकार हैं। ये खाने पीने की ऐसी जगह है जिसको चला रही हैं एसिड अटैक की शिकार ऋतु, रूपाली, डोली, नीतू और गीता नाम की पांच महिलाएं। ‘शीरोज हैंगआउट’ में ना सिर्फ खाने पीने का लुत्फ उठाया जा सकता है बल्कि कोई चाहे तो वो एसिड अटैक की शिकार रूपाली के डिजाइन किये कपड़े भी खरीद सकता है।

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‘शीरोज हैंगआउट’ की शुरूआत पिछले साल 10,दिसंबर को हुई थी। इसको शुरू करने का आइडिया था एसिड अटैक की शिकार लक्ष्मी का। जिन्होंने एसिड अटैक की शिकार महिलाओं के हक के लिये कई लड़ाई लड़ चुकी हैं और अब अपनी संस्था छांव फाउंडेशन के जरिये उनके पुर्नवास का काम देख रही हैं। ‘शीरोज हैंगआउट’ का कामकाज देखने वाली ऋतु का कहना है कि इसको शुरू करने का मुख्य उद्देश्य एसिड अटैक से पीड़ित लड़कियों का पुर्नवास करना था, क्योंकि ऐसे लोगों को ना सरकारी ऑफिस में काम मिलता है और ना प्राइवेट ऑफिस में। क्योंकि ज्यादातर मामलों में महिलाओं पर एसिड अटैक छोटी उम्र में होता है जब वो अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाती। बावजूद ‘शीरोज हैंगआउट’ में पढ़ाई ज्यादा मायने नहीं रखती यहां पर इस बात का ज्यादा ध्यान दिया जाता है कि कैसे एसिड पीड़ितों की ज्यादा से ज्यादा मदद की जा सके।

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‘शीरोज हैंगआउट’ की खास बात ये है कि इनके मेन्यू में किसी भी चीज का दाम नहीं रखा गया है, यहां आने वाला ग्राहक अपनी मर्जी के मुताबिक अपना बिल खुद देता है। ऋतु के मुताबिक "इसके पीछे खास वजह ये है कि यहां पर कोई भी अमीर या गरीब आ सकता है क्योंकि उनका मानना है कि हर कोई बड़ी जगह जाकर कॉफी नहीं पी सकता।" इसके अलावा यहां आने वाले लोग ये भी जान सकें कि ‘शीरोज हैंगआउट’ को किस उद्देश्य से शुरू किया गया है। ‘शीरोज हैंगआउट’ में आने वाले लोगों को यहां पर ना सिर्फ कॉफी मिलती है बल्कि मेन कोर्स भी खिलाया जाता है। ‘शीरोज हैंगआउट’ को आगरा में मिली अच्छी प्रतिक्रिया के बाद अब अगले साल लखनऊ में शुरू किया जाएगा। ‘शीरोज हैंगआउट’ में 5 एसिड पीड़ित के अलावा 7 दूसरे लोग भी काम करते हैं।

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‘शीरोज हैंगआउट’ हफ्ते में सातों दिन सुबह 10 से रात 10 बजे तक खुलता है। शुरूआत में जब ‘शीरोज हैंगआउट’ को शुरू किया था तो उसे काफी आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा, लेकिन अब हालात बदल गये हैं। आज ‘शीरोज हैंगआउट’ अपने दम पर ना सिर्फ अपने कर्मचारियों का वेतन और दुकान को किराया निकाल रहा है बल्कि अब ये मुनाफे में भी आ गया है। ऋतु के मुताबिक “शीरोज हैंगआउट’ के मुनाफे को पीड़ितों के इलाज और उनके विकास के लिये खर्च किया जाता है।” यहां पर आने वाले ज्यादातर ग्राहक विदेशी सैलानी होते हैं। ऋतु के मुताबिक "ट्रिप एडवाइजर जैसी वेबसाइट ‘शीरोज हैंगआउट’ को अच्छी रेटिंग देती हैं। इसलिए यहां आने वाले लोग फेसबुक या दूसरी जगहों पर इनके बारे में पढ़कर आते हैं।"

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‘शीरोज हैंगआउट’ को विभिन्न तरह की पैंटिंग के जरिये सजाया गया है इसलिये यहां से गुजरने वाले सैलानी थोड़ी देर रुककर इस जगह को एक बार जरूर निहारते हैं। यहां आने वाले कई ग्राहक एसिड अटैक से पीड़ित लोगों से बात करते हैं, उनकी कहानी सुनते हैं और ये जानने की कोशिश करते हैं कि वो किस तरह से ‘शीरोज हैंगआउट’ को चलाती हैं। ऋतु का कहना है कि “जब लोगों को हमारे बारे में पता चलता है तो कई बार वो चाय नाश्ता करने नहीं बल्कि हमसे बात करने के लिये आते हैं।” ‘शीरोज हैंगआउट’ में एक साथ 30 लोग तक बैठ सकते हैं। ‘शीरोज हैंगआउट’ के मेन्यू में चाय और कॉफी के अलावा कई तरह के शेक मिल जाएंगे। यहां के मेन्यू में टोस्ट, नूडल्स, फ्रेंच फ्राई, बर्गर, विभिन्न तरह के सूप, डेजर्ट और दूसरी कई चीजें खाने पीने को मिल जाएंगी।

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ये जगह सिर्फ हैंगआउट के लिए नहीं है बल्कि कोई अगर चाहे तो यहां पर पार्टी भी कर सकता है। आगरा के फतेहाबाद रोड़ पर स्थित ‘शीरोज हैंगआउट’ ताजमहल के पश्चिमी गेट से महज 5 मिनट की दूरी पर है। एसिड अटैक की शिकार और यहां का कामकाज संभालने वाली ऋतु हरियाणा के रोहतक, रूपाली मुजफ्फरनगर की रहने वाली हैं जबकि डोली, नीतू और गीता आगरा की ही रहने वाली हैं। नीतू और उनकी मां गीता पर उनके पिता ने तेजाब फेंका था, जबकि रूपाली पर उनकी सौतली मां ने तेजाब से हमला किया था। तो वहीं ऋतु जिन्होने दसवीं तक की पढ़ाई की है वो बॉलीवाल की राज्य स्तरीय खिलाड़ी रह चुकी हैं।

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ऋतु पर रिश्ते के एक भाई ने 26 मई, 2012 को एडिड अटैक करावाया था। इसके बाद वो 2 महीने तक अस्पताल में रहीं। इस बीच उनके 2 ऑपरेशन भी हुए। एक साल बाद दिल्ली के अपोलो अस्पताल में 6 ऑपरेशन हुए। ऋतु के मुताबिक इतने सारे ऑपरेशन के बाद भी वो ठीक नहीं हुई हैं और उनके अभी और ऑपरेशन होने बाकी हैं। ये पिछले डेढ़ साल से इस कैम्पेन के साथ जुड़ी हैं। आज वो यहां इतनी खुश हैं कि उनका कहना है कि “सबके पास एक परिवार होता है, लेकिन मेरे पास दो परिवार हैं। मुझे यहां काफी प्यार मिलता है।” अब ऋतु की तमन्ना है कि वो एक बार फिर खेल में अपनी किस्मत आजमायें।

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ऋतु के मुताबिक ‘शीरोज हैंगआउट’ की शुरूआत ये सोच कर की गई थी कि एसिड पीड़ित किसी से मांग कर ना खाएं और वो अपने पैरों पर खड़े हो सकें। इसलिए आज भी कई लोग यहां आकर कहते हैं कि वो कुछ खाना नहीं चाहते लेकिन पैसे देना चाहते हैं तो ये लोग इंकार कर देते हैं। ऋतु का कहना है कि “ये हमारी नौकरी है हम किसी से अहसान नहीं ले सकते। जिस तरह ओर लोग दूसरे कैफे या ऑफिस में जाकर काम करते हैं हम लोग भी ऐसे ही यहां पर काम करते हैं।”

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