लोगों के तानों से पिंक बस की ड्राइविंग सीट तक, बिहार की छह बेटियों ने यूं बदली अपनी तकदीर
बिहार की पिंक बसों में ड्राइवर बनीं छह लड़कियों ने सामाजिक बंदिशों, आर्थिक चुनौतियों और लोगों के तानों को पीछे छोड़ नई पहचान बनाई है. रागिनी, अनीता, बेबी, गायत्री, आरती और सरस्वती की कहानी बताती है कि मौका और हौसला मिले तो बेटियां हर स्टीयरिंग संभाल सकती हैं.
बिहार की सड़कों पर दौड़ती पिंक बस को दूर से देखें तो यह शहर की दूसरी बसों जैसी ही नजर आती है. फर्क उसके रंग में है, लेकिन उससे कहीं बड़ा बदलाव उसकी ड्राइविंग सीट पर दिखाई देता है.
स्टीयरिंग संभाल रहीं लड़कियां केवल यात्रियों को उनकी मंजिल तक नहीं पहुंचा रही हैं. उनके साथ सफर कर रही हैं परिवार की उम्मीदें, गांव की बदलती सोच और अपने लिए बेहतर भविष्य बनाने की आकांक्षा.
रागिनी कुमारी, अनीता कुमारी, बेबी कुमारी, गायत्री कुमारी, आरती कुमारी और सरस्वती कुमारी इसी बदलाव का चेहरा हैं. इनमें कई महादलित समुदाय से आती हैं. किसी के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं तो किसी की मां ने खेतों और दूसरे लोगों के घरों में काम करके परिवार संभाला है.
कभी गांव में इनके बस चलाने के सपने पर सवाल उठे. किसी के कद का मजाक बनाया गया तो किसी से कहा गया कि भारी वाहन चलाना लड़कियों का काम नहीं है. आज यही लड़कियां बस और ट्रक जैसे भारी वाहन चलाकर उन धारणाओं को चुनौती दे रही हैं.
तानों को पीछे छोड़ ड्राइविंग सीट तक पहुंचीं रागिनी
पटना जिले के पुनपुन प्रखंड के अलाउद्दीन चक की 21 वर्षीय रागिनी कुमारी महादलित मुसहर समुदाय से आती हैं. शिक्षा से रोजगार तक उनका सफर आसान नहीं रहा. वह अपने बड़े संयुक्त परिवार की पहली ग्रेजुएट महिला हैं.
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर रही है. उनकी मां ने खेतों और दूसरे लोगों के घरों में काम करके परिवार की जिम्मेदारियां संभालीं. ऐसे में रागिनी के लिए नौकरी केवल करियर बनाने का सवाल नहीं था. यह परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने की कोशिश भी थी.
उनकी पढ़ाई की शुरुआत नारी गुंजन से हुई. बाद में वह दानापुर के प्रेरणा छात्रावास में रहीं. ग्रेजुएशन के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की, लेकिन इसी दौरान ड्राइविंग ने उनकी जिंदगी को एक नई दिशा दी.
महिला एवं बाल विकास निगम की मदद से औरंगाबाद के इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राइविंग ट्रेनिंग एंड रिसर्च (IDTR) में उन्होंने पहले हल्के वाहन और फिर भारी वाहन चलाने की ट्रेनिंग ली. फैसला आसान नहीं था. गांव में सवाल उठे, उनके कद और काबिलियत पर तंज किए गए, लेकिन रागिनी ने ट्रेनिंग जारी रखी.
वह कहती हैं, “जब मैं ट्रेनिंग के लिए औरंगाबाद गई तो गांव में लोगों ने मेरे माता-पिता को बहुत कुछ कहा. किसी ने पूछा कि बेटी भाग गई है क्या, तो किसी ने कहा कि लड़की बस कैसे चलाएगी. मैंने उन बातों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. नारी गुंजन, सुधा दीदी, प्रकाश सर, सोहन सर और पप्पू भैया ने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया.”
रागिनी की मंजिल पिंक बस की ड्राइविंग सीट तक सीमित नहीं है. वह परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत करना चाहती हैं ताकि उनकी मां को मेहनत-मजदूरी न करनी पड़े. इसके बाद उनका सपना पीएचडी करने और प्रोफेसर बनने का है.

रागिनी, अनीता, बेबी, गायत्री, आरती और सरस्वती ने सामाजिक चुनौतियों को पीछे छोड़ पिंक बस का स्टीयरिंग थामा है. ये छह युवा ड्राइवर बिहार में महिला आत्मनिर्भरता और बदलती सोच की नई तस्वीर पेश कर रही हैं.
अनीता और आरती ने डर को बनाया ताकत
22 वर्षीय अनीता कुमारी के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं. जब औरंगाबाद जाकर भारी वाहन चलाने की ट्रेनिंग का मौका मिला, तब परिवार के सामने वहां जाने का खर्च जुटाना भी चुनौती थी.
बड़ी गाड़ी देखकर शुरुआत में अनीता खुद भी घबराती थीं. लेकिन ट्रेनिंग के साथ डर कम हुआ और आत्मविश्वास बढ़ता गया. आज बस और ट्रक जैसे भारी वाहन चलाना उनकी नई पहचान का हिस्सा है.
अनीता बताती हैं, “जब मैंने पहली बार भारी गाड़ी देखी तो मन में डर था कि क्या मैं इसे चला पाऊंगी. हमारे परिवार की हालत ऐसी नहीं थी कि बिना सोचे कोई बड़ा फैसला ले सकें. ट्रेनिंग के लिए जाने तक की चिंता थी. लेकिन धीरे-धीरे मैंने गाड़ी को समझा और मेरा डर खत्म होता गया. आज बस और ट्रक चलाते समय मुझे अपने ऊपर भरोसा रहता है. मुझे लगता है कि मौका और सही ट्रेनिंग मिले तो लड़कियां किसी भी काम में पीछे नहीं हैं.”
भोजपुर जिले के सिकरहट्टा खुर्द की 21 वर्षीय आरती कुमारी की कहानी भी इसी भरोसे को हासिल करने की है. वह 2023 में नारी गुंजन से जुड़ीं. पहले हल्के वाहन की ट्रेनिंग ली और फिर औरंगाबाद में एक महीने की भारी वाहन प्रशिक्षण प्रक्रिया पूरी की.
शुरुआत में उनके मन में भी सवाल था कि इतनी बड़ी बस कैसे संभालेंगी. परिवार और प्रशिक्षकों के सहयोग ने धीरे-धीरे इस आशंका को आत्मविश्वास में बदल दिया.
आरती कहती हैं, “शुरुआत में मुझे खुद नहीं पता था कि मैं इतनी बड़ी बस चला पाऊंगी या नहीं. गांव के कई लोगों को भी विश्वास नहीं था. लेकिन मेरे मम्मी-पापा ने हमेशा मेरा साथ दिया. पप्पू भैया और सुधा दीदी ने मुझे डरने के बजाय सीखने के लिए कहा. औरंगाबाद में ट्रेनिंग के दौरान धीरे-धीरे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा.”
आज पिंक बस चलाते हुए आरती अपने सफर को केवल निजी उपलब्धि की तरह नहीं देखतीं. वह चाहती हैं कि उनके गांव की दूसरी लड़कियां भी अपने करियर के फैसले खुद लेने का साहस जुटाएं.
बेबी और गायत्री के लिए आत्मनिर्भरता की नई राह
पुनपुन देहरी की 22 वर्षीय बेबी कुमारी बचपन से नारी गुंजन से जुड़ी रही हैं. पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह रोजगार की तलाश में थीं, तब उन्हें ड्राइविंग ट्रेनिंग के बारे में जानकारी मिली. उन्होंने 2023 में हल्के वाहन और 2025 में औरंगाबाद से भारी वाहन चलाने की ट्रेनिंग पूरी की.
लेकिन असली चुनौती ट्रेनिंग सेंटर से बाहर उनका इंतजार कर रही थी.
गांव में उनके कम कद को लेकर मजाक बनाया गया. लोगों ने कहा कि वह इतनी बड़ी गाड़ी नहीं संभाल पाएंगी. बेबी ने इन टिप्पणियों को अपने फैसले पर हावी नहीं होने दिया.
वह कहती हैं, “जब मैं गांव में बताती थी कि ड्राइविंग सीख रही हूं तो कई लोग मेरी कम हाइट का मजाक बनाते थे. कहते थे कि इतनी बड़ी गाड़ी कैसे चलाओगी. कई बार ताने सुनने पड़े, लेकिन मैंने ट्रेनिंग नहीं छोड़ी. मेरे मम्मी-पापा ने मेरा साथ दिया और सुधा दीदी तथा पप्पू भैया ने लगातार हौसला बढ़ाया.”
आज पिंक बस चलाना उनके लिए केवल रोजगार नहीं, आत्मसम्मान का विषय भी है. वह चाहती हैं कि दूसरी लड़कियां भी लोगों की बातों से डरकर अपने सपने छोड़ने के बजाय उन्हें पूरा करने की कोशिश करें.
पुनपुन प्रखंड के पैमार घाट की 22 वर्षीय गायत्री कुमारी भी महादलित समुदाय से आती हैं. उनकी शिक्षा की शुरुआत गांव में नारी गुंजन के केंद्र से हुई. उन्होंने दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई पूरी की और अब बीए कर रही हैं.
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान उन्हें ड्राइविंग सीखने का अवसर मिला. 2023 में हल्के वाहन और 2025 में भारी वाहन का प्रशिक्षण लेने के बाद उनका चयन पिंक बस चालक के रूप में हुआ.
गायत्री कहती हैं, “नारी गुंजन से मेरा रिश्ता बचपन से है. वहीं से पढ़ाई की शुरुआत हुई और धीरे-धीरे आगे बढ़ने का भरोसा मिला. जब ड्राइविंग सीखने का मौका आया तो परिवार ने साथ दिया. सुधा दीदी, प्रकाश सर और पप्पू भैया ने हमें लगातार आगे बढ़ाया.”
गायत्री पढ़ाई और नौकरी दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ रही हैं. उनकी मां भी महिला बैंड से जुड़ी हैं. वह अपने परिवार में आए इस बदलाव को महिलाओं के लिए अवसरों के व्यापक असर से जोड़ती हैं.
वह कहती हैं, “आज मैं पढ़ाई भी कर रही हूं और पिंक बस की जिम्मेदारी भी संभाल रही हूं. मेरी मां भी महिला बैंड से जुड़ी हैं. हमारे परिवार में आए इस बदलाव को देखकर लगता है कि महिलाओं को मौका मिले तो पूरी पीढ़ी की सोच बदल सकती है.”
सरस्वती की पहचान बनी पिंक बस की ड्राइविंग सीट
पैमार घाट की 21 वर्षीय सरस्वती कुमारी के लिए पिंक बस तक पहुंचना केवल नौकरी मिलने की कहानी नहीं है. यह अपनी पहचान बनाने का सफर भी है.
वह बचपन से नारी गुंजन से जुड़ी रहीं और गांव में चलने वाली कक्षाओं में पढ़ीं. बाद में उन्होंने हल्के और भारी वाहन चलाने की ट्रेनिंग ली.
पहली बार भारी वाहन चलाने की बात आई तो उनके मन में भी वही धारणा थी, जो समाज में अक्सर सुनाई देती है कि इतनी बड़ी गाड़ी चलाना पुरुषों का काम है. ट्रेनिंग ने धीरे-धीरे यह सोच बदल दी.
गांव में भी उन्हें सलाह दी गई कि डॉक्टर या टीचर बनने की कोशिश करें, क्योंकि बस चलाना लड़कियों का काम नहीं है. सरस्वती ने इसे चुनौती की तरह लिया.
वह कहती हैं, “पहली बार ट्रेनिंग पर गई तो मुझे भी लगा था कि शायद बस चलाना लड़कों का काम है और मुझसे नहीं होगा. लेकिन वहां शिक्षकों ने हमारा हौसला बढ़ाया. गांव लौटने पर लोगों ने कहा कि लड़की बस नहीं चला सकती. मैंने सोचा कि जब दूसरे सीख सकते हैं तो मैं क्यों नहीं.”
आज पिंक बस उनकी पहचान बन चुकी है. सरस्वती के लिए सबसे खास पल तब होता है, जब कोई महिला यात्री उन्हें स्टीयरिंग संभालते देखकर खुद ड्राइविंग सीखने की इच्छा जताती है.
सरस्वती कहती हैं, “जब दूसरी महिलाएं मुझे देखकर कहती हैं कि वे भी ड्राइविंग सीखना चाहती हैं, तब लगता है कि हमारी मेहनत केवल हमारे लिए नहीं, दूसरी लड़कियों के लिए भी रास्ता बना रही है.”
पिंक बस के साथ बदलती बिहार की तस्वीर
महिलाओं को सुरक्षित और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बिहार में पिंक बस सेवा शुरू की गई. लेकिन इस कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू बसों से आगे जाकर उन महिलाओं तक पहुंचता है, जो इन्हें चला रही हैं.
कमर्शियल और भारी वाहन ड्राइविंग लंबे समय से पुरुष-प्रधान पेशा रहा है. ऐसे में इन युवतियों का प्रशिक्षण लेकर ड्राइविंग सीट तक पहुंचना रोजगार में महिलाओं की भागीदारी से जुड़ी एक बड़ी तस्वीर का छोटा, लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा है.
भारत में महिलाओं की श्रम बाजार में भागीदारी हाल के वर्षों में बढ़ी है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की Periodic Labour Force Survey (PLFS) 2023-24 रिपोर्ट के मुताबिक, 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की महिलाओं की Labour Force Participation Rate (LFPR) सामान्य स्थिति के आधार पर 41.7 प्रतिशत थी, जो 2017-18 में 23.3 प्रतिशत थी. यह बढ़ती भागीदारी बताती है कि महिलाएं आर्थिक गतिविधियों में पहले की तुलना में अधिक संख्या में प्रवेश कर रही हैं. हालांकि परिवहन जैसे पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी अब भी सीमित है.
रागिनी, अनीता, बेबी, गायत्री, आरती और सरस्वती की कहानी इसी बदलाव को जमीनी स्तर पर सामने रखती है. भारी वाहन की ट्रेनिंग, लाइसेंस और चयन प्रक्रिया पूरी कर इन युवतियों ने ऐसे पेशे में जगह बनाई है, जहां कुछ साल पहले तक उनके लिए अवसर की कल्पना करना भी मुश्किल था.
इन छह कहानियों में आर्थिक मुश्किलें हैं, सामाजिक ताने हैं और अवसरों की कमी भी है. लेकिन इनकी पहचान इन मुश्किलों से नहीं, उन्हें पार करने के फैसले से बनती है.
इस सफर में परिवारों, खासकर माताओं की भूमिका भी अहम रही. कई माताओं ने खेतों और घरों में काम करके बेटियों की पढ़ाई और परिवार की जरूरतें पूरी कीं. अब वही बेटियां अपने परिवार की आर्थिक तस्वीर बदलने की कोशिश कर रही हैं.
पटना की सड़कों पर पिंक बस का स्टीयरिंग थामे ये युवा महिलाएं हर दिन कोई भाषण नहीं देतीं. शायद उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं है. उनकी मौजूदगी ही बहुत कुछ कहती है.
रागिनी आगे पीएचडी करके प्रोफेसर बनना चाहती हैं. गायत्री अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए हैं. आरती चाहती हैं कि उनके गांव की दूसरी लड़कियां भी अपने करियर के फैसले खुद लें. बेबी के लिए ड्राइविंग आत्मसम्मान बन चुकी है. अनीता ने अपने डर को हुनर में बदला है और सरस्वती अपनी नई पहचान के जरिए दूसरी महिलाओं को प्रेरित होते देख रही हैं.
इन छह युवतियों की मंजिल पिंक बस की ड्राइविंग सीट पर खत्म नहीं होती. शायद असली सफर यहीं से शुरू होता है.
बिहार की सड़कों पर घूमता पिंक बस का पहिया उस बदलाव की कहानी कह रहा है, जहां बेटियां अब केवल अपनी मंजिल नहीं चुन रही हैं, बल्कि वहां तक पहुंचने के लिए स्टीयरिंग भी खुद संभाल रही हैं.





