‘मशरूम मैन ऑफ बिहार’ संजीव कुमार ने 50 हजार किसानों को दिखाई कमाई की राह
इंजीनियरिंग के बाद शहर की नौकरी के बजाय गांव और खेती को चुनने वाले बिहार के संजीव कुमार ने मशरूम उत्पादन में नई राह बनाई. SABRI Spawn Lab की स्थापना से लेकर 50 हजार किसानों को प्रशिक्षण देने तक, वह मशरूम को ग्रामीण रोजगार, पोषण और कृषि उद्यमिता से जोड़ रहे हैं.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद अच्छी नौकरी और शहर में बेहतर जिंदगी की तलाश युवाओं के लिए आम रास्ता है. बिहार के नालंदा जिले के संजीव कुमार (Sanjeev Kumar) के सामने भी यह विकल्प था, लेकिन उन्होंने गांव और खेती को चुना.
किसान परिवार से आने वाले संजीव ने इंजीनियरिंग से मिली टेक्नोलॉजी की समझ को खेती के पारंपरिक अनुभव से जोड़ा और मशरूम में संभावनाएं तलाशनी शुरू कीं. करीब दो दशक की इस यात्रा में वह मशरूम उत्पादन और प्रशिक्षण से आगे बढ़ते हुए स्पॉन यानी मशरूम बीज उत्पादन तक पहुंचे. अपने गांव मोहद्दीपुर में उन्होंने SABRI Spawn Lab की स्थापना की. आज संजीव कुमार ‘मशरूम मैन ऑफ बिहार’ (Mushroom Man of Bihar) के नाम से मशहूर हैं.
संजीव के मुताबिक, अब तक वह बिहार के अलग-अलग जिलों में 50 हजार से अधिक महिला और पुरुष किसानों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दे चुके हैं. अब उनकी योजना स्पॉन उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ बटन मशरूम, प्रोसेस्ड प्रोडक्ट और मशरूम उत्पादन के बाद बचने वाले सब्सट्रेट से जैविक खाद तैयार करने की है.
यह कोशिश ऐसे समय में हो रही है जब भारत में मशरूम उत्पादन तेजी से बढ़ा है. बिहार सरकार के उद्यान निदेशालय की वेबसाइट पर उपलब्ध एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में मशरूम उत्पादन 2016 के करीब 1.29 लाख टन से बढ़कर 2024 में करीब 3.99 लाख टन हो गया. यानी आठ वर्षों में उत्पादन तीन गुना से अधिक हुआ.
इंजीनियरिंग से मशरूम की खेती तक
नालंदा के बिंद प्रखंड के मोहद्दीपुर गांव के संजीव कुमार ने B.I.T. Sindri (रांची यूनिवर्सिटी) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. किसान परिवार में पले-बढ़े होने के कारण खेती उनके लिए नई नहीं थी. इंजीनियरिंग ने उन्हें टेक्नोलॉजी को समझने का नजरिया दिया, जबकि खेती की शुरुआती समझ परिवार से मिली. आगे चलकर इन्हीं दोनों अनुभवों ने मशरूम उत्पादन की बुनियाद तैयार की.
वर्ष 2002 में उन्होंने सोलन, हिमाचल प्रदेश में मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया. इसके बाद उन्होंने इसकी खेती शुरू की. यह वह दौर था जब गांवों में पढ़े-लिखे युवाओं के लिए नौकरी को सफलता का ज्यादा सुरक्षित रास्ता माना जाता था. ऐसे में खेती को करियर बनाना और वह भी मशरूम जैसी अपेक्षाकृत कम प्रचलित फसल के साथ, आसान फैसला नहीं था.
संजीव बताते हैं, “शुरुआती वर्षों में हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों का भरोसा जीतना था. मशरूम को लेकर जानकारी बहुत कम थी और बिहार में तैयार बीज की गुणवत्ता पर भी लोग आसानी से विश्वास नहीं करते थे. वर्ष 2002 से 2008 तक मैंने काफी संघर्ष किया. आर्थिक मुश्किलें भी आईं और लोगों की बातें भी सुननी पड़ीं. परिवार का साथ मिला और ‘स्वस्थ बिहार, समृद्ध बिहार’ के संकल्प ने मुझे लगातार आगे बढ़ने की ताकत दी.”
50 हजार से अधिक किसानों को दी ट्रेनिंग
संजीव ने मशरूम की खेती शुरू की तो उनका मकसद केवल अपना कारोबार खड़ा करना नहीं था. उन्होंने आसपास के किसानों को भी इसकी खेती के बारे में बताना और प्रशिक्षण देना शुरू किया. धीरे-धीरे सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के सहयोग से इसका दायरा बढ़ता गया.
संजीव का दावा है कि अब तक बिहार के अलग-अलग जिलों में 50 हजार से अधिक महिला और पुरुष किसानों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जा चुका है. वह बिहार और झारखंड में नियंत्रित वातावरण वाली कई मशरूम उत्पादन इकाइयों की स्थापना में तकनीकी सहयोग देने की बात भी कहते हैं.
उनका मानना है कि मशरूम ग्रामीण परिवारों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया बन सकता है. इसके लिए बड़े खेत की जरूरत नहीं होती और कई किस्मों के उत्पादन में धान के पुआल जैसे कृषि अवशेष को सब्सट्रेट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
ICAR (Indian Council of Agricultural Research) भी मशरूम उत्पादन को ग्रामीण परिवारों और महिला उद्यमियों के लिए आय पैदा करने वाली गतिविधि के रूप में देखता है.
संजीव कहते हैं, “हमारा जोर ‘मास प्रोडक्शन’ से ज्यादा ‘प्रोडक्शन बाय मासेस’ पर है. केवल कुछ बड़ी इकाइयों में ज्यादा मशरूम पैदा करना काफी नहीं है. जरूरत है कि ज्यादा लोग इसका उत्पादन सीखें, उससे कमाई करें और इसे अपने भोजन में शामिल करें. गांवों में छोटे स्तर पर उत्पादन बढ़ेगा तो रोजगार के अवसर भी वहीं तैयार होंगे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा होगा.”

संजीव कुमार अब तक बिहार के अलग-अलग जिलों में 50 हजार से अधिक महिला और पुरुष किसानों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दे चुके हैं और उनका मिशन जारी है.
गांव में खड़ी की स्पॉन लैब
खेती और प्रशिक्षण के बाद संजीव ने मशरूम के स्पॉन उत्पादन की ओर कदम बढ़ाया और मोहद्दीपुर गांव में SABRI (Systemic Agro Based Research Institute) Spawn Lab स्थापित की.
संजीव का दावा है कि यह बिहार की सबसे बड़ी मशरूम स्पॉन उत्पादन लैब है. उनके मुताबिक, पिछले तीन-चार वर्षों में लैब की उत्पादन क्षमता 400 किलोग्राम प्रतिदिन से बढ़कर करीब 600 किलोग्राम प्रतिदिन हो गई है. अब इसे 1,000 किलोग्राम प्रतिदिन तक पहुंचाने की योजना है.
लैब में ऑयस्टर, बटन और मिल्की मशरूम के लिए स्पॉन तैयार किया जाता है. संजीव बताते हैं कि उत्पादन प्रक्रिया नियंत्रित वातावरण में होती है और ऊर्जा दक्ष उपकरणों के साथ सेमी-ऑटोमैटिक सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है. फिलहाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल नहीं हो रहा है, लेकिन भविष्य में AI-समर्थित कंट्रोल्ड एनवायरनमेंट सिस्टम लगाने पर विचार किया जा रहा है.
लैब में फिलहाल 10 प्रशिक्षित कर्मचारी काम करते हैं, जिनमें सात पुरुष और तीन महिलाएं हैं.
संजीव कहते हैं, “बिहार में स्पॉन लैब शुरू करने के समय किसानों को यह भरोसा दिलाना मुश्किल था कि अपने राज्य में भी अच्छी गुणवत्ता का मशरूम बीज तैयार हो सकता है. पहले बटन मशरूम का स्पॉन पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों से मंगाया जाता था. आज हमारी लैब से बिहार के अलावा झारखंड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और हरियाणा के मशरूम फार्म तक स्पॉन भेजा जा रहा है. मेरे लिए गांव में यह क्षमता तैयार होना कारोबार से ज्यादा महत्वपूर्ण है.”
‘Waste to Wealth’ मॉडल से कमाई
मशरूम उत्पादन का एक महत्वपूर्ण पहलू कृषि अवशेष का उपयोग भी है. धान के पुआल सहित कई कृषि अवशेष मशरूम उत्पादन के लिए सब्सट्रेट का काम कर सकते हैं.
ICAR-IARI के एक आकलन में भारत में उपलब्ध फसल अवशेष की मात्रा करीब 600 मिलियन टन बताई गई थी. हालांकि यह एक पुराना अनुमान है और इसे मौजूदा वार्षिक उत्पादन का आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए. यह आंकड़ा देश में कृषि अवशेष के विशाल पैमाने का संकेत देता है.
हाल के वर्षों में ICAR ने अलग-अलग कृषि अवशेषों से ऑयस्टर मशरूम उगाने के प्रयोग भी किए हैं. उदाहरण के लिए, ICAR-KVK Anjaw ने बड़ी इलायची के डंठल और अवशेष को ऑयस्टर मशरूम के सब्सट्रेट के रूप में इस्तेमाल किया.
संजीव इसी ‘Waste to Wealth’ मॉडल में संभावनाएं देखते हैं. मशरूम उत्पादन के बाद बचने वाले पदार्थ को स्पेंट मशरूम सब्सट्रेट यानी SMS कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल आगे कम्पोस्ट या अन्य कृषि उपयोगों में किया जा सकता है.
वह कहते हैं, “हमारे पास बड़ी मात्रा में कृषि अवशेष उपलब्ध है. अगर इसके छोटे हिस्से का भी मशरूम उत्पादन में इस्तेमाल हो और लोग मशरूम को अपने भोजन का हिस्सा बनाएं तो रोजगार और पोषण दोनों के लिहाज से अवसर तैयार हो सकते हैं. इसके लिए उत्पादन के साथ जागरूकता, प्रोसेसिंग, स्टोरेज और मजबूत सप्लाई चेन पर काम करना जरूरी है.”
संजीव की यात्रा बिहार में मशरूम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए चल रही सरकारी पहलों के बीच आगे बढ़ी है. राज्य सरकार का उद्यान निदेशालय प्रशिक्षण से लेकर उत्पादन इकाइयों तक अलग-अलग स्तर पर योजनाएं चला रहा है.
संजीव मानते हैं कि सब्सिडी और प्रशिक्षण के साथ अब बाजार, कोल्ड चेन, स्टोरेज और प्रोसेसिंग पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है.

SABRI Spawn Lab का निरीक्षण करते हुए तत्कालीन कृषि सचिव, बिहार संजय कुमार अग्रवाल
अब बटन मशरूम, प्रोसेसिंग और जैविक खाद पर नजर
SABRI Spawn Lab अब कारोबार के अगले चरण की तैयारी कर रही है. संजीव के मुताबिक, सितंबर से 200 टन सालाना क्षमता वाली बटन मशरूम उत्पादन इकाई शुरू करने की योजना है. इसका इस्तेमाल उत्पादन के साथ युवाओं को प्रशिक्षण देने में भी किया जाएगा.
साल के अंत तक मशरूम उत्पादन के बाद निकलने वाले SMS से जैविक खाद और वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने की इकाई लगाने की भी योजना है.
इसके बाद महिलाओं और युवाओं की टीम के साथ मशरूम से प्रोसेस्ड प्रोडक्ट तैयार करने और शिटाके मशरूम (Shiitake Mushroom) का उत्पादन शुरू करने की तैयारी है.
संजीव मानते हैं कि इस क्षेत्र को बढ़ाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. मांग, बाजार, स्टोरेज, प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन को भी साथ विकसित करना होगा. उनके मुताबिक, सरकारी कैंटीन, अस्पताल और रेलवे जैसे संस्थागत खरीदारों के बीच मशरूम की मांग बढ़ाने की संभावनाएं भी तलाशी जा सकती हैं.
वह कहते हैं, “सरकार मशरूम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है और किसानों को अलग-अलग योजनाओं में अनुदान मिलता है. लेकिन कुछ योजनाओं में बैंकिंग और क्रेडिट से जुड़ी प्रक्रियाएं छोटे किसानों के लिए मुश्किल हो सकती हैं. सरकार बाजार, स्टोरेज, सप्लाई चेन और प्रोसेसिंग पर ज्यादा ध्यान दे तो मशरूम के जरिए महिलाओं और युवाओं के लिए बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर तैयार किए जा सकते हैं.”
गांव में रोजगार को बढ़ावा
मशरूम उत्पादन, कृषि, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक क्षेत्र में किए गए कार्यों के लिए संजीव कुमार को समय-समय पर कई सम्मानों से नवाजा गया है. इनमें वर्ष 2006-07 में बिहार सरकार की ओर से दिया गया ‘किसान श्री’ सम्मान, वर्ष 2021 का ‘Nelson Mandela Nobel Peace Award’ (Environment Care and Cultivation), ‘नीलकंठ सम्मान’, ‘सरदार पटेल सम्मान’ और ‘श्याम नारायण सिंह सामाजिक सद्भावना सम्मान’ शामिल हैं.
इसके अलावा मशरूम उत्पादन और कृषि के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि तथा MGGPF, India की ओर से Gandhian Philosophy और Peace of Humanity के क्षेत्र में Honorary Professor की उपाधि भी प्रदान की गई है.
हालांकि उनकी कहानी का अहम पहलू पुरस्कारों से ज्यादा वह फैसला है, जो उन्होंने करीब दो दशक पहले लिया था, इंजीनियरिंग की डिग्री के बाद शहर की नौकरी के बजाय गांव में रहकर कृषि में तकनीक का इस्तेमाल करने का.
आज उनका अगला लक्ष्य स्पॉन उत्पादन क्षमता को 1,000 किलोग्राम प्रतिदिन तक पहुंचाना, 200 टन सालाना क्षमता वाली बटन मशरूम इकाई शुरू करना और प्रोसेसिंग तथा जैविक खाद के जरिए कारोबार की पूरी वैल्यू चेन तैयार करना है.
इस मॉडल की असली परीक्षा केवल उत्पादन क्षमता से नहीं होगी. यह इस बात से तय होगी कि कितने छोटे किसान, महिलाएं और ग्रामीण युवा मशरूम से टिकाऊ आमदनी बना पाते हैं और स्थानीय स्तर पर बाजार कितना विकसित होता है.
संजीव इसी दिशा में अपने शुरुआती विचार ‘प्रोडक्शन बाय मासेस’ को आगे ले जाना चाहते हैं. यानी मशरूम कुछ बड़े उत्पादकों का कारोबार बनने के बजाय गांवों में हजारों छोटे उद्यमियों की आय का जरिया बने.
इस सफर में संजीव बिहार सरकार की कृषि और बागवानी से जुड़ी योजनाओं, बिजली सब्सिडी और मशरूम उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों को अहम मानते हैं. उनका मानना है कि बेहतर नीतियों, योजनाओं और सुशासन की कोशिशों ने राज्य में कृषि आधारित उद्यमों के लिए नए अवसर तैयार किए हैं.





