शनै: शनै: मम हृदये आगच्छ...गाते हुए रिसर्च स्कॉलर पंकज झा बन गये संस्कृत गायक

हिन्दी गाने को संस्कृत में गाने वाले पंकज झा कर रहे हैं संस्कृत से पीएचडी  की पढ़ाई संस्कृत को आम बोलचाल की भाषा बनाने के मिशन पर काम करने को बनाया जीवन का उद्देश्य

13th Jul 2016
  • +0
Share on
close
  • +0
Share on
close
Share on
close

क्या आपने कभी सोचा है कि हिन्दी फिल्मों के पॉपुलर गीतों को अगर संस्कृत में गाया जाय तो कैसा लगेगा? शायद आप मेरी इस बात पर अचरज ज़ाहिर करें, लेकिन अब आपको हिन्दी फिल्मों के धुन पर वही गाने संस्कृत में सुनने को मिले तो कैसा लगेगा। जी हाँ ऐसी ही एक कोशिश शुरु हो गई है, जिसे इसे सुनने वालों ने काफी पसंद किया है। इतना ही नहीं ऐसा ही एक गाना आजकल लोगों के मोबाइल का रिंग टोन बन रही है। 1990 में आई फिल्म आशिक़ी जिसका गाना धीरे-धीरे से मेरी जिंदगी में आना....काफी पॉपुलर हुआ था, इस गाने को संस्कृत भाषा में रिसर्च स्कॉलर पंकज झा ने गाया है।

image


गाने का संस्कृत वर्जन ‘शनै: शनै: मम हृदये आगच्छ...

‘धीरे-धीरे से मेरी ज़िंदगी में आना...’ का संस्कृत वर्जन ‘शनै: शनै: मम हृदये आगच्छ के गायक पंकज संस्कृत विषय के रिसर्च स्कॉलर हैं और उनका ताल्लुक, झारखंड के देवघर से है, यहीं उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा हुई। हालांकि इस गाने को नए रूप में पिछले साल रैपर हनी सिंह ने भी गाया था और गाने का वो वर्जन भी काफी लोकप्रिय हुआ था, लेकिन इस बार बारी थी पंकज झा की। पंकज ने अपनी इस कोशिश को पहले तो अपने दोस्तों के साथ व्हाट्सअप ग्रुप पर शेयर किया। लेकिन देखते ही देखते पंकज का गाया गाना.. ‘धीरे-धीरे से मेरी जिदंगी में आना...’ का संस्कृत वर्जन ‘शनै: शनै: मम हृदये आगच्छ, मोबाइल का रिंग टोन बनने लगा। पंकज इससे खासे उत्साहित हुए, गाने को फेसबुक और यू-ट्यूब पर काफी लोगों ने सुना और पसंद किया। आगे पंकज की योजना प्रचलित हिन्दी गानों को संस्कृत में गाने की है।

image


योर स्टोरी से बात करते हुए पंकज बताते हैं कि उन्हें शुरुआत में उनके द्वारा गाए संस्कृत के इस गाने का इतना पॉपुलर हो जाने का अंदाज़ा नहीं था, क्योंकि संस्कृत आम बोलचाल की भाषा नहीं है। उनके इस कोशिश को लोगों द्वारा सराहे जाने से पंकज को भरपुर उर्जा मिली है और आगे वो मूल संस्कृत में लिखे गाने गाना चाहते हैं। संस्कृत को लेकर पंकज में एक प्रकार का जुनून है और वो संस्कृत को आम लोगों की बोलचाल की भाषा बनाने के मिशन पर काम कर रहे हैं।

पंकज ने बताया कि इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में करीब दो महीने का वक्त लगा। पहले तो ये समझने में काफी वक्त निकल गया कि इसके बोल किस प्रकार रखे जाएँ, लेकिन काफी सोच-विचार के बाद इसे मूल गाने के भाव के करीब रखा गया, यानी कि मूल गाने की पैरोडी बनाई गई।

image


झारखंड की राजधानी रांची से करीब 250 किलो मीटर की दूरी पर स्थित देवघर पंकज झा का गृह नगर है। इस शहर को बिहार-झारखंड के लोग बाबा की नगरी के नाम से भी जानते हैं। यहाँ द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक बैद्यनाथ ज्योर्तिलिंग स्थापित है। देवघर में स्थित पुराणकालीन शिव मंदिर बैद्यनाथ ज्योर्तिलिंग स्थित होने के कारण इसे देवघर के नाम से भी जाना जाता है। पंकज का संबंध देवघर के तीर्थपुरोहित परिवार से है और उनके पिता, सदाशिव झा बैद्यनाथ धाम मंदिर के पुजारी हैं। देवघर के 30 युवाओं का एक ग्रुप व्हाट्सअप पर संस्कृत को प्रमोट करने के लिए काफी एक्टिव है और इस ग्रुप के सदस्यों की आपस की बातचीत भी संस्कृत में ही होती है। इतना ही नहीं, यहाँ की नई पीढ़ी को संस्कृत शिक्षा और ज्ञान की मज़बूती प्रदान करने के लिए संस्कृत पाठशाला के ज़रिए संस्कृत विषय से जोड़ा जा रहा है। 

image


 पंकज अपनी पढ़ाई की वजह से दिल्ली में रहते हैं, लेकिन छुट्टियों में जब भी वो देवघर जाते हैं, उनका ज्यादा वक्त बच्चों को संस्कृत सिखाने और इसके प्रसार में ही जाता है। वे अपनी आरंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद आगे की शिक्षा के लिए जम्मु गये। वहाँ उन्होंने गंगदेवजी संस्कृत कॉलेज में दाखिला लिया। यहाँ से पंकज के मन में संस्कृत को लेकर आगे कुछ करने का भाव जगा और पंकज अपने इस मिशन को पूरा करने दिल्ली पहुंचे। दिल्ली में पंकज को करोलबाग स्थित संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान (Sanskrit Promotion Foundation) में रिसर्च फैलो के रुप में काम करने का मौका मिला और वो यहां NCERT की पुस्तकों का संस्कृत अनुवाद करते हैं। संस्कृत भाषा को जन-जन तक पहुंचाने के मिशन में जुटा संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान, संस्कृत को बढ़ावा देने की कई योजनाओं पर काम करता है। यहाँ काम करते हुए वो अपनी आगे की पढ़ाई भी जारी रखे हुए हैं। पंकज इस वक्त दिल्ली स्थित लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ से पीएचडी कर रहे हैं।

image


भविष्य की योजनाएँ जिन पर आगे काम करना है :

योर स्टोरी से बात करते हुए संस्कृत की पहचान को लेकर पंकज काफी उदास हो जाते हैं, उनके मुताबिक संस्कृत ऐसी सरल भाषा है कि उसे हमारे बोलचाल की भाषा होनी चाहिए। देवताओं की भाषा होने का गौरव प्राप्त संस्कृत को वर्तमान में वैसी महत्ता नहीं दी जाती, जैसा कि अंग्रेज़ी भाषा को मिलती है। पंकज कहते हैं कि बच्चों के मां-बाप ही उन्हें ज्यादा अंग्रेज़ी के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे की संस्कृत कहीं पीछे रह जाती है, लेकिन वेद-पुराण से लेकर हिन्दू पूजा-पाठ में प्रचलित मंत्रोच्चारण सभी संस्कृत में ही पूर्ण कराए जाते हैं। अत : पंकज के मुताबिक संस्कृत भाषा की अवहेलना हमारी खुद की अवहेलना है।

पंकज ने बताया कि संस्कृत को ज्यादा से ज्यादा लोगों की भाषा बनाने के लिए सरकार की मदद की ज़रूरत होगी। बिना इसके ये काम संभव नहीं है। पंकज की इच्छा ज्यादा से ज्यादा गानों को मूल संस्कृत में लिखे जाने और गाए जाने के पक्ष में हैं। इतना ही नहीं पंकज अपने मिशन को बच्चों में संस्कृत का ज्ञान बढ़ाकर पूरा होता देखना चाहते हैं। वो मानते हैं कि हमें ज्यादा से ज्यादा अपने बोलचाल में संस्कृत का इस्तेमाल करना चाहिए इससे बच्चों में संस्कार तो विकसित होंगे और साथ ही साथ इस भाषा को लेकर जो उदासीनता घर कर गई है उसे भी दूर करने में मदद मिलेगी। 

Want to make your startup journey smooth? YS Education brings a comprehensive Funding and Startup Course. Learn from India's top investors and entrepreneurs. Click here to know more.

  • +0
Share on
close
  • +0
Share on
close
Share on
close

Latest

Updates from around the world

Our Partner Events

Hustle across India