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पटना से लंदन तक...अनिल अग्रवाल ऐसे बने मेटल और माइनिंग के किंग

वेदांता और फॉक्सकॉन 1.54 लाख करोड़ रुपये के निवेश के साथ गुजरात में देश का पहला सेमीकंडक्टर संयंत्र स्थापित करेंगी.

पटना से लंदन तक...अनिल अग्रवाल ऐसे बने मेटल और माइनिंग के किंग

Tuesday September 20, 2022 , 7 min Read

वेदांता रिसोर्सेज (Vedanta Resources) के फाउंडर व चेयरमैन अनिल अग्रवाल (Anil Agarwal) इस वक्त सुर्खियों में हैं. वजह है वेदांता और ताइवान की कंपनी फॉक्सकॉन के बीच हुआ एक समझौता. दरअसल वेदांता और फॉक्सकॉन (Foxconn) ने गुजरात सरकार के साथ एक एमओयू (Memorandum of Understanding) साइन किया है. यह एमओयू एक सेमीकंडक्टर व डिस्प्ले एफएबी मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी लगाने को लेकर है. वेदांता और फॉक्सकॉन 1.54 लाख करोड़ रुपये के निवेश के साथ गुजरात में देश का पहला सेमीकंडक्टर संयंत्र स्थापित करेंगी. इससे एक लाख रोजगार के अवसरों का सृजन होने की बात कही जा रही है. गुजरात में सेमीकंडक्टर बनाने का प्रस्तावित बिजनेस, Vedanta की होल्डिंग कंपनी वोल्कैन इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड (Volcan Investments Limited) देखेगी.

पटना से लंदन तक तक का तय किया सफर

अनिल अग्रवाल, वेदांता रिसोर्सेज लिमिटेड के चेयरमैन व फाउंडर हैं. वह वोल्कैन इन्वेस्टमेंट्स के जरिए वेदांता रिसोर्सेज को कंट्रोल करते हैं. अनिल मेटल और माइनिंग बिजनेस के दिग्गजों में से एक हैं. अनिल अग्रवाल का जन्म बिहार के पटना में एक मारवाड़ी परिवार में 1954में हुआ. उनके पिता का एल्यूमीनियम कंडक्टर का एक छोटा सा बिजनेस था. अनिल की पढ़ाई मिलर हाई स्कूल, पटना से हुई. इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने के बजाय कारोबार में अपने पिता का हाथ बंटाने का फैसला किया. 19 की उम्र में वह करियर अवसर तलाशने के लिए मुंबई चले गए. अनिल अग्रवाल ने मई 2022 में ट्वीट्स की सीरीज के जरिए बताया था कि जब उन्होंने बिहार छोड़ा था तो उनक हाथों में एक टिफिन बॉक्स और एक बिस्तरबंद और आंखों में सपने थे.

स्क्रैप मेटल बिजनेस से कारोबारी सफर की शुरुआत

1970 के दशक के मध्य में अनिल अग्रवाल ने स्क्रैप मेटल की ट्रेडिंग से कारोबारी सफर की शुरुआत की. वह दूसरे राज्यों की केबल कंपनियों से इसे इकट्ठा करते थे और मुंबई में बेचते थे. 1976 में अनिल ने शमशेर स्टर्लिंग कॉरपोरेशन का अधिग्रहण कर लिया. यह कंपनी अन्य प्रॉडक्ट्स के साथ-साथ इनेमल्ड कॉपर भी बनाती थी और इस पर बैंक लोन था. इसके बाद 10 सालों तक अनिल अग्रवाल ने दोनों कारोबारों को चलाया. 1986 में उन्होंने जेली फिल्ड केबल्स बनाने के लिए एक फैक्ट्री लगाई और स्टर्लाइट इंडस्ट्रीज को क्रिएट किया.

जल्द ही अनिल अग्रवाल को यह बात समझ आ गई कि उनके कारोबार की प्रॉफिटेबिलिटी अस्थिर है, इसमें कॉपर और एल्यूमीनियम जैसे कच्चे माल की कीमतों के साथ उतार-चढ़ाव आता है. इसलिए उन्होंने अपनी इनपुट कॉस्ट पर नियत्रंण रखने के लिए मेटल खरीदने के बजाय उन्हें मैन्युफैक्चर करने का फैसला किया.

1993 में कॉपर स्मेल्टर और रिफाइनरी स्थापित

1993 में स्टर्लाइट इंडस्ट्रीज, कॉपर स्मेल्टर और रिफाइनरी स्थापित करने वाली भारत की पहली प्राइवेट सेक्टर कंपनी बन गई. 1995 में इस कंपनी ने मद्रास एल्युमीनियम का अधिग्रहण किया, कि जो एक बीमार कंपनी थी और 4 साल से बंद थी. इसके बाद अनिल अग्रवाल ने खनन के क्षेत्र में कदम रखने की सोची. उन्हें पहला मौका तब मिला, जब सरकार ने विनिवेश कार्यक्रम की घोषणा की. 2001 में उन्होंने भारत एल्युमीनियम कंपनी यानी बाल्को में 51 प्रतिशत का अधिग्रहण किया. यह सार्वजनिक क्षेत्र का एक उपक्रम था. अगले ही साल उन्होंने सरकारी एचजेडएल (हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड) में बहुमत हिस्सेदारी (लगभग 65%) हासिल कर ली. दोनों कंपनियों को अक्षम खनन फर्म माना जाता था.

कब पहुंचे लंदन

इसके बाद अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों तक पहुंचने के लिए अनिल अग्रवाल और उनकी टीम ने 2003 में लंदन में वेदांता रिसोर्सेज PLC को इनकॉरपोरेट किया. लिस्टिंग के समय वेदांता रिसोर्सेज पीएलसी, 10 दिसंबर 2003 को लंदन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने वाली पहली भारतीय फर्म थी. अक्टूबर 2018 में अग्रवाल ने वेदांता की एक तिहाई हिस्सेदारी के लिए 1 अरब डॉलर से ज्यादा का भुगतान किया और इसके बाद वेदांता प्राइवेट कंपनी बन गई. हाल ही में अनिल अग्रवाल ने एक लिंक्डइन पोस्ट में बताया था कि ब्रिटेन में उनके शुरुआत के महीने मुश्किलों भरे थे. लेकिन वह नए अवसरों के लिए उत्साहित थे, साथ ही नर्वस भी.

वेदांता रिसोर्सेज, समूह की कंपनियों के आंतरिक पुनर्गठन और उनकी हिस्सेदारी की प्रक्रिया के माध्यम से समूह की पेरेंट कंपनी बन गई. वेदांता रिसोर्सेज भारत में सबसे बड़ी माइनिंग और नॉन-फेरस मेटल कंपनी है. वेदांत रिसोर्सेज एक ग्लोबली डायवर्सिफाइड नेचुरल रिसोर्सेज समूह है, जिसकी जिंक, सीसा, चांदी, तांबा, लौह अयस्क, एल्यूमीनियम, बिजली उत्पादन और तेल व गैस में रुचि है. वेदांता रिसोर्सेज का हेडक्वार्टर लंदन में है, हालांकि इसकी संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा भारत में है. वेदांता लिमिटेड, वेदांता रिसोर्सेज की कई भारतीय सब्सिडियरीज में से एक है और गोवा में लौह अयस्क खनन करती है. भारत में लिस्टेड वेदांता लिमिटेड में अधिकांश हिस्सेदारी अनिल अग्रवाल की ही है.

2012 में सेसा गोवा और स्टर्लाइट इंडस्ट्रीज का विलय

2004 में वेदांता रिसोर्सेज पीएलसी ने एक वैश्विक बांड पेशकश की घोषणा की और जाम्बिया, अफ्रीका में कोंकोला कॉपर माइन्स का अधिग्रहण किया. 2007 में वेदांता रिसोर्सेज ने भारत में लौह अयस्क की सबसे बड़ी उत्पादक-निर्यातक सेसा गोवा लिमिटेड में एक नियंत्रित हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया. 2010 में कंपनी ने नामीबिया, आयरलैंड और दक्षिण अफ्रीका में दक्षिण अफ्रीकी माइनिंग कंपनी एंग्लो अमेरिकन के जिंक एसेट्स पोर्टफोलियो का अधिग्रहण किया. 2011 में वेदांता रिसोर्सेज ने भारत के निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी तेल उत्पादक फर्म केयर्न इंडिया में कंट्रोलिंग स्टेक हासिल कर लिया. 2012 में सेसा गोवा और स्टर्लाइट इंडस्ट्रीज के विलय की घोषणा वेदांता समूह के एकीकरण के हिस्से के रूप में की गई. वेदांता लिमिटेड का पुराना नाम सेसा गोवा/स्टर्लाइट था.

1992 में वेदांता फाउंडेशन की स्थापना

1992 में अनिल अग्रवाल ने वेदांता फाउंडेशन की स्थापना की, जिसकी मदद से ग्रुप कंपनियां अपने दानधर्म के कार्यक्रम और गतिविधियां कर सकें. वित्त वर्ष 2013-14 में वेदांता ग्रुप कंपनियों और वेदांता फाउंडेशन ने हॉस्पिटल्स, स्कूलों व इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण, पर्यावरण संरक्षण और कम्युनिटी प्रोग्राम्स की फंडिंग में 4.9 करोड़ डॉलर निवेश किए. साल 2014 की हुरून इंडिया फिलांथरोपी लिस्ट में अनिल अग्रवाल 1796 करोड़ रुपये की अपनी पर्सनल डोनेशन के लिए दूसरे स्थान पर रहे थे.

कंट्रोवर्सी में भी घिरे

2004 में सुप्रीम कोर्ट की एक कमेटी ने यह चार्ज लगाया कि वेदांता ने तमिलनाडु में अपनी फैक्ट्री के निकट हजारों टन आर्सेनिक-बियरिंग स्लैग को डंप किया. इसकी वजह से पर्यावरण और आसपास की आबादी के लिए जहरीला वातावरण निर्मित हुआ. 2005 में सुप्रीम कोर्ट की एक और कमेटी ने यह चार्ज लगाया कि वेदांता ने ओडिशा में 100 से ज्यादा भारतीय परिवारों को उनके घर छोड़ने पर मजबूर किया, जहां वह बॉक्साइट का खनन करना चाहती थी. कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया कि कंपनी ने गुंडों की मदद से डर का माहौल बनाया और वेदांता के कर्मचारियों ने वहां रहने वालों से मारपीट भी की. इसके अलावा जांबिया में भी कंपनी विवादों में रही, जब यह सामने आया कि वेदांता ने अपनी कॉपर माइन से काफू नदी में हानिकारक वेस्ट डंप किया है. इस बारे में 2000 रेजिडेंट्स ने मुकदमा दायर किया. वेदांता की इस गतिविधि के चलते लोग बीमार पड़े और मछलियों की मृत्यु हुई.

इसके अलावा वेदांता की कहानी में तूतुकुड़ी हिंसा भी उल्लेखनीय है. मार्च व अप्रैल 2018 में तूतुकुड़ी (तूतीकोरिन) में कंपनी के दूसरे स्मेल्टिंग कॉम्प्लेक्स को बनाने की योजना के खिलाफ और पहले से चल रहे थूथुकुडी स्मेल्टिंग प्लांट को बंद करने की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ. कहा जा रहा था कि कंपनी ने पर्यावरणीय प्रावधानों का उल्लंघन किया है. मई 2018 में यह विरोध इतना गहरा गया कि पुलिस शूटिंग के बाद 13 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए धारा 144 लगानी पड़ी. लेकिन जांच में स्टर्लाइट इंडस्ट्रीज की इस मामले में भूमिका को लेकर कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला.

रियल टाइम नेटवर्थ 2.3 अरब डॉलर

अनिल अग्रवाल, फोर्ब्स की साल 2022 की अरबपतियों की लिस्ट में 728वें नंबर पर हैं. इंडियाज रिचेस्ट 2021 लिस्ट में वह 63वें नंबर पर थे. अनिल अग्रवाल, भारतीय नागरिक हैं लेकिन लंदन बेस्ड हैं. साल 2017 में उन्होंने लंदन में लिस्टेड माइनिंग कंपनी एंग्लो अमेरिकन में अपनी फैमिली ट्रस्ट के जरिए 19 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीद और 2019 में इसे बेच दिया. फोर्ब्स के मुताबिक, इस वक्त अनिल अग्रवाल व उनकी फैमिली की रियल टाइम नेटवर्थ 2.3 अरब डॉलर है. अग्रवाल ने प्राइवेट बनाई जा रहीं पब्लिक सेक्टर की भारतीय कंपनियों में निवेश के लिए लंदन की कंपनी सेंट्रिकस के साथ पार्टनरशिप में 10 अरब डॉलर का फंड भी क्रिएट किया है.