दियामाटी FPC: बिहार की महिलाओं ने मिलकर बनाया ऐसा मॉडल, जो बदल रहा गांवों का भविष्य
बिहार के सीतामढ़ी की दियामाटी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी (FPC) ने 2,100 से अधिक महिलाओं को शेयरधारक बनाकर ग्रामीण उद्यमिता की नई मिसाल कायम की है. जानिए कैसे खेती, बकरी पालन और सरकारी योजनाओं के सहारे महिलाओं ने आत्मनिर्भरता, नेतृत्व और आय बढ़ाने की दिशा में बड़ा बदलाव लाया.
बिहार के सीतामढ़ी जिले के परिहार प्रखंड की हजारों ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी कुछ साल पहले तक लगभग एक जैसी थी. वे खेती करती थीं, बकरी पालन करती थीं और परिवार की जिम्मेदारियां निभाती थीं. लेकिन खेती के लिए बीज, खाद और खेती से जुड़ी अन्य सामग्री खरीदने से लेकर अपनी उपज बेचने तक उन्हें बाजार और बिचौलियों पर निर्भर रहना पड़ता था. मेहनत उनकी होती थी, लेकिन मुनाफा सीमित रहता था.
इन्हीं परिस्थितियों ने एक नए विचार को जन्म दिया. महिलाओं ने सोचा कि यदि खेती के लिए हर साल बाहर से सामान खरीदना ही पड़ता है, तो अपनी कंपनी क्यों न बनाई जाए. इसी सोच के साथ 28 जुलाई 2023 को दियामाटी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (FPC) की स्थापना हुई. संगीता देवी इसकी फाउंडर हैं. आज यह कंपनी 2,100 से अधिक महिला शेयरधारकों को जोड़ चुकी है और करीब 4,000 ग्रामीण महिलाओं तक अपनी पहुंच बना चुकी है. दियामाटी FPC, बिहार सस्टेनेबल लाइवलीहुड डेवलपमेंट (BSLD) प्रोजेक्ट के सहयोग से संचालित पहल है. और यह समग्र शिक्षण एवं विकास संस्थान (SSEVS) से भी जुड़ी हुई है. यह केवल एक किसान उत्पादक कंपनी (FPC) नहीं, बल्कि सामूहिक नेतृत्व और ग्रामीण महिला उद्यमिता का सफल उदाहरण बन गई है.
हाल ही में YourStory से हुई बातचीत में दियामाटी FPC के बारे में बताते हुए SSEVS के सचिव सिद्धार्थ कुमार कहते हैं, “दियामाटी FPC की शुरुआत किसी बड़े कारोबारी सपने से नहीं हुई थी. इसकी नींव गांव की महिलाओं की रोजमर्रा की जरूरतों से पड़ी. हमने देखा कि किसान बीज, खाद और पशुपालन से जुड़ी हर छोटी जरूरत के लिए बाजार और बिचौलियों पर निर्भर हैं. तब लगा कि अगर महिलाएं मिलकर अपनी कंपनी बनाएं और खुद फैसले लें, तो वे सिर्फ अपनी आय ही नहीं बढ़ाएंगी बल्कि पूरे गांव की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बना सकेंगी.”
जब महिलाएं बनीं अपनी कंपनी की मालिक
दियामाटी FPC की शुरुआत दस पंचायतों के स्वयं सहायता समूहों (SHGs) से हुई. प्रत्येक पंचायत से तीन महिलाओं को प्रमोटर बनाया गया और कुल 30 महिलाओं ने कंपनी की नींव रखी. इन्हीं प्रमोटरों ने निदेशक मंडल का चुनाव किया.
शुरुआत आसान नहीं थी. अधिकांश महिलाओं ने पहले कभी कंपनी, शेयर या बिजनेस जैसे शब्द नहीं सुने थे. टीम ने गांव-गांव बैठकों का आयोजन किया और महिलाओं को यह समझाया कि वे किसी सरकारी योजना की लाभार्थी नहीं, बल्कि अपनी कंपनी की मालिक बनने जा रही हैं. उन्हें वित्तीय साक्षरता, बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, रिकॉर्ड प्रबंधन और व्यवसाय संचालन का प्रशिक्षण दिया गया.
प्रशांत आनंद, प्रोग्राम मैनेजर, समग्र शिक्षण एवं विकास संस्थान (SSEVS) बताते हैं, “सबसे बड़ी चुनौती महिलाओं का भरोसा जीतना था. कंपनी और शेयर जैसे विषय उनके लिए बिल्कुल नए थे. हमने जल्दबाजी नहीं की. गांव-गांव बैठकों का आयोजन किया. महिलाओं को समझाया कि यह उनकी अपनी कंपनी है. जब उन्होंने देखा कि हर फैसला पारदर्शी तरीके से लिया जा रहा है और उनकी राय को महत्व मिल रहा है, तब उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा और कंपनी से उनका जुड़ाव भी मजबूत होता गया.”

'दमदार दाना' से बदली बकरी पालन की तस्वीर
दियामाटी FPC ने केवल खेती तक खुद को सीमित नहीं रखा. गांवों में बकरी पालन महिलाओं की आय का महत्वपूर्ण स्रोत था, लेकिन संतुलित पशु आहार की कमी के कारण पशुओं की वृद्धि और उत्पादकता प्रभावित होती थी.
इसी जरूरत को देखते हुए कंपनी ने स्थानीय संसाधनों से तैयार संतुलित पशु आहार 'दमदार दाना' विकसित किया. पायलट स्तर पर जुड़े पशुपालकों के अनुसार इसके नियमित उपयोग से बकरियों की सेहत में सुधार, वजन वृद्धि और प्रजनन क्षमता में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले. साथ ही स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण पशु आहार उपलब्ध होने से किसानों की लागत और समय दोनों की बचत हुई.
सिद्धार्थ कहते हैं, “हमारा उद्देश्य केवल एक उत्पाद बाजार में उतारना नहीं था. हम चाहते थे कि पशुपालकों को वैज्ञानिक और संतुलित पशु आहार गांव के आसपास ही उपलब्ध हो. जब किसानों को अच्छी गुणवत्ता का चारा सही कीमत पर मिलता है तो उनके पशु स्वस्थ रहते हैं. इससे उनकी आय भी बढ़ती है और आत्मविश्वास भी. 'दमदार दाना' उसी सोच का परिणाम है, जिसमें किसान की जरूरत सबसे पहले रखी गई.”
सरकारी योजनाओं और FPO मॉडल से मिला आधार
दियामाटी FPC की प्रगति ऐसे समय में हुई है, जब केंद्र और बिहार सरकार किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) तथा महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को लगातार प्रोत्साहित कर रही हैं.
केंद्र सरकार की 10,000 फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशंस (FPOs) योजना के तहत किसानों को संगठित कर बाजार, तकनीक और वित्त तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है. वहीं बिहार में जीविका (Bihar Rural Livelihoods Promotion Society) के माध्यम से लाखों महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़कर उद्यमिता और वित्तीय सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है.
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के अनुसार देशभर में 10 करोड़ से अधिक महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं, जबकि बिहार देश के सबसे सक्रिय राज्यों में शामिल है. ग्रामीण महिला उद्यमिता को बढ़ाने में राज्य सरकार की जीविका (JEEViKA) पहल को वर्ल्ड बैंक सहित कई संस्थानों ने भी सराहा है.

आज दियामाटी FPC 2,100 से अधिक महिला शेयरधारकों को जोड़ चुकी है और करीब 4,000 ग्रामीण महिलाओं तक अपनी पहुंच बना चुकी है. यह केवल एक किसान उत्पादक कंपनी (FPC) नहीं, बल्कि सामूहिक नेतृत्व और ग्रामीण महिला उद्यमिता का सफल उदाहरण बन गई है.
शेयरधारक बनने से बढ़ा आत्मविश्वास
आज दियामाटी FPC दस ग्राम पंचायतों और 32 गांवों में काम कर रही है. खेती से जुड़ी सामग्री उपलब्ध कराने के साथ-साथ पशुपालन सेवाएं और अन्य ग्रामीण उद्यम भी इससे जुड़े हैं.
सबसे बड़ा बदलाव महिलाओं के आत्मविश्वास में देखने को मिला है. कई महिलाएं पहली बार बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ीं, डिजिटल भुगतान करना सीखा और बिजनेस से जुड़े फैसले लेने लगीं. इससे परिवार की आय में उनकी भागीदारी बढ़ी और गांव स्तर पर नेतृत्व की नई पहचान बनी.
प्रशांत आनंद कहते हैं, “आज जब हम गांवों में जाते हैं तो सबसे बड़ा बदलाव महिलाओं के आत्मविश्वास में दिखाई देता है. जो महिलाएं पहले केवल खेती या मजदूरी तक सीमित थीं, वे अब बैंक खाते संचालित कर रही हैं, व्यवसाय से जुड़े फैसले ले रही हैं और ग्राम सभा में अपनी बात रख रही हैं. यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और नेतृत्व से भी जुड़ा है.”
आगे की राह
दियामाटी FPC अब 'दमदार दाना' को बिहार के अन्य जिलों तक पहुंचाने की तैयारी कर रही है. संगठन पशु सप्लीमेंट, हरा चारा, जैविक उर्वरक, कृषि इनपुट और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में भी विस्तार की योजना बना रहा है. प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) के तहत फीड प्रोसेसिंग यूनिट की स्वीकृति इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम रही है. वहीं, Heifer International के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के दौरे ने भी संगठन को नई पहचान दी.
सिद्धार्थ कहते हैं, “हम चाहते हैं कि यह मॉडल केवल सीतामढ़ी तक सीमित न रहे. दूसरे जिलों और राज्यों की महिलाएं भी स्थानीय संसाधनों के आधार पर ऐसे सामुदायिक उद्यम शुरू करें. हमारी सबसे बड़ी सीख यही है कि विश्वास, पारदर्शिता और सामूहिक नेतृत्व किसी भी सामाजिक उद्यम की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं.”
दियामाटी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड की कहानी यह साबित करती है कि बड़े बदलाव हमेशा बड़े निवेश से नहीं आते. कई बार वे एक छोटे से सवाल से शुरू होते हैं. सीतामढ़ी की महिलाओं ने भी यही सवाल पूछा था कि जब खेती के लिए हर साल सामान खरीदना पड़ता है, तो अपनी कंपनी क्यों न बनाई जाए. आज उसी सवाल का जवाब हजारों महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण, आत्मविश्वास और ग्रामीण उद्यमिता की नई मिसाल के रूप में सामने है.



