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मथुरा की मालविका ने पुराने कबाड़ को आर्ट में बदलकर शुरू किया बिजनेस, आज बड़े-बड़े सेलिब्रिटी हैं उनके कस्‍टमर

मथुरा के एक बेहद संकीर्ण और सामंती घर में पैदा हुई इस लड़की की कहानी छोटे शहरों की हर उस लड़की को पढ़नी चाहिए, जिसकी आंखों में सपने और जीवन में कुछ बनने का अरमान है.

मथुरा की मालविका ने पुराने कबाड़ को आर्ट में बदलकर शुरू किया बिजनेस, आज बड़े-बड़े सेलिब्रिटी हैं उनके कस्‍टमर

Friday September 09, 2022 , 10 min Read

इंस्‍टाग्राम पर एक पेज है The Quirky Naari. स्‍क्रॉल करते हुए आंखें उस पेज पर बिलकुल ठिठक जाती हैं, जैसे किसी ने फेविकॉल से चिपका दिया हो. एक-एक तस्‍वीर पर आप देर तक रुके रहते हैं. इतने चमकीले, तीखे, चटख रंग कि आंखें चमक उठें. एक नीले रंग के जूते पर लिखा है- “आय टेक नैप्‍स, नॉट सेल्‍फीज.” एक पर्स पर फ्रीडा काल्‍हो की तस्‍वीर बनी है और लिखा है- “In a world full of Kardishians, be Frida.” (कार्दिशियंस से भरी दुनिया में फ्रीडा बनो.)

जो मोहित करने वाली खुशी उस तस्‍वीरों को देखते हुए होती है, वह अचानक सुखद आश्‍चर्य में बदल जाती है, जब पता चलता है कि एक लड़की ने ये सारे जूते, पर्स और जैकेट अपने हाथों से पेंट किए हैं. ये चित्र, ये कहानियां, ये तस्‍वीरें, किसी मशीन का कमाल नहीं, बल्कि 32 साल की एक लड़की की उंगलियों का जादू है.

The Quirky Naari की फाउंडर मालविका सक्‍सेना ने अपने हाथों की कला को एक बिजनेस आइडिया में बदल दिया. शार्क टैं‍क में अपना आइडिया पिच करने के बाद उन्‍हें 35 लाख रुपए की फंडिंग भी मिली. मार्केटिंग में अब तक एक रुपए भी खर्च नहीं किए, लेकिन अब दूर-दूर तक लोग मालविका का नाम जानने लगे हैं. उनके डिजाइन किए जूते रवीना टंडन, सनी लिओन, अदा शर्मा और रुबीना दिलक तक पहन चुकी हैं.

आज मालविका और द क्‍वर्की नारी एक जाना-माना नाम है, लेकिन उत्‍तर प्रदेश के एक छोटे से शहर की एक गुमनाम सी लड़की के यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा है. मालविका को खुद को पाने के लिए एक लंबी यात्रा तय करनी पड़ी और अब उस यात्रा से गुजर चुकने के बाद वो बिना संकोच या डर के खुलकर इस बारे में बात भी करती हैं.

लड़की पैदा ही इसलिए हुई कि एक दिन उसकी शादी करनी है

12 अक्‍तूबर, 1990 को मथुरा के एक समृद्ध कायस्‍थ परिवार में मालविका का जन्‍म हुआ. पिता व्‍यवसाय से बिजनेसमैन और संस्‍कारों से बेहद सामंती पुरुष थे. उनके विचारों के मुताबिक लड़कियों को स्‍कूल भेजना और पढ़ाना जरूरी था, लेकिन इतना भी नहीं कि अच्‍छे कॉलेज के चक्‍कर में लड़की को मथुरा से बाहर पढ़ने भेज दिया जाए. 

her story malvica saxena the quirky naari start-up woman entrepreneur

घर में पूर्वाग्रह बहुत सारे थे. बचपन से आर्ट में रुचि थी कि लेकिन घरवालों का मानना था कि इंटेलीजेंट बच्‍चे साइंस और कॉमर्स पढ़ते हैं. ये कला-वला तो पढ़ाई में फिसड्डी लोगों की चीज है. फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करना चाहा तो घरवालों को फिर लगा कि ये संस्‍कारी काम नहीं. दूसरे मथुरा में फैशन डिजाइनिंग का कोई कॉलेज भी नहीं था. उन्‍होंने कहा, बिजनेस मैनेजमेंट पढ़ो. जब बिजनेस मैनेजमेंट पढ़ना चाहा तो भी मथुरा से बाहर जाकर पढ़ने की इजाजत नहीं मिली.

मालविका हंसकर कहती हैं, “मैंने एमबीए भी मथुरा से ही किया है क्‍योंकि एक दिन के लिए भी घर की नजरों से दूर जाने की इजाजत नहीं थी." एमबीए पूरा होने के बाद जब कैंपस प्‍लेसमेंट की बारी आई तो उसमें भी बैठने की अनुमति नहीं मिली क्‍योंकि वहां आने वाली किसी कंपनी का ऑफिस मथुरा में नहीं था. नौकरी करने के लिए दिल्‍ली-मुंबई-गुड़गांव जाना पड़ता. मालविका कहती हैं, “एमबीए के दौरान एक बार कॉलेज का टूर शिमला जा रहा था. मेरे दिल में पिता का इतना खौफ था कि मेरी उनसे पूछने की हिम्‍मत ही नहीं हुई. मुझे पता था कि इजाजत नहीं मिलेगी.”

साथ के सब लोग जीवन में आगे बढ़ गए और मैं मथुरा में ही रह गई

मालविका उन दिनों को याद करती हैं, जब वो गहरे अवसाद और अकेलेपन से जूझ रही थीं. घर में मेरा कोई दोस्‍त नहीं था और बाहर के सारे दोस्‍त दूर होते जा रहे थे. एमबीए में साथ पढ़े सारे दोस्‍त दिल्‍ली-मुंबई में अच्‍छे पैकेज पर नौकरियां कर रहे थे, नए दोस्‍त बना रहे थे, दुनिया घूम रहे थे, प्रेम कर रहे थे, अपनी जिंदगी जी रहे थे. और मैं वहीं मथुरा में पड़ी थी.

 

मैं सोशल मीडिया पर उनकी रंग-बिरंगी जिंदगी के चित्र देखती और अपनी पीछे छूट गई जिंदगी और चुभने लगती. जितनी जिद पिता ने ठान रखी थी कि मुझे मथुरा से बाहर नहीं भेजेंगे, उतनी ही जिद अब मैंने भी ठान ली थी कि उनकी मर्जी से शादी तो नहीं करूंगी. उन्‍होंने मुझसे बातचीत बंद कर दी. मैं पूरे दिन अकेले अपने कमरे में बंद एक दिन यहां ये उड़ जाने के सपने देखती.     

मालविका कहती हैं कि मुझे जितनी बंदिशों और नियंत्रण में पाला गया था, मेरे भीतर आजाद होने की इच्‍छा भी उतनी ही तेज हो गई थी. लेकिन मैं फितरत से विद्रोही नहीं थी. मुझे बहुत डर लगता था. आज पछतावा होता है कि स्‍कूल पूरा होने के बाद ही मैं पिता से लड़ी क्‍यों नहीं. अपने लिए स्‍टैंड क्‍यों नहीं लिया. जब मुझे फैशन डिजाइनिंग पढ़ने का मन था तो सिर्फ उनकी जिद पूरी करने के लिए बीएससी क्‍यों की, जिसमें मेरा बिलकुल मन नहीं लगता था. मालविका कहती हैं, “अगर मैं तब अपने लिए लड़ी होती तो शायद आज मेरा जीवन और बेहतर होता.”    

अपने लिए चुप रही पर बहन के लिए लड़ी

मालविका जो लड़ाई अपने लिए नहीं लड़ पाई थी, वो छोटी बहन अंबिका के लिए लड़ी. जब उसके दिल्‍ली जाकर रहने और पढ़ने की बारी आई तो मालविका मां-पिता के सामने बहन की ढाल बनकर खड़ी हो गई. बहन को आखिरकार दिल्‍ली जाकर पढ़ने और फिर नौकरी करने की इजाजत मिल गई.

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मालविका कहती हैं, “अब मुझे लगता है कि पैरेंट्स के सम्‍मान और इमोशनल ब्‍लैकमेल के जाल में नहीं फंसना चाहिए. लड़ना चाहिए. विद्रोह कर देना चाहिए. वो सिर्फ और सिर्फ अपने अहंकार में लड़कियों बांधकर रखना चाहते हैं. मैंने अपनी जिंदगी के कितने साल डिप्रेशन में निकाल दिए. मुझे भी दिल्‍ली जाकर नौकरी करनी थी, ट्रेन और बस के धक्‍के खाने थे, अपना घर बनाना था, जिंदगी को एक्‍सप्‍लोर करना था. लेकिन लंबे समय तक मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर पाई.”

लेकिन कहते हैं न कि सब्र और सहनशक्ति का बांध कितना भी ऊंचा क्‍यों न हो, एक दिन टूट ही जाता है. मालविका का बांध भी एक दिन टूट ही गया. चुपके से घरवालों को बिना बताए दिल्‍ली में एक जॉब के लिए अप्‍लाय किया. नौकरी मिल भी गई. दिल्‍ली जाकर एक नई जिंदगी शुरू की. पिता अब पहले से ज्‍यादा दुश्‍मन बन चुके थे. उनसे संवाद पूरी तरह खत्‍म हो गया.

और एक दिन जूते की आलमारी साफ करते हुए जो हुआ

मालविका एक दिन अपनी पुरानी वॉर्डरोब की सफाई कर रही थी. आलमारी में कुछ पुराने जूते पड़े थे. वो उन्‍हें फेंकने की सोच रही थी कि बहन ने कहा, फेंक क्‍यों रही हो. तुम तो इतनी अच्‍छी पेंटिंग करती हो. इन्‍हें पेंट कर डालो. घर और जिंदगी से बेजार मालविका को इतने साल अगर किसी चीज ने बचाए रखा था तो वो रंग और ब्रश ही थे. अपने कमरे में अकेले बंद वो घंटों पेंटिंग बनाती रहती.

जिन रंगों में मालविका ने दुख के दिनों में पनाह पाई, सोचा नहीं था कि वो रंग और हुनर ही एक दिन दुनिया में उनकी पहचान बन जाएंगे. वो अपना खुद का बिजनेस खड़ा करेगी और दुनिया में नाम और पैसा कमाएगी. मालविका ने उन पुराने जूतों को साफ किया, रंग और ब्रश निकाला और देखते ही देखते वो बदरंग पुराने जूते पीले-गुलाबी सुंदर जूतों में तब्‍दील हो गए. हर कोई उन्‍हें हसरत से देखते हुए पूछता, “अरे, बड़े सुंदर जूते हैं. कहां से खरीदे?”    

‘द क्‍वर्की नारी’ की शुरुआत

जब मालविका मथुरा में एमबीए कर रही थीं तो कॉलेज में उन्‍होंने एक बिजनेस प्‍लान कॉम्‍पटीशन भी जीता था. वो बिजनेस प्‍लान भी दरअसल स्‍क्रैप से सस्‍टेनेबल फैशन एसेसरीज बनाने का ही आइडिया था. प्रोफेसरों ने भविष्‍यवाणी की थी कि एक दिन तुम जरूर आंत्रप्रेन्‍योर बनोगी. मालविका ने तब उस बात को गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन सालों बाद वो भविष्‍यवाणी अब सच होने जा रही थी.

मालविका ने अपनी बहन के बार-बार उकसाने के बाद इंस्‍टाग्राम पर एक पेज बनाया और नाम रखा- ‘द क्‍वर्की नारी’ (The Quirky Naari). वहां उन्‍होंने अपने हैंडपेंटड जूतों, कपड़ों और पर्स की तस्‍वीरें पोस्‍ट करनी शुरू कीं. धीरे-धीरे बात फैली और मालविका के पास ऑर्डर आने लगे. उनके पास इंवेस्‍ट करने के लिए ज्‍यादा पैसे नहीं थे. पिता से आर्थिक मदद मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता था.

सो उन्‍होंने एक आइडिया निकाला. हैंडपेंटड जूतों का ऑर्डर देने वालों से आधा पैसा एडवांस में और आधा प्रोडक्‍ट डिलिवर होने के बाद देने की बात कही. लोग राजी भी हो गए. इस तरह उन्‍होंने 20-25 जूतों के ऑर्डर पूरे किए. धीरे-धीरे डिमांड बढ़ने लगी.

प्रोडक्‍ट इतना यूनीक और आकर्षक था कि जो भी देखता, थोड़ी देर के लिए ठिठक जाता. लोगों को प्रोडक्‍ट पसंद आया. उन्‍होंने बहुत सुंदर पॉजिटिव फीडबैक दिए. ब्रांड बनने लगा और पैसे आने लगे.

her story malvica saxena the quirky naari start-up woman entrepreneur

मालविका ने नौकरी छोड़कर अब फुल टाइम यही काम करना शुरू कर दिया. पिता अब भी नाराज तो थे, लेकिन अब ज्‍यादा हस्‍तक्षेप नहीं करते थे. वो मथुरा लौट आईं और वहीं अपने कमरे को एक छोटे से स्‍टूडियो में तब्‍दील कर लिया. दिल्‍ली से थोक में जूते खरीदकर मथुरा आते और यहां उनकी हैंडपेंटिंग का काम होता. मालविका सारे काम खुद ही करती थीं. ऑर्डर रिसीव करने से लेकर उसे पैक करके कूरियर करने तक.

जब सेलिब्रिटीज ने मालविका के जूते पहने

ब्रांड और मालविका को मिली पहचान से धीरे-धीरे उनका आत्‍मविश्‍वास लौट रहा था. अब उन्‍होंने सेलिब्रिटीज से संपर्क करना शुरू किया. काफी कोशिशों के बाद उन्‍हें दीपिका कक्‍कर से पेंटेड स्‍नीकर्स का एक ऑर्डर मिला, जो उन्‍होंने बिग बॉस में पहना. एक बार बिग बॉस में आने के बाद प्रोडक्‍ट की डिमांड और बढ़ गई.

शार्क टैंक में जीतने और 25 लाख की फंडिंग मिलने के बाद ‘द क्‍वर्की नारी’ को और पहचान मिली. रातोंरात उनके इंस्‍टाग्राम पेज पर आने वाले ऑर्डर्स की संख्‍या 10 गुना बढ़ गई. द क्‍वर्की नारी एक छोटा सा स्‍टार्टअप है. मालविका ने अब तक मार्केटिंग पर एक भी पैसे खर्च नहीं किए. लोगों ने इस ब्रांड को पसंद किया, खरीदा और सेलिब्रिटीज ने कोलैबोरेट किया है क्‍योंकि यह इतना खूबसूरत और यूनीक है. रवीना टंडन, सनी लिओन, अदा शर्मा, रणविजय सिंघा, रुबीना दिलक, असिम रियाज, पारस छाबड़ा, दनिता हसनदानी जैसे फिल्‍म और टीवी के जाने-माने सेलिब्रिटी द क्‍वर्की नारी के प्रोडक्‍ट इस्‍तेमाल कर चुके हैं.   

लड़कियां जो सिर्फ ग्‍लैमर की दुकान नहीं हैं

फैशन, स्‍टाइल और खूबसूरत दिखने की चाह बहुत सहज है, लेकिन वो फैशन ऐसा होना चाहिए, जो आपकी सोच और व्‍यक्तित्‍व को भी दर्शाता हो. मालविका कहती हैं, "एक बुद्धिमान और समझदार लड़की, जिसके जीवन का मकसद सिर्फ गोरा, छरहरा और आकर्षक होना भर नहीं है, जो दिन भर अपनी 32 सेल्‍फी खींचकर सोशल मीडिया पर पोस्‍ट नहीं करती. उस लड़की के व्‍यक्तित्‍व से मैच करने वाला फैशन कैसा होग, जो सफल है, बुद्धिमान है, विचारवान है."

मालविका के डिजाइन किए प्रोडक्‍ट ऐसे ही हैं, जो सुंदर होने के साथ-साथ कंफर्टेबल भी हैं और एक आजाद व्‍यक्तित्‍व और सोच को दिखाते हैं.

मालविका अब जब पीछे मुड़कर देखती हैं तो लगता है कि कितनी दूर निकल आई हैं. जो सफर उन्‍होंने तय किया, उसे डेढ़-दो हजार शब्‍दों में बयान करना मुश्किल है. मालविका कहती हैं, “ये कहानी बताई जानी इसलिए जरूरी है क्‍योंकि मैं जानती हूं कि ये सिर्फ मेरी कहानी नहीं है. छोटे शहरों के सामंती घरों में पैदा हुई देश की हजारों-लाखों लड़कियों की कहानी है. हमें अपनी कहानी बांटनी चाहिए ताकि हम सबका अकेलापन एक वृहत्‍तर साझेदारी की कहानी में बदल सके.”