जब हिन्दी ने जीवन को दिया नया मोड़, नए रास्तों पर नई यात्राओं ने बाँहें फैलाकर स्वागत किया

By Raghuveer Poonia
September 14, 2022, Updated on : Wed Sep 14 2022 09:19:09 GMT+0000
जब हिन्दी ने जीवन को दिया नया मोड़, नए रास्तों पर नई यात्राओं ने बाँहें फैलाकर स्वागत किया
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अंग्रेजी में हाथ तंग था. जैसे तैसे करके काम चलाता. अंग्रेज़ी में, लिखित कम्युनिकेशन करके काम चल रहा था. साल 2016 का सितंबर महीना था. एक दिन हिम्मत की. छोटी सी पोस्ट हिन्दी में लिखी. दोस्तों को व्हाट्सएप पर भेजी. प्रशंसा मिली. तो हर हफ़्ते पोस्ट लिखना शुरू कर दिया.


ज्यादातर पोस्ट इनकम टैक्स अवेयरनेस, इनकम टैक्स पर हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर लिखता. इनकम टैक्स की शब्दावली का शुद्ध हिन्दी में ट्रांसलेशन करता. शुद्धता का ध्यान ज़रूर रखता. साथ ही साथ हिंदी में लिखते एक तरह से शर्म भी आती थी. लेकिन दोस्त तारीफ़ करते थे. इससे थोड़ा हौसला बढ़ गया.


टैक्सेशन की टेक्निकल टर्म्स को शुद्ध हिंदी में लिखता, लेकिन मुझे कुछ रूखापन नजर आता. मेरे साहित्यकार मित्र रामकुमार सिंह से पूछता, की अमुक अंग्रेजी के 'शब्द' को बोलचाल की हिन्दी में क्या कहते हैं? तो उन्होंने समझाया, किसी भी दूसरी भाषा के जो शब्द बोलचाल में काम आते हैं, उनको देवनागरी लिपि में लिख दिया करो, चाहे वे शब्द अंग्रेज़ी के हों, उर्दू के हों या लैटिन के ही क्यों ना हों.


बस कोशिश करता रहा. और लगातार लिखने का ये सिलसिला जारी रहा. फिर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का ब्रॉडकास्ट बना लिया. दूसरे ग्रुप्स में भी, पोस्ट भेजने लगा. ज्यों-ज्यों अनजान सीएज का रेस्पांस मिलने लगा, और ज्यादा लिखने की हिम्मत आती गई. ब्रॉड कास्ट और ग्रुप्स की संख्या बढ़ती गई.


एक बात जो शुरू से ही सोच ली थी कि हिन्दी में लिखना किसी मूल्य पर नहीं छोड़ूँगा. इसीलिए हिन्दी में लिखता जरूर था, लेकिन हीन भावना रहती थी. 26 जनवरी को सीनियर्स में से किसी ने गणतंत्र दिवस फंक्शन पर तारीफ़ की, तो हौसला और बढ़ गया. हीन भावना दूर होती जा रही थी. होते होते आख़िरकार ये हीनभावना भी दूर ही हो गई. हिंदी के माहात्म्य और आभा के सामने हीन भावना का अंधकार कितनी देर टिक सकता था. नई सुबह होनी थी, हो ही गई. अब हिंदी को विश्वास और प्रेम के नए उजाले में देखने लगा.


फिर वो दौर आया जब दुनिया ने ख़ुद को नए सिरे से देखा. कोविड की महामारी के उस दौर ने सबको कुछ ना कुछ सिखाया. कोविड के दौरान लिखने की फ्रीक्वेंसी और ज्यादा हो गई. आज हिंदी के डायरेक्ट टैक्स बुलेटिन पूरे देश में करीब 15,000 चार्टर्ड एकाउंटेंट्स व टैक्स प्रोफेशनल्स तक व्हाट्सअप ग्रुप में, व फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्ड इन पर एक्स्ट्रा, पहुंच रहे हैं.


इस हिंदी दिवस पर मैं मेरी मातृभाषा हिंदी को प्रणाम करता हूँ, नमन करता हूँ. जिसने मुझे माँ की तरह सम्मान दिलाया व मेरे विचारों को देश के हर कोने तक पहुंचाया. मैं हिंदी के साथ-साथ सभी की मातृभाषा को भी नमन करता हूँ. सम्मान करता हूँ. मेरी टैक्सेशन पर हिंदी में सोशल मीडिया पर लिखे बुलेटीन्स की वजह से मुझे जगह-जगह, मेरे सब्जेक्ट पर एक्सपर्ट स्पीकर की हैसियत से बुलाया जाता है. चंडीगढ़, गुरुग्राम, बरेली, मुम्बई जैसी जगह प्रोफेशनल्स की सेमिनार में बोलता हूं. हिंदी के सभी पाठकों को मेरा संदेश है, कन्टेंट ही महत्वपूर्ण है.


हमारे संविधान के आर्टिकल 343 में हिंदी बतौर राजभाषा दिखावे के लिए तो दर्ज है, लेकिन वास्तव में ऐसा महसूस नहीं होता. आशा करता हूँ, एक दिन ऐसा भी होगा.


(लेखक रघुवीर पूनिया पेशेवर चार्टेड अकाउंटेंट हैं. आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं. YourStory का उनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है.)

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