‘मेहनत’ और ‘लगन’ के नाम पर 12 घंटे काम करवाने वाली कंपनियों के बुरे दिन शुरू?

By Sowmya Ramasubramanian
October 03, 2022, Updated on : Tue Oct 11 2022 16:45:36 GMT+0000
‘मेहनत’ और ‘लगन’ के नाम पर 12 घंटे काम करवाने वाली कंपनियों के बुरे दिन शुरू?
‘बर्नआउट’ और ‘टॉक्सिक’ कल्चर को अब और बर्दाश्त नहीं कर रहे इंप्लॉई.
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एक ई-कॉमर्स स्टार्टअप में काम करने वाले 35 साल के पॉल (बदला हुआ नाम) एक ही महीने में तीसरी बार बीमार पड़े. ये बात है बीते साल की. पॉल को तेज़ बुखार, कंपकंपी और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत कई दिनों तक रही. ऑफिस की बढ़ती जिम्मेदारियों के पहाड़ ने उनके निजी जीवन का हवा-पानी रोक दिया था. 


कुछ दिनों बाद पॉल ने इस्तीफ़ा दे दिया. अपने 1000 शब्दों के इस्तीफ़े में उन्होंने लिखा कि किस तरह लगातार 7 साल इस स्टार्टअप में काम करते हुए अब वो 'बर्न आउट' हो गए हैं. उनके मुताबिक, फाउंडर्स ऐसे टारगेट रखते हैं जिन्हें पा लेना भले ही नामुमकिन न हो, मगर तर्कसंगत कतई नहीं होता. काम के घंटे भी नॉर्मल वर्किंग आवर्स से ज्यादा ही होते हैं. पॉल योरस्टोरी से कहते हैं, "मैंने इस्तीफ़े में सच इसलिए भी कहा क्योंकि ये बात फाउंडर्स को पता होनी चाहिए. ये मुश्किल उन्हीं की खड़ी की हुई है."  


ऐसे अनुभव से गुजरने वाले पॉल इकलौते नहीं हैं. ये कोई छुपी हुई बात नहीं है कि स्टार्टअप्स में काम करने वाले तमाम भारतीय हाई-प्रेशर में माहौल में काम कर रहे होते हैं. आपको तय समय से कहीं अधिक दफ्तर में रुकना पड़ेगा, ये एक अनकहा नियम है. हाल में बॉम्बे शेविंग कंपनी के सीईओ शांतनु देशपांडे ने लिंक्डइन पर एक पोस्ट लिखा था, जिसमें उन्होंने युवाओं से दिन में 18 घंटे काम करने की बात कही थी. पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा था. 

युवा कंपनियों में काम करने वाले कई युवा इंप्लॉई अब अत्यधिक काम करने वाले इस टॉक्सिक कल्चर के विरुद्ध खड़े होने लगे हैं. और टॉप मैनेजमेंट से सवाल करने लगे हैं. इन युवाओं का फाउंडर्स से सीधे सवाल करना और सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा करना विद्रोह के नए कल्चर का प्रमाण है.  


ये विद्रोह अपने आप में इस बात का प्रमाण भी है कि युवा स्टार्ट की दुनिया में फैले 'हसल कल्चर' (hustle culture), यानी तमाम भभ्भड़ और उधम के बीच काम करने के इस कल्चर को 'न' कह रहे हैं. दुखद ये है कि इस हसल कल्चर को न सिर्फ नॉर्मल माना जाता आया है बल्कि उसे महान होने की परिभाषा से भी जोड़ा जाता है. और जो इंप्लॉई इसमें शरीक नहीं होता, उसे कमतर आंका जाता है. फाउंडर्स, जो अबतक केवल इन्वेस्टर्स के प्रति जवाबदेही रखते थे, अब इंप्लॉईज के सवालों का भी सामना कर रहे हैं. साथ ही, स्टार्टअप्स को डर है कि इस कल्चर के चलते वो अच्छे टैलेंट को खो देंगे. सवाल अब ये है कि क्या इंडस्ट्री में एक बड़ा बदलाव आने वाला है?


सेहत के लिए जद्दोजहद 


हसल कल्चर भारत की देन नहीं है. दुनियाभर में युवा कंपनियों में काम रहे इंप्लॉईज से अपेक्षित है कि वे लंबे घंटों तक काम करें, एक मीटिंग से दूसरी में बिना कोई ब्रेक लिए पहुंच जाया करें. आलम ये है कि अपने हक़ की छुट्टियां लेने को आलस से जोड़कर देखा जाता है. 


उदाहरण के लिए चीन को ले लीजिए. यहां की टेक इंडस्ट्री '996 वर्क कल्चर रूल' से चलती है. 996 यानी सुबह 9 से रात के 9 बजे तक, हफ्ते में 6 दिन काम. कुल मिलाकर, फाउंडर जैक मा और रिचर्ड लिऊ जैसे लोग इस कल्चर के गुणगान करते हैं. मगर इस कल्चर को भी समय के साथ विरोध झेलना पड़ा. खासकर तब, जब शॉर्ट वीडियो बनाने वाली एक कंपनी का एक युवा इंप्लॉई एक हफ्ते की सरकारी छुट्टी के दौरान भी लगातार काम करने के बाद ब्रेन हैम्रेज से मारा गया.


यही हाल जापान का भी है, यहां तय घंटों से अधिक काम करने को महानता और मेहनत से जोड़ा जाता है. बल्कि जापान में तो 'अत्यधिक काम करने से मौत' एक कॉन्सेप्ट है जिसके लिए शब्द है 'कारोशी' (karoshi).


डेलॉइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंडिया में इंप्लॉईज के खराब मानसिक स्वास्थ्य के चलते कंपनियों में अचानक छुट्टी लेने, कम प्रोडक्टिविटी और अत्यधिक थकान की समस्या देखी जाती है. जिससे खुद कम्पनियों को प्रति साल औसतन 1400 करोड़ डॉलर का नुकसान होता है. 


"ये अपेक्षाओं की कभी न ख़त्म होने वाली साइकल है", बेंगलुरु बेस्ड साइकॉलजिस्ट इशिता दत्ता कहती हैं. "इंप्लॉईज इतना ज्यादा थक जाते हैं कि दिन के बेसिक काम करने में भी संघर्ष महसूस करते हैं." इशिता के मुताबिक बीते एक साल में 'बर्नआउट' के चलते उनके पास आने वाले क्लाइंट्स दोगुने हो गए हैं. 


'बर्नआउट' का नतीजा युवा इंप्लॉईज की बिगड़ती सेहत में दिखता है. युवाओं में बढ़ते हार्ट अटैक और कार्डिएक अरेस्ट इस बात का प्रमाण हैं. इंडिया की आर्थिक राजधानी मुंबई मात्र में हार्ट अटैक से होने वाली मौतों में साल 2021 के पहले 6 महीनों में 6 गुना इजाफा देखा गया. मुख्य वजह थी स्ट्रेसफुल लाइफस्टाइल.


बदलाव 


"पहला कदम है अड़ जाना", नाम न छापने की शर्त पर एक स्टार्टअप इंप्लॉई कहते हैं. इनके केस में कुछ ऐसा हुआ कि कंपनी के सीईओ ने उन्हें उनकी बीमार मां से मिलने जाने के लिए 3 दिन की भी छुट्टी नहीं दी. उनके फाउंडर के मुताबिक छुट्टी लेने का मतलब गैरज़िम्मेदार रवैया है. हालांकि कई ईमेल्स के आदान-प्रदान के बाद अंततः उन्हें छुट्टी मिल पाई थी.


कुछ कंपनियों के इंप्लॉई टाउन हॉल मीटिंग्स के ज़रिए भी अपनी बात कह पाने में सफल हुए हैं. इन मीटिंग्स में सबसे जूनियर इंप्लॉई को भी मालिकों तक अपनी बात पहुंचाने का मौका मिलता है. 


"इंप्लॉईज ने सभी फ़िल्टर त्याग दिए हैं और अब सीधे सवाल पूछने लगे हैं कि आखिर उन्हें वीकेंड्स पर क्यों काम करना पड़ रहा है", हेल्थकेयर फर्म इनोवैक्सर के चीफ ऑफ़ स्टाफ़ सत्यजीत मेनन कहते हैं. उनके मुताबिक कम इंप्लॉईज वाली कंपनियों में काम करने वाले अब अपने कॉन्ट्रैक्ट को लेकर बेहद सजग हैं और ओवरटाइम और पेड लीव्स को लेकर नियमों में पारदर्शिता चाहते हैं. मेनन कहते हैं, 


"स्केल करती हुए कंपनी में सभी जीतना ही चाहते हैं. कई लोग हैं जो एक साथ कई कामों का भार संभालते हैं. ऐसी परिस्थिति में स्ट्रेस का बढ़ना और वर्क प्रेशर का बोझ पूरे संस्थान में महसूस होना लाज़मी है.”


stress relax

युवा कर्मचारियों ने अपना चुनाव कर लिया है.

हाल ही में प्रिस्टिन केयर के सीईओ हरसिमरबीर सिंह ने लिंक्ड पर एक पोस्ट लगाया और बवाल मचने के बाद डिलीट कर लिया. उस पोस्ट में उन्होंने बताया था कि इंप्लॉई की कर्मठता जांचने के लिए वो इंटरव्यू में कुछ तरीके अपनाते हैं. जैसे रात को इंटरव्यू रखना या आउटस्टेशन कैंडिडेट को अगली सुबह इंटरव्यू के लिए अचानक बुला लेना. सोशल मीडिया पर इस तरीके को टॉक्सिक बताया गया और ट्विटर पर लोगों ने अपने अनुभव भी साझा किए. 


"काम के घंटे बढ़ा देने से आपको गति तो मिल जाएगी, मगर दिशा नहीं मिलेगी. हमने चीन के 996 कल्चर से यही सीखा है. साथ ही इंप्लॉई बर्नआउट कंपनी के लिए घाटा ही लेकर आता है", ट्विटर पर एक यूजर लिखते हैं. 


समाधान 


लीनपिच (Leanpitch) कंपनी में पीपल सक्सेस ऑफिसर विवेक जयरमन कहते हैं, "आजकल फाउंडर्स को ये पता है कि इंप्लॉई टॉक्सिक कल्चर में काम नहीं करेंगे. वैसे तो ये कहना कि 'हसल कल्चर' धीरे धीरे ख़त्म हो जाएगा, सही नहीं होगा. लेकिन इतना ज़रूर है फाउंडर्स अब इंप्लॉई-फ्रेंडली माहौल बनाने की कोशिश करने लगे हैं. फिर भी बदलाव अभी बहुत दूर है."


इशिता का भी मानना है कि दफ्तरों में मानवीयता को बढ़ाना बहुत ज़रूरी है. उनके मुताबिक फाउंडर्स को ये सुनिश्चित करने के लिए एक HR प्रोफेशनल ऐसा रखना ही होगा जो केवल इंप्लॉईज के ऐसे मसले समझे और उनपर काम करे. 


"हम अभी-अभी दफ्तरों की ओर लौटे हैं. पिछले दो साल में हमारे इंप्लॉईज दूर रहे, उनसे मिलकर उन्हें अपने सिद्धांतों को समझाने की ज़रुरत है. ये समझाने की ज़रुरत है कि हमारी सफलता की नींव क्या है", 1500 इंप्लॉईज संभालने वाले सत्यजीत कहते हैं.


'हसल कल्चर' चला जाएगा, ये कह पाना तो मुश्किल है. लेकिन इतना तो सच है कि इंप्लॉईज अब टॉक्सिक माहौल में और काम नहीं करेंगे. 


Edited by Prateeksha Pandey

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