मैं, मेरा बचपन और 15 अगस्त पर फिल्मों का इंतजार...

By Ritika Singh
August 15, 2022, Updated on : Mon Aug 15 2022 08:46:28 GMT+0000
मैं, मेरा बचपन और 15 अगस्त पर फिल्मों का इंतजार...
आज सुबह जब उठते ही ‘हर करम अपना करेंगे...’ गाना कानों में पड़ा तो कर्मा फिल्म याद आ गई. साथ ही याद आए बचपन के वो दिन, जब 15 अगस्त को टीवी पर देशभक्ति वाली कौन सी फिल्म आएगी, इसका इंतजार रहता था....
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‘ये देश है वीर जवानों का...’, ‘ए मेरे वतन के लोगों...’ कुछ ऐसी ही होती है न 15 अगस्त की सुबह, देशभक्ति से भरे गानों के साथ. कभी ये गाने पास के स्कूल में चल रहे होते हैं तो कभी कोई अपने घर में फुल वॉल्यूम पर इन्हें प्ले कर रहा होता है, या फिर सोसायटी के ग्राउंड में स्वतंत्रता दिवस सेलिब्रेशन के हिस्से होते हैं ये गाने या फिर कोई ऑटो इन्हें बजाता हुआ आपके घर के पास से गुजरता है.


किसी फिल्म के गाने आपके कानों में पड़ें और आप फिल्म याद न करें, ऐसा तो हो नहीं सकता. आज सुबह भी जब उठते ही ‘हर करम अपना करेंगे...’ गाना कानों में पड़ा तो कर्मा फिल्म याद आ गई. साथ ही याद आए बचपन के वो दिन, जब 15 अगस्त को टीवी पर देशभक्ति वाली कौन सी फिल्म आएगी, इसका इंतजार रहता था. बचपन में घर में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी हुआ करती थी, जिसमें केबल कनेक्शन नहीं था. एंटीना था, जिसकी मदद से केवल दूरदर्शन आता था. साल 2005 में घर में कलर टीवी विद केबल कनेक्शन की एंट्री हुई.

15 अगस्त रविवार को तो दो फिल्में आना पक्का

ब्लैक एंड व्हाइट टीवी से शुरू करते हैं. 90 के दशक वाले बचपन की बात करें तो जहां तक याद है, 15 अगस्त पर दूरदर्शन पर दिन में आमतौर पर दो फिल्में दिखाई जाती थीं. अगर 15 अगस्त रविवार को पड़ जाता था तो फिर दो फिल्में आना पक्का था. इंतजार और सस्पेंस इस बात का रहता था कि देशभक्ति वाली कौन सी फिल्म आएगी. स्कूल से लौटने के बाद बस टीवी के शुरू होने का इंतजार रहता था और मन ही मन मनाते थे कि लाइट न जाए. अगर 15 अगस्त को बारिश हो रही होती थी तो लाइट न जाने के लिए भगवान से प्रार्थनाएं और तेज हो जाती थीं. अगर किसी 15 अगस्त पर किसी वजह से, किसी अन्य कार्यक्रम के चलते दूरदर्शन पर फिल्म न आती तो ऐसा लगता कि मानो किसी ने वादा तोड़ दिया हो. हर साल दिखाते हो, तो इस साल क्यों नहीं भला... दगाबाज, धोखेबाज और न जाने क्या-क्या करार दे दिए जाते थे.

हमें किन फिल्मों की रहती थी तमन्ना

जिन फिल्मों का हमें इंतजार रहता था, वह थीं क्रांति, तिरंगा और कर्मा. मन ही मन सोचते थे कि इन्हीं तीन फिल्मों में से कोई एक आ जाए तो 15 अगस्त पूरा हो जाए. तिरंगा, राजकुमार के स्वैग प्लस तेज दिमाग और नाना पाटेकर के गर्म मिजाज की जुगलबंदी की वजह से अच्छी लगती है. कर्मा और क्रांति के तो क्या ही कहने. मल्टीस्टारर होने के साथ-साथ म्यूजिक, गीत, एक्शन, इमोशन, ड्रामा, देश और देशभक्ति का जुनून...सब कुछ तो है. अब तो गिनती भी याद नहीं है कि इन फिल्मों को कितनी बार देख चुके हैं.


ये तो वे फिल्में हैं, जिनके 15 अगस्त पर आने की राह हम तकते थे. लेकिन कुछ और फिल्में भी हैं, जो अगर आ जाती थीं तो निराशा नहीं होती थी कि ये क्यों आ गईं. जैसे पूरब और पश्चिम, दो आंखें 12 हाथ, उपकार, क्रांतिवीर, सरफरोश, रोजा.

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मिस्टर इंडिया मतलब बल्ले-बल्ले

कभी-कभी मिस्टर इंडिया भी 15 अगस्त पर टीवी पर आ जाया करती थी और मिस्टर इंडिया का आना मतलब अलग लेवल के उत्साह का संचार. एक ओर अनिल कपूर प्लस बच्चों के साथ श्रीदेवी की नोंकझोंक और दूसरी ओर मोगैम्बो से पंगे लेता मिस्टर इंडिया. जितनी बार भी देख लो, मिस्टर इंडिया हमेशा पैसा वसूल मूवी ही है.

धीरे-धीरे इन फिल्मों की भी हो गई एंट्री

जैसे-जैसे वक्त गुजरा और भी कई फिल्में स्वतंत्रता दिवस पर आने वाली फिल्मों में एड होने लगीं, जैसे- चाइना गेट, बॉर्डर, हिंदुस्तान की कसम, कोहराम, इंडियन आदि. फिर जब घर में केबल कनेक्शन और कलर टेलिविजन की एंट्री हुई तो फिर तो न जाने कितने चैनल और न जाने कितनी फिल्में. 15 अगस्त को हर चैनल पर देशभक्ति वाली फिल्म आ रही होती है. फिर चाहे वह लगान हो, गदर हो, लक्ष्य हो, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी हो, पुकार हो, रंग दे बसंती हो, स्वदेस हो, जमीन हो, मैं हूं ना हो, चक दे इंडिया हो, बेबी हो, हॉलिडे हो, राजी हो, उरी हो... जहां आपकी पसंदीदा फिल्म आ रही हो, उस चैनल पर रुक जाओ और ब्रेक में दूसरे चैनलों पर भी झांक आओ.

आज वो इंतजार कहां...

अब दुनिया इससे भी आगे बढ़ चली है. यूट्यूब या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जाओ, अपनी पसंदीदा मूवी सर्च करो और देख लो. जब मर्जी, जितनी मर्जी, उतनी बार देखो, एक सीन को 10-10 बार देखो, गानों के साथ देखो या गाने फास्ट फॉरवर्ड करके देखो. चाहें तो फिल्म डाउनलोड करके अपने पास रखी जा सकती है. वीसीआर, सीडी, डीवीडी का भी कोई झंझट नहीं. कोई इंतजार नहीं... लेकिन टीवी पर फिल्म आने के उस इंतजार का अपना ही मजा था...सब कुछ छोड़कर टीवी के सामने चिपक जाना...छोटे से नाममात्र के ब्रेक में दौड़कर जाना और खाना लेकर आना, बीच में लाइट गुल हो जाने या रुकावट के लिए खेद आ जाने पर मासूमियत भरा फ्रस्ट्रेशन...यह सब ताउम्र भुलाया नहीं जा सकता...