मन की बात में बोले PM मोदी – गांव के करघे बुन रहे हैं 'विकसित भारत' की नई तस्वीर
प्रधानमंत्री मोदी ने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में बताया कि कैसे पैठन और नालंदा जैसे छोटे शहरों के बुनकर भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई दे रहे हैं. करघे अब नवाचार, आत्मनिर्भरता और स्टार्टअप क्रांति के केंद्र बन रहे हैं.
भारत एक ऐसा देश है जहां हर गांव, हर शहर की अपनी एक कला, एक परंपरा और एक कहानी होती है. हमारी बुनाई की परंपरा सिर्फ कपड़े बुनने की नहीं, बल्कि रिश्ते, पहचान और इतिहास बुनने की परंपरा रही है. सदियों से करघे पर बुनी जाने वाली साड़ियां, दुपट्टे और चादरें न केवल पहनावे का हिस्सा रहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर बन चुकी हैं.
आज जब भारत तेज़ी से ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ रहा है, तो यह गौरव की बात है कि यह यात्रा केवल मेट्रो शहरों या बड़ी फैक्ट्रियों से नहीं, बल्कि छोटे शहरों, गांवों और उनके करघों से शुरू हो रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम
‘मन की बात’ के 124वें एपिसोड में इसी बदलाव को उजागर किया.
उन्होंने बताया कि कैसे महाराष्ट्र का पैठन, जहां सदियों पुरानी पैठनी साड़ियों की परंपरा है, और बिहार का नालंदा, जो कभी शिक्षा का वैश्विक केंद्र था, आज बुनाई और हस्तशिल्प के क्षेत्र में भारत के विकास की नई कहानी लिख रहे हैं. करघा अब सिर्फ जीविका का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह आत्मनिर्भरता, नवाचार (इनोवेशन) और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है.
एक नई शुरुआत – पुरानी परंपरा के साथ
नालंदा की हथकरघा परंपरा और पैठण की मशहूर पैठनी साड़ियों के जरिए भारत के बुनकरों ने नई उड़ान भरी है. पहले जो कला घरों की चारदीवारी में सिमटी थी, अब वह टेक्नोलॉजी और सरकारी समर्थन के साथ एक नया व्यवसाय बन चुकी है.
बुनकर परिवारों के बच्चे अब हैंडलूम टेक्नोलॉजी पढ़ रहे हैं. वे डिज़ाइन और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं. यानी अब करघा केवल एक औजार नहीं, अतीत और भविष्य को जोड़ने वाला पुल बन गया है.
गांव बना नवाचार का केंद्र
प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि अब गांव और छोटे कस्बे इनोवेशन और उद्यमिता के नए हब बन गए हैं. पैठन में महिलाएं पैठनी साड़ियों से जुड़े बिजनेस चला रही हैं. देशभर में जनजातीय और ग्रामीण समुदाय अपनी पारंपरिक बुनाई को व्यवसाय में बदल रहे हैं.
ये केवल कमाई की कहानियां नहीं हैं. ये कहानियां हैं आत्मनिर्भरता, पहचान और गर्व की. हर बुना हुआ धागा अब एक पीढ़ी की कहानी कह रहा है – और अब उसे बढ़ने का मौका भी मिल रहा है.
कॉटेज इंडस्ट्री से स्टार्टअप तक का सफर
भारत में 3,000 से ज्यादा टेक्सटाइल स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं. ये स्टार्टअप पारंपरिक कारीगरों की कला को ग्लोबल पहचान दिला रहे हैं. कोई नेचुरल डाई बना रहा है, कोई डिजिटल प्लेटफॉर्म से बेच रहा है – सब मिलकर हैंडलूम को एक नया चेहरा दे रहे हैं.
गांव की महिलाएं, बुजुर्ग कारीगर, शहरी डिज़ाइनर और युवा टेक्नोलॉजिस्ट – सब एक साथ काम कर रहे हैं. यह परंपरा और इनोवेशन का सुंदर संगम है.
संस्कृति भी ताकत है, सिर्फ परंपरा नहीं
पीएम मोदी ने कहा कि कपड़ा केवल एक सेक्टर नहीं है – यह भारत की विविधता और संस्कृति की जीवंत पहचान है. हर साड़ी, हर शॉल, हर कपड़ा – एक कहानी कहता है. अब ये कहानियां म्यूजियम में ही नहीं, ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर भी दिखाई दे रही हैं.
सरकार की ट्रेनिंग, बाजार से जुड़ाव और डिजिटल प्रमोशन की मदद से अब कारीगर आत्मविश्वास से आगे बढ़ रहे हैं. वे केवल कारीगर नहीं – संस्कृति के राजदूत बन रहे हैं.
उम्मीदों के करघे बोल रहे विकास की भाषा
भारत $5 ट्रिलियन इकॉनमी बनने की ओर बढ़ रहा है. ऐसे में टेक्सटाइल सेक्टर यह दिखा रहा है कि कैसे परंपरा और टेक्नोलॉजी, गांव और शहर, पुरानी सोच और नई ऊर्जा – मिलकर देश का भविष्य बना सकते हैं.
नालंदा से पैठन तक, गांव की मिट्टी से लेकर स्टार्टअप के शोरूम तक – करघे अब केवल बुनाई का जरिया नहीं हैं, वे बदलाव, आत्मबल और गर्व के प्रतीक बन चुके हैं. हर धागा अब ‘विकसित भारत’ का सपना बुन रहा है.
Edited by Ravi Pareek



