आंवले की खेती में राजस्थान के कैलाश चौधरी का सालाना डेढ़ करोड़ का टर्नओवर

By जय प्रकाश जय
January 16, 2020, Updated on : Fri Jan 17 2020 08:54:19 GMT+0000
आंवले की खेती में राजस्थान के कैलाश चौधरी का सालाना डेढ़ करोड़ का टर्नओवर
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कोटपुतली (राजस्थान) के प्रगतिशील किसान कैलाश चौधरी आज एग्रिकल्चर सेक्टर में देश का एक जानी-पहचानी शख्सियत बन चुके हैं। आज उनका कृषि व्यवसाय का सालाना टर्नओवर डेढ़ करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। आंवले की खेती ने उन्हे करोड़पति बना दिया है। उनसे सैकड़ों किसानों, महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है।


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कैलाश चौधरी



कीरतपुरा गाँव के 71 वर्षीय जैविक किसान कैलाश चौधरी को न सिर्फ कोटपुतली, बल्कि पूरे राजस्थान में जैविक खेती और रूरल मार्केटिंग का आइकॉन माना जाता है। आधुनिक कृषि के साथ वह अब तक पांच हजार से अधिक किसानों को जैविक खेती में प्रशिक्षित करने के साथ ही उनके अपनी उपज के बाजार का रास्ता भी प्रशस्त कर चुके हैं।


दरअसल, प्रगतिशील किसान कैलाश चौधरी की हैसियत आज एक ऐसे जीते-जागते मजबूत और कामयाब इरादे वाले कृषि-गुरु की है, जिनसे उनके राज्य में शायद ही कोई किसान अपरिचित हो। उन्होंने आंवले के मात्र पांच दर्जन पेड़ों से सवा करोड़ रुपए कमा लिए हैं।


पिछले साल उनको उदयपुर के पेसिफिक यूनिवर्सिटी में किसान वैज्ञानिक पुरस्कार से नवाजा गया था। इससे पहले भी वह विभिन्न सरकारों से दर्जनों बार सम्मानित हो चुके हैं। उनका नाम केंद्र सरकार की ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में भी शामिल हो चुका है।


कोटपुतली कस्बे से छह किलोमीटर दूर स्थित कीरतपुरा गांव वर्षों से उन्नत खेती की सुर्खियों में बना हुआ है। अब तो जैविक खेती और उपज के बाजार के तरीके सीखने के लिए यहां भारत के अलावा विदेशों तक से कृषि वैज्ञानिक और बाजार वेत्ता चक्कर लगाते रहते हैं। विदेशों से प्रतिवर्ष यहां तमाम छात्र भी जैविक खेती और बागवानी सीखने आते हैं।


उल्लेखनीय है कि चौधरी का पूरा परिवार उनके साथ खेतीबाड़ी के काम में जुटा रहता है। चौधरी के भतीजे विक्रम सिंह भी इंजीनियरिंग कम्प्यूटर की नौकरी छोड़कर खेती करने लगे हैं। इस तरह आज कैलाश चौधरी अपने परिवार के तीन दर्जन सदस्यों के अलावा सैकड़ों ग्रामीणों को रोजगार देने के साथ ही असंख्य छात्रों को उन्नत खेती के हुनर सिखा रहे हैं।


कैलाश चौधरी कहते हैं कि कुछ लोग खेती को घाटे का सौदा कहकर मुंह मोड़ लेते हैं लेकिन जो लोग खेती से प्यार करते है, उन्हें खेती अपनी बांहों में भर लेती है। मिट्टी से जुड़कर वे खुद तो अच्छी कमाई करते ही हैं, साथ ही तमाम बेरोजगारों के मार्गदर्शक भी हैं। उनकी दृढ़ मान्यता है कि खेती घाटे का सौदा नहीं है। इससे तकदीर बदल सकती है। कामयाबी के लिए शार्टकट तरीके अपनाने की जरूरत नहीं है।





बस जरूरत है तो बारीक समझ, कड़ी मेहनत और मन से भरपूर लगन की। आज चौधरी के इसी अटल विश्वास के कारण राजस्थान में हरियाणा की सीमा से सटे कोटपुतली (जयपुर) इलाका जैविक खेती और फ़ूड प्रोसेसिंग का हब बन चुका है। छोटे-बड़े हज़ारों किसान यहाँ पर जैविक खेती कर रहे हैं और उनमें से तमाम खेतिहर खुद की प्रोसेसिंग यूनिटें चला रहे हैं।


वैसे तो कैलाश चौधरी के पास 60 बीघे खेत है लेकिन सिंचाई के अभाव में पहले उनके परिजन छह-सात बीघे जमीन पर ही खेती करते रहे हैं लेकिन उन्नीस सौ सत्तर के दशक में जब वह कीरतपुरा गांव के मुखिया बने तो सबसे पहले चकबंदी के साथ ही उन्होंने दो दर्जन से अधिक नलकूपों को विद्युत व्यवस्था से लैस किया और देखते ही देखते पूरा गांव हरियाली से गुलजार हो उठा। हर तरह की फसलें पैदा होने लगीं।


अब जरूरत थी तो इलाके के किसानों की उपज उचित मूल्य पर खपाने के लिए मुनाफेदार मंडी की तलाश। इस दिशा में पहली बार गेहूं के 'गणेश ब्रांड' का विज्ञापन पढ़ते ही उनकी कामयाबी का वह दरवाजा भी खुल गया। वह स्वयं उपज की साफ-सफाई, पैकिंग तक कराकर बाहरी सुदूर की मंडियों की बजाय शहरों की कालोनियों और कस्बों में बेचने लगे। अचानक कमाई कई गुना ज्यादा बढ़ गई। इससे उनके जोड़ीदार बाकी किसानों की भी जिंदगी खुशहाल होने लगी। इस तरकीब से बिचौलिये हटे तो उन्होंने जयपुर मंडी की राह पकड़ ली। 


कैलाश चौधरी बताते हैं कि वर्ष 1995 में जब कोटपुतली में कृषि विज्ञान केंद्र खुला तो वह सीधे कृषि वैज्ञानिकों से जुड़ गए। उसी समय से उन्होंने जैविक खेती की दिशा में हाथ आजमाना शुरू किया। वैज्ञानिकों से उन्होंने सीख लिया कि किस तरह उपज का उच्छिष्ट यानी भूसी, पराली आदि का भी लाभ लिया जा सकता है। फिर तो उनकी किसानी में वर्मी-कम्पोस्ट, हॉर्टिकल्चर आदि जाने कितने नए नए शब्द जुड़ते चले गए।


उन्हीं दिनों कृषि वैज्ञानिकों के सुझाव पर उन्होंने आंवले की खेती में हाथ डाल दिया। खेत में कृषि विज्ञान केंद्र से मिले पौधे रोप दिए, जिनमें साठ सही-सलामत वृक्षाकार हुए। फल निकले तो खरीदार नहीं। फिर क्या था, कृषि वैज्ञानिकों के सुझाव पर वह बाकायदा खुद की यूनिट से प्रोसेसिंग कर आंवले के लड्डू, कैंडी, मुरब्बा, जूस आदि तरह तरह के प्रोडक्ट बनाकर बेचने लगे।


साथ ही वर्ष 2005 से एक नई शुरुआत कर पांच हजार किसानों को अपने साथ जोड़ लिया। बड़ी संख्या में महिलाओं को अपने काम में लगा लिया। आज उनका कृषि व्यवसाय सालाना डेढ़ करोड़ रुपए टर्नओवर के साथ पूरी तरह स्थापित हो चुका हैं।


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