KITG 2026: मजदूर की बेटी मोनिका सोनोवाल ने दर्द को हराकर जीता गोल्ड मेडल
Khelo India Tribal Games (KITG) 2026 में असम की मोनिका सोनोवाल ने घुटने की चोट और कठिन हालात के बावजूद वेटलिफ्टिंग में गोल्ड मेडल जीता. उनके पिता मजदूरी करते हैं. मोनिका की चैंपियन बनने की यह कहानी संघर्ष, हिम्मत और बड़े सपनों को सच करने की प्रेरणा देती है.
छत्तीसगढ़ में आयोजित ‘खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स’ 2026 (Khelo India Tribal Games - KITG 2026) में कई ऐसी कहानियां सामने आ रही हैं, जो दिल को छू जाती हैं. इन्हीं में से एक कहानी असम की 19 साल की वेटलिफ्टर मोनिका सोनोवाल (Monikha Sonowal) की है.
उन्होंने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया. यह जीत सिर्फ एक पदक नहीं है. यह दर्द, संघर्ष और विश्वास की कहानी है.
मजदूर पिता की बेटी का सपना
मोनिका असम के धीमाजी जिले के एक छोटे से इलाके बटघोरिया पेनबेनी चौक की रहने वाली हैं. यह जगह ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसी है. यहां जिंदगी शांत है और ज्यादातर लोगों के सपने सीमित होते हैं.
मोनिका के पिता पद्मधर सोनोवाल एक मिस्त्री हैं. वह दिनभर कंस्ट्रक्शन साइट्स पर काम करते हैं. परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है.
जब मोनिका ने गोल्ड मेडल जीता, तो वह सबसे पहले अपने पिता को फोन करना चाहती थीं. लेकिन वह काम पर थे. शायद व्यस्त थे. यह पल उनकी जिंदगी का सबसे खास था.
चोट के बावजूद नहीं टूटी हिम्मत
मोनिका के लिए वेटलिफ्टिंग सिर्फ एक खेल नहीं था. यह एक सपना था जो धीरे-धीरे बड़ा होता गया. कम संसाधनों के बावजूद उन्होंने इस खेल को अपनाया. उन्हें मणिपुर की ओलंपिक मेडलिस्ट मीराबाई चानू (Mirabai Chanu) से प्रेरणा मिली.
बारबेल की आवाज उनके सपनों की आवाज बन गई.
इस जीत के पीछे एक और बड़ी कहानी छिपी है. पिछले तीन महीनों से मोनिका घुटने की चोट से जूझ रही थीं. ट्रेनिंग के दौरान लगी इस चोट ने उन्हें परेशान कर दिया था. उनके कोच भी चिंतित थे. उन्होंने सलाह दी कि वह इस प्रतियोगिता को छोड़ दें.
लेकिन मोनिका ने यह मौका नहीं छोड़ा. उन्होंने दर्द के साथ खेलने का फैसला किया. उन्होंने खुद कहा कि ऐसे मौके बार बार नहीं मिलते. वह इस मंच को खोना नहीं चाहती थीं.
SAI की ट्रेनिंग से गोल्ड मेडल तक
मोनिका ने अपने दर्द को पीछे छोड़कर शानदार प्रदर्शन किया. उन्होंने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल जीत लिया.
यह इस प्रतियोगिता का पहला वेटलिफ्टिंग गोल्ड भी था. उनकी मेहनत रंग लाई.
दो साल पहले उनका करियर एक नए मोड़ पर आया. जब उन्हें Sports Authority of India (SAI) के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, ईटानगर में ट्रेनिंग का मौका मिला. यहां उन्हें बेहतर ट्रेनिंग, पोषण और मार्गदर्शन मिला. चोट से उबरने में भी मदद मिली.
मोनिका मानती हैं कि अगर उन्हें यह मौका नहीं मिलता, तो वह इस स्तर तक नहीं पहुंच पातीं.
मोनिका का सफर लगातार आगे बढ़ता रहा. साल 2023 में उन्होंने स्कूल नेशनल्स में गोल्ड जीता.
2024 में खेलो इंडिया अस्मिता लीग में रजत पदक हासिल किया. 2025 में स्टेट चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता. इंटर यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में भी उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया. हर प्रतियोगिता के साथ उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया.
ये तो बस एक शुरुआत है
मोनिका की नजर अब और बड़े लक्ष्य पर है. वह सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहती हैं.
उनका सपना है कि एक दिन वह एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ गेम्स और वर्ल्ड चैंपियनशिप जैसे बड़े टूर्नामेंट में देश के लिए पदक जीतें. वह मानती हैं कि यह गोल्ड उनके सफर की मंजिल नहीं, बल्कि शुरुआत है. अभी उन्हें अपनी तकनीक और फिटनेस पर और काम करना है. चोट से पूरी तरह उबरकर खुद को और मजबूत बनाना है. उनके अंदर आगे बढ़ने की भूख साफ दिखती है. यही जिद उन्हें लगातार बेहतर बनने की दिशा में आगे बढ़ा रही है.
मोनिका सोनोवाल की कहानी यह बताती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर इरादा मजबूत हो तो रास्ता बन ही जाता है. एक छोटे गांव की लड़की. मजदूर पिता की बेटी. और फिर राष्ट्रीय मंच पर गोल्ड. यह सिर्फ एक जीत नहीं है. यह उस विश्वास की जीत है जो सपनों को सच बना देता है.
(image: KITG 2026)





