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40 साल में 151 बार रक्तदान करने वाले 65 साल के ज्योतिंद्र मिठानी से मिलिए

Roshni Balaji
11th Feb 2019
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रक्तदान करते हुए ज्योतिंद्र मिठानी

रक्तदान से कितने लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती है ये मुंबई के रहने वाले ज्योतिंद्र मिठानी से पूछा जा सकता है। 65 वर्षीय ज्योतिंद्र पिछले 40 सालों में 151 बार रक्तदान कर कईयों की जिंदगी बचा चुके हैं। 1977 में भारत-पाक युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों को खून देकर रक्तदान की शुरुआत करने वाले ज्योतिंद्र हर तीन महीने पर रक्तदान करते आए हैं। उन्होंने योरस्टोरी के साथ बात की और अपनी जिंदगी से जुड़े कुछ दिलचस्प पहलू साझा किए।


ज्योतिंद्र मिठानी बताते हैं, 'इतने सालों बाद भी अब जब मेरी बांह की नस पर एक सुई लगाई जाती है तो मैं एकदम शांत रहता हूं और मुझे कोई दिक्कत नहीं होती है। जब नर्स मेरी बांह में सुई डालती है और रक्त को एकत्र करने के लिए एक थैला लगाया जाता है तो मुझे अब भी उतनी ही खुशी मिलती है। पिछले साल मैंने 151वीं बार रक्तदान किया था। मैं पिछले 42 सालों से लगातार रक्तदान करता रहा हूं।'


एक ऐसे देश में जहां रक्तदान की कमी से हजारों मरीजों की जान चली जाती हो वहां मिठानी लोगों को रक्तदान करने के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं। आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में 2016-17 में 1.9 मिलियन यूनिट रक्त की कमी थी। इतना खून 60 टैंकरों के बराबर है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, यह रक्त 320,000 से अधिक हार्ट सर्जरी या 49,000 अंग प्रत्यारोपणों में मदद कर सकता था। इंडियास्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015-16 में 1.1 मिलियन यूनिट की कमी थी जो कि वक्त के साथ बढ़ती ही जा रही है।


फरवरी 1977 की बात है भारत-पाकिस्तान युद्ध के वक्त घायल भारतीय सैनिकों को खून की आवश्यकता से जुड़ी उद्घोषणा रेडियो पर हुई तो मिठानी तुरंत रक्तदान के लिए दौड़े चले गए। वे कहते हैं, 'जैसे ही मुझे पता चला की खून की जरूरत पड़ रही है तो मैं तुरंत रक्तदान वाली जगह पर गया और रक्तदान किया। इसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और इसे अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया।' मिठानी का ब्लडग्रुप A+ है। वे मुंबई के मीरा रोड इलाके में रहते हैं।


वे बताते हैं कि शुरू में उनके माता-पिता और परिवार के लोगों ने उन्हें रक्तदान से रोका और कहा कि रक्तदान करने से खून की कमी हो जाएगी। लेकिन मिठानी सबको समझाने में कामयाब रहे। वे कहते हैं, 'मैंने सबको समझाया कि रक्तदान करने से कोई एनिमिक नहीं बनता है। यह एक प्रकार का मिथक है। बल्कि रक्तदान करने से रक्तकोशिकाएं और हृदय ठीक तरह से काम करता है।' मिठानी एक स्टॉकब्रोकिंग फर्म में मिड लेवल मैनेजर हैं। उन्होंने मुंबई के कई अस्पतालों में जाकर रक्तदान किया है।


उन्होंने विले पार्ले स्थित नानावटी अस्पताल में 54 बार और सर एचएन रिलाइंस फाउंडेशन अस्पताल गिरगांव में 45 बार रक्तदान किया है। वे अपने इलाके में रक्तदान में अपने महत्वपूर्ण योगदान के लिए प्रसिद्ध हैं। इसलिए उन्हें आज भी लोग रक्तदान के लिए याद करते हैं। 


वे कहते हैं, 'मुझे आज भी वो दिन याद है जब एक अजनबी व्यक्ति मेरे दरवाजे पर आया और कहने लगा कि उसकी मां गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है जिसे खून की सख्त जरूरत है। उसने बताया कि वह A+ ब्लडग्रुप खून के लिए वह कई लोगों के पास गया, लेकिन कहीं उसे खून नहीं मिला। इसके बाद मैं विरार संजीवनी अस्पताल पहुंचा और रक्तदान किया। डॉक्टरों ने बताया कि कुछ घंटों की देरी होती तो उसकी मां की जान भी जा सकती थी।'


2008 में मुंबई में आतंकी हमले के वक्त 700 लोग घायल हुए थे। मिठानी तुरंत घायलों की मदद करने के लिए मौके पर जा पहुंचे थे। वे कहते हैं, 'किसी की जिंदगी बचाने से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता और समय समय पर रक्तदान करके किसी को जिंदगी दी जा सकती है। जैसे ही मुझे मुंबई आतंकी हमलों के बारे में पता चला था मैं परेल स्थित केईएम अस्पताल पहुंच गया था और लोगों के लिए रक्तदान किया।'


बेंगलुरु के संजयनगर के लायंस क्लब के अध्यक्ष अल्फोंस कुरियन सोशल मीडिया पर रक्तदान को बढ़ावा दे रहे हैं और कई जागरूकता अभियानों से भी जुड़े रहे हैं। उनका मानना है कि आज के समय में रक्तदान का अत्यधिक महत्व है। अल्फोंस कहते हैं, 'जब रक्तदान की बात आती है तो लोग अपने आप पीछे हट जाते हैं और जरूरत पड़ने पर भी आगे नहीं आते हैं। मैं उन लोगों की सराहना करता हूं जो रक्तदान के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।' हालांकि ऐसे लोग बहुत कम हैं जो रक्तदान के लिए नियमित तौर पर तैयार रहते हैं।


यह भी पढ़ें: आईएएस के इंटरव्यू में फेल होने वालों को मिलेगी दूसरी सरकारी नौकरी!

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