अब तो झील और कुएं ही बचा पाएंगे बेंगलुरु को!
भले ही जागरूक मछुआरा समुदाय ने जक्कुर की नब्ज थाम रखी हो, बेंगलुरु की बाकी सभी झीलें मृत पड़ी हैं। पर्यावरणविद टीवी रामचंद्र कहते हैं कि इसी तरह शहरीकरण होता रहा तो 2020 तक इसका 94 फीसद हिस्सा कंक्रीट में बदल जाएगा।
हमारे देश की सिलिकन वैली बेंगलुरु (कर्नाटक) में पानी का संकट इतना गहराता जा रहा है कि रोजाना हजारों टैंकर पानी शहर को सप्लाई करना पड़ रहा है। विशषज्ञों का तो यहां तक कहना है कि अगर स्थिति यही बनी रही तो जल्द ही बेंगलुरु भारत का पहला ऐसा शहर केपटाउन बन जाएगा, जहां बिलकुल पानी नहीं बचेगा। पर्यावरणविद टीवी रामचंद्र कहतें है, यूं ही शहरीकरण होता रहा तो 2020 तक इस शहर का 94 प्रतिशत हिस्सा कंक्रीट में बदल जाएगा। पहले से ही शहर के करीब एक करोड़ लोग बोरवेल और टैंकर्स पर निर्भर हो चुके हैं।
उत्तरी बेंगलुरु में लगभग पचास हेक्टेयर फैली जक्कुर झील में बरसात ही नहीं, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का पानी भी आता है, जो प्रतिदिन 15 मिलियन लीटर जल संशोधित कर देता है। इसके बाद इस पानी को एक कृत्रिम वेटलैंड से साफ किया जाता है। इसके बाद साफ पानी झील में लौटा दिया जाता है। यह झील स्थानीय मछुआरों की रोजी-रोटी का आधार भी है। झील के इस साफ-सफाई के काम में मछुआरा जोआचिम की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वह बताते हैं कि हाल ही में मछुआरा समुदाय को सरकार से जक्कुर झील में मछली पालन के लिए पांच साल का टेंडर मिला है। मछुआरा समुदाय ही इस झील से प्लास्टिक कचरा और जलकुंभी साफ करता है। अब तो मत्स्य पालन विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी भी उनसे मिलकर सुझाव, हिदायतें देते रहते हैं।
गौरतलब है कि समुद्र तल से 920 मीटर की ऊंचाई पर बसे शहर बेंगलुरु के आसपास कोई ऐसी नदी नहीं है, जिसमें बारहो मास पानी बहता हो। दरअसल, इस शहर को पानी के लिए लगभग ढाई सौ झीलों का ही सहारा रहा है। ये झीलें शहरी क्षेत्र में लगातार अपार्टमेंट्स की बढ़ती संख्या, आधुनिकता की मारामारी में प्रदूषित, कचरे से अटी पड़ी रहती हैं। ये अतिक्रमण की भी शिकार होने लगी हैं। यही वजह है कि अब ले-देकर कावेरी नदी को बहने का लोगों को इंतजार रहता है, जो शहर से 95 किलोमीटर दूर है। पंपिंग सिस्टम से शहर को प्रतिदिन 14000 लाख लीटर पानी उपलब्ध कराया जाता है।
इस शहर की दूसरी बड़ी मुसीबत है, बरसाती पानी झीलों तक पहुंचने में तरह तरह के अवरोध। मानवीय प्रयासों से जक्कुर झील अब भरने के लिए पूरी तरह से बरसाती पानी की जगह ट्रीटमेंट-प्लांट से निकले पानी पर निर्भर हो चुकी है। इसलिए ट्रीटमेंट-प्लांट से निकला पानी जो झील में जाता है, उसकी गुणवत्ता बहुत मायने रखती है। झील में हर साल चार हजार मत्स्य बीज प्रति हेक्टेयर डाले जाते हैं, जो इस झील के पानी पर निर्भर हैं। पानी प्रदूषित होगा तो मछलियों के इन बच्चों के साथ ही अन्य जलजंतु, पक्षियों आदि के लिए भी मुश्किल पैदा हो सकती है। यह झील सैकड़ों पक्षियों का बसेरा है।
सबसे हैरत की बात तो ये है कि इस झील की साफ-सफाई, पानी का ऑक्सीजन स्तर बनाए रखने पर खर्च होने वाले नमक, फिटकरी, चूना पत्थर आदि का खर्च मछलियां पालने वाले यहां के मछुआरे उठा रहे हैं। बेंगलुरु शहर में आज भी बहुत से कुएँ ऐसे हैं, जिनका इस्तेमाल लंबे वक्त से नहीं हो रहा है, क्योंकि उनमें पानी ही नहीं है। किसी जमाने में इनकी साफ-सफाई करते रहे मनु-वद्दार समुदाय की मदद से इन कुओं को फिर से जिंदा किया जा सकता है लेकिन इस तरफ आज भी किसी का ध्यान नहीं है। अब पता चला है कि इस समुदाय के कुछ लोग कम लागत में कुएं बनाने की योजना पर काम करने लगे हैं। आज पानी की लड़ाई लड़ते बेंगलुरु में भूजल संकट को देखते हुए कुएं खोदने वाले भी अब वर्षाजल संचयन की तकनीकों को अपना रहे हैं जैसे रूफटोप रेनवाटर हार्वेस्टिंग करके बरसाती पानी को कुएं में डालना, ताकि भूजल में एक्विफर भी रीचार्ज हो सकें और जल स्तर बढ़े।
मनु-वद्दार समुदाय के लोगों के साथ नए पानी संरक्षण तकनीकों की जानकारी साझा की जा रही है। मन्नु-वद्दार समुदाय के शंकर और रमेश इस समय बेंगलुरु में 10 लाख से ज्यादा रीचार्ज कुएं खोदने और उनको तैयार करने के प्रोजक्ट पर काम कर रहे हैं। शहर की सबसे बड़ी समस्या पानी और मलजल प्रबंधन है, जिसका समाधान किसानों, मछुआरों से करने की कोशिशें चल रही हैं। वही लोग अपनी आजीविका के लिए ये काम करते हुए शहर को इकोलॉजिकल सुरक्षा भी प्रदान कर रहे हैं।
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