माता-पिता को मिली एक ही दवा, असर हुआ अलग और यहीं से जन्मा स्टार्टअप NuGenomics
NuGenomics के CEO राहुल रंगनाथन ने माता-पिता के डायबिटीज से अनुभव को समझकर 2021 में कंपनी शुरू की. जानिए कैसे जेनेटिक्स, ब्लड बायोमार्कर्स, माइक्रोबायोम और लाइफस्टाइल डेटा के जरिए कंपनी भारत में पर्सनलाइज्ड हेल्थ और प्रिसिजन हेल्थ का मॉडल तैयार कर रही है.
डायबिटीज एक ही बीमारी है, लेकिन क्या इसका असर हर व्यक्ति पर एक जैसा होता है?
हेल्थटेक स्टार्टअप NuGenomics के को-फाउंडर और CEO राहुल रंगनाथन के लिए यह सवाल किसी किताब या रिसर्च पेपर से नहीं आया था. करीब 18 साल पहले उनके माता-पिता को लगभग एक ही समय पर डायबिटीज का पता चला. दोनों को एक जैसी दवा दी गई. पिता की ब्लड शुगर धीरे-धीरे काबू में आने लगी, लेकिन मां हाइपोग्लाइसीमिया की स्थिति में पहुंचने लगीं.
एक ही बीमारी, एक ही दवा और दो अलग प्रतिक्रियाओं ने राहुल को सोचने पर मजबूर किया कि हेल्थकेयर में एक जैसा तरीका हर व्यक्ति के लिए काम नहीं कर सकता.
राहुल ने मॉलिक्यूलर बायोलॉजी की पढ़ाई की और CSIR रिसर्च फेलो के तौर पर काम किया. बाद में उन्होंने XLRI जमशेदपुर से MBA किया और तथा में काम किया. साइंस और कॉरपोरेट वर्ल्ड के इस अनुभव ने आगे चलकर NuGenomics की नींव रखने में भूमिका निभाई.
2021 में शुरू हुई जेनेटिक्स, ब्लड बायोमार्कर्स, माइक्रोबायोम और लाइफस्टाइल से जुड़े डेटा को एक साथ देखने के जरिए पर्सनलाइज्ड हेल्थ सेक्टर में काम करती है. इसका हेडक्वार्टर बेंगलुरु में है.
YourStory से बातचीत में राहुल ने कंपनी की शुरुआत, परिवार से मिली प्रेरणा, अब तक की स्टार्टअप जर्नी, फंडिंग और भारत में प्रिसिजन हेल्थ की संभावनाओं पर बात की.
एक ही बीमारी, इलाज अलग क्यों?
राहुल का शुरुआती करियर रिसर्च से जुड़ा था. उन्हें खास तौर पर बायोलॉजी और जेनेटिक्स में दिलचस्पी थी. लेकिन रिसर्च के दौरान उन्हें लगा कि केवल विज्ञान को समझना पर्याप्त नहीं है. उस ज्ञान को लोगों तक पहुंचाना भी जरूरी है.
उनके माता-पिता का अनुभव इसी सोच का व्यक्तिगत उदाहरण बन गया.
राहुल के मुताबिक, उनके पिता केरल के तमिल परिवार से आते हैं, जबकि उनकी मां दिल्ली के पंजाबी परिवार से हैं. दोनों का बायोलॉजिकल और फैमिली बैकग्राउंड अलग है. डायबिटीज के इलाज के दौरान उनकी अलग प्रतिक्रियाओं ने राहुल के उस विश्वास को मजबूत किया कि किसी व्यक्ति की बीमारी को समझने में केवल उसका डायग्नोसिस पर्याप्त नहीं हो सकता.
राहुल कहते हैं, “मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट के तौर पर मैं हमेशा से समझता था कि हर व्यक्ति जैविक रूप से अलग होता है. लेकिन अपने माता-पिता के साथ ऐसा होते देखना मेरे लिए इसे बहुत वास्तविक बना गया.”
यही आइडिया NuGenomics की शुरुआत का आधार बना.

जेनेटिक्स से आगे की तस्वीर
NuGenomics केवल जेनेटिक टेस्टिंग तक सीमित नहीं रहना चाहती. कंपनी वजन प्रबंधन, मेटाबॉलिक हेल्थ, डायबिटीज, PMOS (इसे पहले PCOS कहा जाता था), महिलाओं की सेहत, न्यूट्रिशन, फिटनेस और हेल्दी एजिंग जैसे क्षेत्रों में प्रिसिजन हेल्थ असेसमेंट पर काम करती है.
इन कार्यक्रमों में जरूरत के अनुसार जेनेटिक जानकारी के साथ ब्लड बायोमार्कर्स, माइक्रोबायोम, मेडिकल हिस्ट्री और लाइफस्टाइल से जुड़ी जानकारी को देखा जाता है.
राहुल के अनुसार, DNA (deoxyribonucleic acid) किसी व्यक्ति में किसी बीमारी या स्थिति की आनुवंशिक प्रवृत्ति के बारे में संकेत दे सकता है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है. शरीर में मौजूदा स्थिति समझने के लिए दूसरे स्वास्थ्य संकेतकों को भी संदर्भ में देखना जरूरी है.
यही वजह है कि कंपनी ने अपने प्रोडक्ट को मॉड्यूलर रखने की कोशिश की है, ताकि स्वास्थ्य से जुड़े अलग-अलग सवालों के आधार पर आगे की जांच की जा सके.
कंपनी B2C (बिजनेस टू कंज्यूमर) के साथ B2B (बिजनेस टू बिजनेस) मॉडल पर भी काम करती है. इसमें कॉरपोरेट्स, हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स, डायग्नोस्टिक पार्टनर्स और दूसरी संस्थाओं के साथ साझेदारी शामिल है.
भारतीय जीनोमिक डेटा की चुनौती
प्रिसिजन हेल्थ के सामने भारत में एक बड़ी चुनौती स्थानीय जीनोमिक डेटा की कमी रही है. दुनिया में जेनेटिक्स से जुड़ी रिसर्च का एक बड़ा हिस्सा यूरोपीय आबादी पर आधारित रहा है. भारत जैसे आनुवंशिक रूप से विविध देश में ऐसे डेटा की प्रासंगिकता को सीधे मान लेना आसान नहीं है.
इसी दिशा में सरकारी GenomeIndia प्रोजेक्ट एक महत्वपूर्ण पहल है. इस प्रोजेक्ट के तहत 20 संस्थानों के सहयोग से 10,074 व्यक्तियों की होल जीनोम सीक्वेंसिंग पूरी की गई. गुणवत्ता जांच के बाद 83 विविध भारतीय आबादी समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले 9,768 जीनोम को अंतिम विश्लेषण में शामिल किया गया.
इस तरह के डेटासेट का उद्देश्य भारतीय आबादी में जेनेटिक विविधता को बेहतर ढंग से समझना और भविष्य में रिसर्च, डायग्नोस्टिक्स और पर्सनलाइज्ड मेडिसिन के लिए आधार तैयार करना है.
राहुल के लिए भी भारतीय डेटा एक महत्वपूर्ण सवाल रहा है.
वे कहते हैं, “हम किसी वैश्विक मॉडल को लेकर यह नहीं मान सकते थे कि वह भारत में भी उसी तरह काम करेगा. डेटा बनाना और विज्ञान को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाना हमारे काम का अहम हिस्सा रहा है.”
उनके मुताबिक, शुरुआत में लोगों के बीच जेनेटिक टेस्टिंग को लेकर जागरूकता और भरोसा भी सीमित था. कई लोग इसे केवल कैंसर या दुर्लभ बीमारियों की जांच से जोड़कर देखते थे.
एक दूसरी सीख यह रही कि ज्यादा जानकारी हमेशा बेहतर स्वास्थ्य व्यवहार में नहीं बदलती. लंबी रिपोर्ट मिलने भर से किसी व्यक्ति की आदतें नहीं बदलतीं. इसलिए स्वास्थ्य से जुड़े निष्कर्षों को सरल भाषा में समझाना भी इस क्षेत्र की चुनौती है.
फंडिंग, इन्वेस्टर और रेवेन्यू
NuGenomics ने शुरुआत सीमित संसाधनों के साथ की. कंपनी ने कुछ प्रक्रियाओं के लिए लैब पार्टनर्स का इस्तेमाल किया और अपनी टीम का फोकस साइंस, बायोइन्फॉर्मेटिक्स, डेटा इंटरप्रिटेशन और टेक्नोलॉजी पर रखा.
शुरुआती दौर में कंपनी को फाउंडर कैपिटल के साथ India Accelerator और Lead Angels का समर्थन मिला. 2023 में Inflection Point Ventures (IPV) की अगुवाई में कंपनी ने 5 लाख डॉलर की प्री-सीरीज A फंडिंग जुटाई. कंपनी के अनुसार, इस फंडिंग का इस्तेमाल टेक्नोलॉजी, टैलेंट, सेल्स और मार्केटिंग को मजबूत करने में किया गया. Thyrocare के फाउंडर डॉ. ए. वेलुमणि ने भी Bharat Ke Super Founders के जरिए कंपनी का समर्थन किया.
राहुल बताते हैं कि 2022 में जब YourStory ने पहली बार कंपनी के बारे में रिपोर्ट किया था, तब करीब 500 ग्राहकों की टेस्टिंग हुई थी. अब कंपनी के मुताबिक यह संख्या 15 हजार से ज्यादा जीनोमिक और हेल्थ प्रोफाइल तक पहुंच चुकी है.
राहुल के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती चार महीनों में कंपनी का रेवेन्यू पिछले साल की समान अवधि की तुलना में दोगुना रहा. कारोबार अब कंज्यूमर जीनोमिक्स के अलावा D2C (डायरेक्ट टू कंज्यूमर) प्रोडक्ट्स, कॉरपोरेट प्रोग्राम और हेल्थकेयर तथा डायग्नोस्टिक पार्टनरशिप तक फैला है.
आगे की राह
NuGenomics के सामने अब सवाल इस मॉडल को बड़े स्तर पर पहुंचाने का है. प्रिसिजन हेल्थ अगर केवल महंगी और सीमित आबादी तक पहुंचने वाली सेवा बनी रहती है, तो इसका असर भी सीमित रहेगा.
कंपनी जेनेटिक इनसाइट्स को ज्यादा मॉड्यूलर और किफायती बनाने की दिशा में काम कर रही है. साथ ही जेनेटिक्स को ब्लड टेस्ट, वियरेबल्स और लंबे समय के हेल्थ डेटा के साथ जोड़ने की संभावनाएं भी देखी जा रही हैं.
राहुल की नजर अस्पतालों, डॉक्टरों, डायग्नोस्टिक लैब्स और कॉरपोरेट हेल्थ प्रोग्राम्स के साथ साझेदारी पर भी है. उनका मानना है कि पर्सनलाइज्ड हेल्थ को अलग सेवा के बजाय मौजूदा हेल्थकेयर सिस्टम का हिस्सा बनाया जा सकता है.
राहुल कहते हैं, “पांच साल बाद मैं नहीं चाहता कि लोग NuGenomics को सिर्फ एक जेनेटिक टेस्टिंग कंपनी के रूप में देखें. हमारा लक्ष्य एक ऐसा प्रिसिजन हेल्थ प्लेटफॉर्म बनाना है जो किसी व्यक्ति के जैविक आधार को समझे और समय के साथ उसकी सेहत से जुड़ी जानकारी से सीखता रहे.”
उनके लिए हेल्थटेक में काम करने का मतलब केवल नई टेक्नोलॉजी पर काम करना नहीं है. उनका मानना है कि किसी भी हेल्थकेयर प्रोडक्ट की असली उपयोगिता इस बात से तय होती है कि वह व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने में कितनी मदद करता है.
NuGenomics की कहानी अभी शुरुआती दौर से आगे बढ़ रही है. कंपनी के मुताबिक, महज 500 ग्राहकों से शुरू हुआ उसका सफर अब 15 हजार से ज्यादा हेल्थ और जीनोमिक प्रोफाइल तक पहुंच चुका है. लेकिन आगे की चुनौती सिर्फ संख्या बढ़ाने की नहीं है. भारत जैसे विविध देश में ऐसा हेल्थटेक सिस्टम तैयार करना बड़ा सवाल है, जिसमें आनुवंशिक बनावट, मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति और जीवनशैली को एक साथ समझा जा सके.
प्रिसिजन हेल्थ का भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि इन वैज्ञानिक जानकारियों को कितनी सटीकता, जिम्मेदारी और किफायती तरीके से वास्तविक स्वास्थ्य फैसलों में बदला जा सकता है.




