रैंप पर पूरे ज़माने को ऊर्जा से भर देते हैं इन जिंदादिल बुजुर्गों के ज़लवे

By जय प्रकाश जय
July 19, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:33:06 GMT+0000
रैंप पर पूरे ज़माने को ऊर्जा से भर देते हैं इन जिंदादिल बुजुर्गों के ज़लवे
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"सत्तर साल की उम्र में जब आगरा के मॉडल मनहर शर्मा और साउथ कोरिया की 77 वर्षीय चोई सून पेशेवर अंदाज में रैंप पर कैटवॉक करते हैं, तो पूरा ज़माना मानो ऊर्जा से जिंदादिल हो उठता है। ये उम्रदराज मॉडल अपने जोश-ओ-जुनून से साबित कर देते हैं कि बड़ी से बड़ी कामयाबी हासिल करने की कोई उम्र नहीं होती है।"



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सांकेतिक फोटो (Shutterstock)



अक्सर फैशन शो में मॉडल युवाओं को ही सतरंगी रोशनी में रैंप पर कैटवॉक करते देखा जाता है लेकिन जब फरीदाबाद की स्मार्ट सिटी में एक शाम सेंट्रल ग्रीन स्थित गोल्डन एस्टेट में भारतीय परिधानों से सजे-धजे उम्रदराज मेजर जनरल देवेंद्र छिब्बर, विंग कमांडर चेतन नारायण, इंद्रा भंडारी, निशा सूरी (दादा-दादी, नाना-नानी) जैसे 22 बुजुर्ग रैंप पर उतर कर दर्शकों को बेशुमार तालियां बजाने के लिए मजबूर कर दें, उनका जोश, उनकी जिंदादिली देखते ही बनती है।


इसी तरह दो साल पहले बेंगलुरु में साठ साल से अधिक उम्र की अस्सी महिलाओं ने रैंप पर अपने जलवे बिखेरे थे। ये तो रहीं, एक गैरपेशेवर प्रोग्राम की बातें। आगरा के सत्तर वर्षीय कर्नल मनहर और साउथ कोरिया की 77 वर्षीय चोई सून पेशेवर अंदाज में रैंप पर अपने कैटवॉक से शोहरत और पैसा कमाते हुए अपनी-अपनी कामयाबियों की अजीबोगरीब दास्तान लिखने लगें, तो स्वतः सिद्ध हो जाता है कि सफलता कभी भी उम्र की मोहताज नहीं होती है। ऐसे बुजुर्ग आज के जमाने में युवाओं के लिए ही प्रेरक नहीं बन जाते, बल्कि उससे पूरा जमाना जोश और जुनून से भर उठता है।


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70 वर्षीय कर्नल मनहर शर्मा

आगरा (उ.प्र.) के डिफेंस एस्टेट में रहते हैं 70 वर्षीय सेवानिवृत्त कर्नल मनहर शर्मा। वैसे तो अब तक की पूरी जिंदगी में उन्होंने अपने को कभी भी थका-थका महसूस नहीं किया लेकिन वह इतने उम्रदराज़ होने के बावजूद कभी रैंप पर कैटवॉक भी करेंगे, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था। वह फिल्म 'यंगिस्तान' में प्रेसीडेंट ऑफ इंडिया का रोल भी कर चुके हैं। वह फौज में इलेक्ट्रॉनिक मैकेनिकल इंजीनियर पद से सन् 2001 में रिटायर हो गए थे। वह फोर्टिस हॉस्पिटल, टाटा हाउसिंग, रामराज गारमेंट, भारत मसाले, नोवा हॉस्पिटल, लाइन रीडर, परंपरा रिफाइंड, हंटर चाय, स्काई लैंड, हेल्थ केयर, मैक्स हेल्प केयर, लोटस हॉस्पिटल, टीवी स्काई आदि के विज्ञापन शो में भी आ चुके हैं।


कर्नल शर्मा के पुत्र विशाल मॉडल, टीवी आर्टिस्ट होने के साथ आर्मी में सेवारत हैं और पुत्री नताशा जानी-पहचानी गायिका। कर्नल शर्मा वर्ष 2008 का वह वाकया बताते हैं, जिससे उनकी जिंदगी ने यूटर्न ले लिया था। उस दिन दिल्ली में उनके बेटे विशाल का मॉडलिंग शूट हो रहा था तो वे भी वहां मौजूद थे। स्टूडियो में एड डायरेक्टर बार-बार उनके व्यक्तित्व से सम्मोहित हो रहा था। उसने उनका भी पोर्टफोलियो बना लिया। उसके बाद से उनके पास एड मॉडलिंग के ऑफर आने लगे।


विशाल आर्मी में व्यस्त रहने लगे तो उन्होंने मॉडलिंग शुरू कर दी। उनके साथ दिल्ली, मुंबई और कोचीन की एड कंपनियां जुड़ गईं। इससे उन्हें देश की कई मशहूर कंपनियों के प्रिंट और टीवी विज्ञापन में भूमिका करने का मौका मिला। कई शहरों में उन विज्ञापनों के होर्डिंग लगने से कर्नल शर्मा छा गए। अब तक वह सैकड़ो प्रिंट और टीवी विज्ञापनों में काम कर चुके हैं। इस दौरान वह अभिनय में भी एक्सपर्ट हो गए। फिल्म 'यंगिस्तान' में तीन मिनट के लिए उन्होंने राष्ट्रपति की भूमिका निभाई है। 


इसी तरह की जिंदादिल बुजुर्ग मॉडल हैं साउथ कोरिया की चोई सून। कर्ज में डूबी चोई सून हॉस्पिटल में काम करती थीं। उन्हें टीवी पर एक विज्ञापन देखकर खुद मॉडलिंग करने का आइडिया मिला। आज वह फैशन आइकॉन बन चुकी हैं। सियोल फैशन वीक में रैंप वॉक करने के बाद वह पहली बार सुर्खियों में आईं। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा है।


साउथ कोरिया की चोई सून

सफेद कोट में साउथ कोरिया की चोई सून

आर्थिक तंगी में पली-बढ़ीं चोई को पति के छोड़ने के बाद बच्चों को पालने की जिम्मेदारी निभानी पड़ी तो हॉस्पिटल की नौकरी से गुजारा करने लगीं और कर्ज से लद गईं। उन्हे किसी ने सहारा नहीं दिया। हॉस्पिटल से मिलने वाला पूरा वेतन कर्ज चुकाने में जाने लगा। उनका लंच करना भी अक्सर असंभव सा हो गया। गहरे तनाव से थकने लगीं लेकिन एक टीवी विज्ञापन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। मॉडलिंग क्लासेस किया। सोशल मीडिया पर शोहरत मिली तो कंपनियों के ऑफर आने लगे। अब तो वह अपने देश की सबसे बुजुर्ग मॉडल के रूप में खूब नाम और पैसा दोनों कमा रही हैं।


हैरत तो इस बात की है कि वह मॉडलिंग के लिए कभी अपने बाल भी डाई नहीं करतीं। हॉस्पिटल में थीं तो छिपाने के लिए सफेद बाल डाई करने पड़ते थे, क्योंकि मरीज नहीं चाहते थे कि कोई बुजुर्ग उनकी देखभाल करे।