पीएम मोदी बोले — नारी शक्ति के बिना विकसित भारत अधूरा, 33% आरक्षण पर जोर
आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन संसद और विधानसभा में उनकी हिस्सेदारी अब भी कम है. इसी अंतर को खत्म करने की जरूरत पर जोर बढ़ रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘नारी शक्ति’ की भागीदारी के बिना देश विकसित नहीं बन सकता.
भारत जब 2047 की ओर बढ़ रहा है, तब “विकसित राष्ट्र” बनने की चर्चा सिर्फ आर्थिक विकास तक सीमित नहीं रह गई है. अब सवाल यह भी है कि इस विकास को दिशा कौन देगा. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने इसी मुद्दे को साफ शब्दों में रखा. उन्होंने कहा कि देश “नारी शक्ति” (Nari Shakti) की पूरी भागीदारी के बिना विकसित नहीं बन सकता.
आज महिलाएं विज्ञान, कारोबार, खेल और प्रशासन हर क्षेत्र में नजर आती हैं. उनकी मौजूदगी बढ़ी है, लेकिन संसद और विधानसभा में उनकी हिस्सेदारी अब भी बहुत कम है. यही वह अंतर है जिसे भरने की बात अब जोर पकड़ रही है.
महिलाओं के लिए आरक्षण (women’s reservation in Parliament) की मांग कोई नई नहीं है. इसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी. साल 1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के जरिए पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया. इसके बाद लाखों महिलाएं स्थानीय स्तर पर नेतृत्व में आईं. इससे जमीनी स्तर पर बड़ा बदलाव भी देखने को मिला.
लेकिन राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा बदलाव नहीं हो पाया. 1996 में पहली बार महिला आरक्षण बिल पेश हुआ. इसके बाद 1998, 1999 और 2008 में भी इसे लाया गया. 2010 में राज्यसभा ने इसे पास भी कर दिया, लेकिन लोकसभा में यह अटक गया और कानून नहीं बन सका.
इसका असर साफ दिखता है. 17वीं लोकसभा में कुल 543 सांसदों में से सिर्फ 78 महिलाएं हैं. यानी करीब 14.3 प्रतिशत. ज्यादातर राज्यों की विधानसभाओं में यह आंकड़ा 8 से 12 प्रतिशत के बीच ही रहता है.
साल 2023 में “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” के जरिए इस मुद्दे को फिर से आगे बढ़ाया गया. इसमें लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव रखा गया है. सरकार का कहना है कि 2029 के आम चुनाव तक इसे लागू करने की दिशा में काम हो रहा है. राजनीतिक दलों के बीच भी इस पर सहमति बनती दिख रही है.
यह पहल सिर्फ महिलाओं को शामिल करने तक सीमित नहीं है. इसका मकसद शासन को बेहतर बनाना भी है. कई अध्ययनों में सामने आया है कि महिला प्रतिनिधि पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देती हैं. इससे नीतियों में जमीनी जरूरतों की झलक मिलती है.
भारत की आधी आबादी महिलाएं हैं, लेकिन निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनकी हिस्सेदारी बहुत कम है. अगर देश को 2047 तक विकसित बनना है, तो इस असंतुलन को ठीक करना जरूरी है.
कई सालों से इस बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही थी, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं. अगर यह पहल सही तरीके से लागू होती है, तो यह भारत को ज्यादा प्रतिनिधित्व वाला और समावेशी लोकतंत्र बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है. यह वह भारत होगा जहां विकास सिर्फ लोगों के लिए नहीं, बल्कि लोगों के साथ मिलकर होगा.
अब नजर आने वाले समय पर है. क्या यह बदलाव सच में जमीन पर दिखेगा. यही तय करेगा कि भारत अपनी विकास यात्रा में कितना आगे बढ़ पाता है.
Edited by Ravi Pareek



