3 साल की उम्र में हुई शादी, 19 में पुलिस की वर्दी, फिर कैंसर को दी मात — Policewali Didi सुनीता चौधरी की कहानी
महज 3 साल की उम्र में शादी, 19 साल में गांव की पहली महिला पुलिस कांस्टेबल, फिर ओवेरियन कैंसर से जंग और समाज सेवा का सफर. जानिए कैसे राजस्थान की सुनीता चौधरी ने हर मुश्किल को हराकर 'पुलिसवाली दीदी' के रूप में हजारों बच्चों की प्रेरणा बनने तक का सफर तय किया.
एक जमाना था जब राजस्थान (Rajasthan) के गांवों में बच्चियों की जल्दी शादी होना आम बात थी. लड़कियों के सपनों की उम्र अक्सर उनकी शादी की उम्र से छोटी होती थी. लेकिन बाड़मेर (Barmer) जिले के एक छोटे से गांव की सुनीता चौधरी (Sunita Choudhary) ने बचपन में ही तय कर लिया था कि उनकी जिंदगी दूसरों की तरह नहीं होगी. वह पढ़ेंगी. कुछ बनेंगी. वर्दी पहनेंगी. और एक दिन समाज की सोच बदलेंगी.
जिंदगी ने उन्हें एक नहीं, कई कठिन परीक्षाओं से गुजारा. बचपन में बाल विवाह. युवावस्था में कैंसर. इलाज के दौरान लोगों के ताने. लेकिन हर बार उन्होंने हार मानने के बजाय खुद को फिर से खड़ा किया. आज वही सुनीता चौधरी हजारों बच्चों के लिए “पुलिसवाली दीदी” (Policewali Didi) हैं. उनकी कहानी बताती है कि मुश्किलें इंसान को रोकती नहीं हैं, बल्कि उसे और मजबूत बनाती हैं.
सुनीता चौधरी की शादी महज तीन साल की उम्र में कर दी गई थी. उस समय गांव में बाल विवाह (child marriage) एक सामान्य सामाजिक परंपरा थी. परिवार जानता था कि जब वह बड़ी होंगी तो ससुराल चली जाएंगी. लेकिन सुनीता के मन में कुछ और ही चल रहा था.
जब वह करीब पांच साल की थीं, तब उन्होंने अपने पिता से एक बात कही. उन्होंने कहा, “मुझे ऑफिसर बनना है.”
यह सुनकर उनके पिता ने बेटी का साथ देने का फैसला किया. यही फैसला आगे चलकर उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी ताकत बना.
सुनीता दिन में खेत और घर के काम में हाथ बंटातीं. रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करतीं. गांव में पढ़ाई की सुविधाएं सीमित थीं. मिडिल स्कूल जाने के लिए उन्हें रोज करीब छह किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था. इसके बावजूद उन्होंने कभी पढ़ाई नहीं छोड़ी. मेहनत का नतीजा यह हुआ कि वह पढ़ाई में लगातार अच्छा प्रदर्शन करती रहीं.
दसवीं कक्षा में अच्छे अंक आने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए शहर पहुंचीं. इसी दौरान राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल भर्ती (police constable vacancy) निकली. उन्होंने परीक्षा देने का फैसला किया. बताया जाता है कि करीब 50 अभ्यर्थियों में वह अकेली लड़की थीं, जिसने लिखित परीक्षा पास की. उनके पिता हमेशा कहते थे कि बेटी का अफसर बनने का सपना पूरा होना चाहिए. यही शब्द उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे.
करीब नौ महीने की कठिन ट्रेनिंग पूरी करने के बाद सुनीता केवल 19 साल की उम्र में अपने गांव की पहली महिला पुलिस कांस्टेबल (first female police constable from her village) बनीं. परिवार के लिए यह गर्व का पल था. गांव की बेटियों के लिए भी यह एक नई शुरुआत थी. पहली बार किसी लड़की ने वर्दी पहनकर यह साबित किया कि सपनों की कोई सीमा नहीं होती.

सुनीता चौधरी को मार्च, 2019 में ‘राष्ट्रीय नारी गौरव-2019’ अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है.
लेकिन खुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकी.
नौकरी शुरू होने के कुछ समय बाद उन्हें पेट में तेज दर्द रहने लगा. जांच कराई गई तो पता चला कि उन्हें स्टेज 2 ओवेरियन कैंसर (stage 2 ovarian cancer) है. यह खबर उनके और पूरे परिवार के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थी. अगले छह महीने उनके जीवन के सबसे कठिन दिन साबित हुए.
कीमोथेरेपी (chemotherapy) के कारण उनके सारे बाल झड़ गए. शरीर कमजोर हो गया. उनका वजन घटकर करीब 35 किलोग्राम रह गया. इलाज पर लगभग चार लाख रुपये खर्च हुए. उस समय कुछ लोगों ने उनके पिता से कहा कि बेटी पर इतना पैसा खर्च करने का क्या फायदा. लेकिन पिता ने किसी की बात नहीं सुनी. उन्होंने अपनी बेटी का इलाज पूरी ताकत से कराया.
इलाज के दौरान लोगों ने उनके गंजे सिर का मजाक भी उड़ाया. कुछ लोग उन्हें ‘गंजी’ कहकर बुलाने लगे. इन बातों ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया. उन्होंने खुद को लोगों से दूर कर लिया. लंबे समय तक वह घर के अंदर ही रहीं. जब इलाज के बाद दोबारा ड्यूटी पर लौटीं तो सिर पर कैप पहनकर जाती थीं ताकि कोई उनके बालों को लेकर टिप्पणी न करे.
इसी कठिन दौर में संगीत उनके जीवन का सहारा बना. उन्होंने एक संगीत शिक्षक से हारमोनियम सीखना शुरू किया. धीरे-धीरे संगीत ने उनके मन के घाव भरने शुरू किए. उन्हें फिर से जीने की वजह मिलने लगी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बाद में उन्होंने 25 भक्ति संगीत एल्बम भी रिकॉर्ड किए.
स्वस्थ होने के बाद जब वह अपने पति के साथ रहने गईं तो उन्होंने अपनी बीमारी और मां बनने की कम संभावना के बारे में साफ साफ बता दिया. लेकिन उनके पति ने उनका पूरा साथ दिया. उन्होंने कहा कि उन्हें केवल सुनीता का साथ चाहिए. इस सहयोग ने सुनीता को मानसिक रूप से नई ताकत दी. वह फिर से आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने लगीं.
कैंसर को हराने के बाद सुनीता ने तय किया कि अब उनका जीवन केवल नौकरी तक सीमित नहीं रहेगा. उन्होंने समाज के लिए काम करना शुरू किया. ड्यूटी खत्म होने के बाद वह स्कूलों में जाने लगीं. वहां बच्चों को गुड टच और बैड टच की जानकारी देती हैं. सड़क सुरक्षा के नियम समझाती हैं. आत्मरक्षा के तरीके बताती हैं. बच्चियों को पढ़ाई जारी रखने और आत्मविश्वास से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं.
धीरे-धीरे बच्चे उन्हें प्यार से “पुलिसवाली दीदी” कहने लगे. पिछले कुछ वर्षों में वह एक हजार से अधिक बच्चों तक सुरक्षा और जागरूकता का संदेश पहुंचा चुकी हैं. उनके इस योगदान के लिए उन्हें पुलिस विभाग की ओर से प्रशंसा भी मिली.
सुनीता चौधरी को मार्च, 2019 में ‘राष्ट्रीय नारी गौरव-2019’ अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है.
आज जब सुनीता अपने पुराने फोटो देखती हैं, जिनमें कीमोथेरेपी के कारण उनके सिर पर बाल नहीं थे, तो उन्हें अपना संघर्ष याद आता है. वही तस्वीरें उन्हें यह भी याद दिलाती हैं कि इंसान अगर हिम्मत नहीं हारता तो सबसे कठिन दौर भी गुजर जाता है.
सुनीता चौधरी की कहानी केवल एक महिला पुलिसकर्मी की कहानी नहीं है. यह एक बेटी की कहानी है, जिसे उसके पिता ने सपने देखने की आजादी दी. यह एक ऐसी महिला की कहानी है, जिसने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को हराया. यह एक पत्नी की कहानी है, जिसे जीवनसाथी का अटूट साथ मिला. और यह एक ऐसी पुलिसकर्मी की कहानी है, जिसने अपनी वर्दी को केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज की सेवा का माध्यम बनाया.
उनकी कहानी यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर परिवार का साथ, खुद पर भरोसा और आगे बढ़ने का हौसला हो, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता.






