लोगों का अकेलापन दूर कर रहा है श्रद्धा चतुर्वेदी का स्टार्टअप GetCompanion, जानिए कैसे?
GetCompanion की फाउंडर और CEO श्रद्धा चतुर्वेदी ने लोगों के अकेलेपन को समझते हुए एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाया, जहां लोग सुरक्षित तरीके से बात कर सकें. जानिए गुरुग्राम का यह स्टार्टअप कैसे इंसानी रिश्तों की कमी को भरने की कोशिश कर रहा है.
भारत जैसे देश में जहां कभी मोहल्ले, चौपाल और ज्वाइंट फैमिली लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा हुआ करते थे, वहीं अब बड़े शहरों की तेज जिंदगी ने लोगों को धीरे-धीरे अकेला कर दिया है. लोग भीड़ में रहते हैं, लेकिन बात करने वाला कोई नहीं होता.
इसी बदलते समाज के बीच गुरुग्राम की श्रद्धा चतुर्वेदी (Shradha Chaturvedi) ने GetCompanion नाम का ऐसा स्टार्टअप शुरू किया, जो लोगों को भावनात्मक सहारा देने की कोशिश कर रहा है. यह कोई डेटिंग ऐप नहीं है और न ही थेरेपी प्लेटफॉर्म. इसका मकसद सिर्फ इतना है कि किसी इंसान को जरूरत के वक्त कोई सुनने वाला मिल सके.
जनवरी 2026 में स्थापित यह स्टार्टअप दिसंबर 2025 में लॉन्च हुआ था. कुछ ही महीनों में इस प्लेटफॉर्म पर हजारों चैट और कॉल हो चुके हैं. कंपनी फिलहाल गुरुग्राम में इन-पर्सन सेवाएं दे रही है, जबकि डिजिटल सेवाएं पूरे भारत में उपलब्ध हैं.
जयपुर की गलियों से कॉर्पोरेट दुनिया तक का सफर
श्रद्धा चतुर्वेदी का बचपन पुराने जयपुर में बीता. साधारण परिवार था. लेकिन रिश्तों और दोस्तों की कमी नहीं थी. स्कूल के दोस्त अलग थे. मोहल्ले के दोस्त अलग. शाम को खेलने वाले दोस्त अलग. जिंदगी में मिलने जुलने के लिए कैलेंडर देखने की जरूरत नहीं पड़ती थी.
बाद में श्रद्धा ने रिस्क मैनेजमेंट और ऑडिट की पढ़ाई की. वह Certified Information Systems Auditor (CISA) भी हैं. उन्होंने Erasmus University Rotterdam से मास्टर्स किया. इसके बाद PwC, Deloitte और KPMG जैसी बड़ी कंपनियों में भारत, ब्रिटेन, अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका में काम किया. बाद में उन्होंने ISSC नाम की अकाउंटिंग और कंप्लायंस फर्म भी शुरू की.
हाल ही में YourStory से बात करते हुए श्रद्धा [चतुर्वेदी] बताती हैं, “मैंने अपने करियर में बहुत ऐसे लोगों को देखा जो बाहर से बेहद सफल दिखते थे, लेकिन अंदर से टूटे हुए थे. बड़े पदों पर बैठे लोग भी अकेले थे. उन्हें डर रहता था कि अगर उन्होंने अपनी कमजोरी दिखाई तो लोग उन्हें कमजोर समझेंगे. वहीं से मुझे महसूस हुआ कि इंसानों को सिर्फ सलाह नहीं, कभी कभी सिर्फ किसी का साथ चाहिए होता है.”

जब एक सवाल ने बदल दी जिंदगी
GetCompanion किसी एक घटना का नतीजा नहीं था. यह धीरे-धीरे पैदा हुआ विचार था. श्रद्धा को अपने बचपन और आज के बच्चों की जिंदगी में बड़ा फर्क दिखने लगा. उनके मुताबिक पहले लोगों के पास समय था. रिश्ते थे. मोहल्ले थे. अब लोग फ्लैट्स में रहते हैं, लेकिन पड़ोसियों को नहीं जानते.
उन्हें सबसे ज्यादा असर उन बुजुर्गों को देखकर हुआ जिनके बच्चे विदेश में बस चुके हैं. फोन और वीडियो कॉल मौजूद हैं, लेकिन असली बातचीत गायब हो चुकी है.
GetCompanion की फाउंडर और CEO श्रद्धा चतुर्वेदी बताती हैं, “मेरे बेटे के पास इंटरनेट है, मोबाइल है, हर सुविधा है. लेकिन खेलने के लिए दोस्त नहीं हैं. वहीं मेरे बचपन में साधन कम थे, लेकिन लोग बहुत थे. आज इंसान टेक्नोलॉजी से जुड़ा है, लेकिन इंसानों से दूर हो गया है.”
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट्स और कई स्टडीज भी यही दिखाती हैं कि दुनिया में करोड़ों लोग अकेलेपन का सामना कर रहे हैं. इसी समस्या को देखते हुए श्रद्धा ने फैसला किया कि इस खाली जगह को भरने की कोशिश करनी चाहिए.
कैसे काम करता है GetCompanion
GetCompanion चार तरह की सेवाएं देता है. चैट, ऑडियो कॉल, वन वे वीडियो कॉल और इन पर्सन कम्पैनियनशिप. चैट की शुरुआत 5 रुपये प्रति मिनट से होती है. ऑडियो और वीडियो कॉल 8 रुपये प्रति मिनट से उपलब्ध हैं. इन पर्सन सेवाओं की शुरुआत 400 रुपये प्रति घंटे से होती है.
इस प्लेटफॉर्म पर लोग सिर्फ बात करने के लिए आते हैं. कोई सीनियर सिटीजन सुबह की सैर के लिए साथी ढूंढता है. कोई अस्पताल जाने के दौरान साथ चाहता है. कोई तनाव में होता है और सिर्फ किसी को अपनी बात बताना चाहता है.
कंपनी के पास फिलहाल 28 कम्पैनियन और करीब 45 लोगों की टीम है. डिजिटल सेवाओं के लिए केवल मोबाइल नंबर से रजिस्ट्रेशन हो जाता है. नाम या ईमेल जरूरी नहीं है.
श्रद्धा कहती हैं, “हमारा मकसद लोगों की जिंदगी में दखल देना नहीं है. हम सिर्फ वह खाली जगह भरने की कोशिश करते हैं, जहां इंसान को किसी की जरूरत होती है. कई बार लोग सलाह नहीं चाहते. उन्हें सिर्फ कोई सुनने वाला चाहिए होता है.”
सबसे बड़ी चुनौती थी लोगों की सोच
भारत में भावनात्मक जरूरतों को आज भी खुलकर स्वीकार नहीं किया जाता. यही वजह थी कि GetCompanion के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों का भरोसा जीतना था. कई लोग नहीं चाहते थे कि दूसरों को पता चले कि वे किसी साथी की मदद ले रहे हैं.
श्रद्धा बताती हैं कि एक परिवार ने तो उनसे कहा था कि कम्पैनियन बिना ब्रांडिंग वाली गाड़ी से आए, ताकि पड़ोसियों को पता न चले.
कंपनी ने शुरुआत से सुरक्षा पर खास ध्यान दिया. हर कम्पैनियन का पुलिस वेरिफिकेशन होता है. इन-पर्सन सेवाओं के लिए यूजर का आधार वेरिफिकेशन जरूरी है. प्लेटफॉर्म पर किसी भी तरह की गलत या अश्लील बातचीत की अनुमति नहीं है.
श्रद्धा कहती हैं, “हमने शुरू से तय किया कि सुरक्षा पर कभी समझौता नहीं करेंगे. जब आप भावनात्मक रूप से कमजोर लोगों के साथ काम करते हैं, तब एक छोटी गलती भी बहुत बड़ी हो सकती है. इसलिए हमने स्पीड से ज्यादा भरोसे को अहमियत दी.”
कंपनी अपने कम्पैनियंस को लगातार ट्रेनिंग भी देती है. उन्हें सिखाया जाता है कि वे सलाह देने या थेरेपी करने की कोशिश न करें. उनका काम सिर्फ सुनना और भावनात्मक सहारा देना है.

GetCompanion की टीम
शुरुआती महीनों में मिला मजबूत रिस्पॉन्स
लॉन्च के बाद से कंपनी अब तक 5,000 से ज्यादा चैट और कॉल पूरी कर चुकी है. इसके अलावा 300 से ज्यादा इन-पर्सन सेशन भी हो चुके हैं. कंपनी को 300 से ज्यादा यूजर फीडबैक मिले हैं.
श्रद्धा एक घटना याद करते हुए कहती हैं, “एक रिटायर्ड संयुक्त राष्ट्र अधिकारी अपनी पत्नी के देहांत के बाद बहुत अकेले हो गए थे. कुछ सेशंस के बाद उन्होंने खुद हमें अपने 65 दोस्तों से मिलवाया. तब हमें महसूस हुआ कि लोग सिर्फ सुविधा नहीं, इंसानी जुड़ाव ढूंढ रहे हैं.”
कंपनी फिलहाल गुरुग्राम में इन-पर्सन सेवाएं दे रही है. आने वाले समय में दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में विस्तार की योजना है. आगे चलकर कंपनी यूरोप के बाजार में भी कदम रखना चाहती है.
इंसानों के लिए बने बिजनेस को इंसानी होना पड़ेगा
श्रद्धा चतुर्वेदी मानती हैं कि इंसानों से जुड़े बिजनेस सिर्फ टेक्नोलॉजी से नहीं चलते. उनमें भरोसा, संवेदनशीलता और धैर्य जरूरी होता है. यही वजह है कि उन्होंने अभी तक बाहरी फंडिंग नहीं ली है. कंपनी पूरी तरह बूटस्ट्रैप्ड है.
उनके मुताबिक किसी भी मानव केंद्रित स्टार्टअप की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह होती है कि वह लोगों को सिर्फ ग्राहक न समझे.
श्रद्धा कहती हैं, “आज स्टार्टअप दुनिया में तेजी से बढ़ने का दबाव बहुत ज्यादा है. लेकिन अगर आपका काम इंसानों की भावनाओं से जुड़ा है, तो आपको धीरे चलना पड़ेगा. भरोसा किसी मार्केटिंग कैंपेन से नहीं बनता. उसे कमाना पड़ता है.”
भारत तेजी से बदल रहा है. शहर बढ़ रहे हैं. लेकिन रिश्ते सिकुड़ रहे हैं. ऐसे समय में GetCompanion जैसी पहल यह दिखाती है कि टेक्नोलॉजी के दौर में भी इंसानों को आखिरकार इंसानों की ही जरूरत होती है.




