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मुफलिसी को मात देकर छू लिया आसमान

अभावग्रस्त परिवारों से निकले होनहार युवा ऊंची सफलता के बाद पूरी पूरी पीढ़ी के लिए मिसाल बन जाते हैं। दो ऐसे ही होनहार हैं बांका (बिहार) के शिवेंद्र कुमार और जयपुर (राजस्थान) के मोहित बागानी।

जय प्रकाश जय
17th May 2019
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सांकेतिक तस्वीर

राजस्थान के घनश्याम दास बागानी प्रदेश की राजधानी जयपुर में ठेल लगाकर मूंगफली बेचते हैं। किसी तरह से मामूली कमाई से घर-परिवार की गाड़ी खींचते हुए उन्होंने अपने बेटे मोहित को उच्च शिक्षा दिलाई। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनो इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बेंगलुरु के किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना के फाइनल रिजल्ट में आईआईटी जेईई एवं प्री-मेडिकल कोचिंग संस्था पीसीपी, सीकर (राजस्थान) के जिन चार युवकों ने ऑल इंडिया जनरल कैटेगरी में टॉप-100 में रैंक हासिल किया है, उनमें एक मोहित बागानी भी हैं। उन्हे ऑल इंडिया स्तर पर सामान्य वर्ग में 10वीं रैंक मिली है।


अभावग्रस्त परिवार में जनमे मोहित की मां मामूली सी तनख्वाह पर एक निजी स्कूल में पढ़ाती हैं और पिता मूंगफली बेचते हैं। घर-परिवार की माली हालत खराब पता चलने पर मोहित की प्रतिभा को देखते हुए सीकर के टेक्निकल संस्थान ने उन्हे निःशुल्क पढ़ाया-लिखाया है। बचपन से ही मोहित का ख्वाब वैज्ञानिक बनने का रहा है। आर्थिक तंगी के बावजूद अब उन्होंने अपना लक्ष्य लगभग हासिल कर लिया है। वह शुरू से ही मेहनती और प्रतिभाशाली रहे हैं। दसवीं क्लास में उनको 90.50 प्रतिशत और बारहवीं में 88 प्रतिशत अंक मिले थे। दसवीं के बाद वह पीसीपी, सीकर में कोचिंग करने लगे। दो साल से परिवार से दूर रहकर पढ़ाई करते रहे।


मोहित बताते हैं कि दो सालों तक माता-पिता से दूर रह कर सीकर में पीसीपी में तैयारी करते हुए सप्ताह में केवल दो बार ही बात करते थे। इस दौरान वह मोबाइल और अन्य गैजेट्स से हमेशा दूर रहे। परीक्षा पास करने वाले चार चरणों को रोजाना संस्थान के साइंटिस्ट शिक्षकों की देखरेख में पूरा करना होता था। इंटरव्यू के दौरान साइंटिस्ट पैनल ने उनसे ज्यादातर फिजिक्स, कैमिस्ट्री पर सवाल किए। मोहित न्यूरो साइंस में जाना चाहते हैं।


किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना में चयनित छात्र को प्रतिष्ठित संस्थान में सीधे प्रवेश मिलता है। स्नातक की पढ़ाई के दौरान 60 हजार रुपए एवं स्नातकोत्तर में 84 हजार रुपए की फेलोशिप मिलती है। स्नातक के दौरान 20 हजार और स्नातकोत्तर क्लास में 28 हजार रुपए वार्षिक आकस्मिक अनुदान भी मिलता है। उनकी जिंदगी में अब वह दिन दूर नहीं, जबकि वह इसरो में एक वैज्ञानिक के रूप में काम करते नजर आएंगे।


'हवा रुख मोड़ ले अपना, चलो रफ़्तार तुम ऐसी, कोई कश्ती न डूबेगी अगर अरमान गहरे हों।' किसी शायर की ये पंक्तियां बांका (बिहार) के विजयनगर निवासी युवा शिवेंद्र कुमार के संघर्षों की तस्दीक करती हुई जान पड़ती हैं, जिन्होंने गोबर चुन-चुनकर चार पैसे जोड़ने-बटोरने वाली मां की मेहनत को अंजाम तक पहुंचा दिया है। वह रेलवे में लोको पायलट चुन लिए गए हैं। अब उन्हें मां सुनीता देवी और नानी जया देवी को कभी गरीबी के दिन नहीं देखने पड़ेंगे क्योंकि अपनी मशक्कत से अब उन्होंने जीवन में नया मुकाम हासिल कर लिया है।


शिवेंद्र की नानी जया देवी एक वक्त में छोटी सी झोपड़ी में गोबर चुन कर परिवार की नैया खेती रही हैं। उनके कोई पुत्र नहीं था तो बेटी सुनीता को ही अपने पास बसा लिया। सुनीता को तीन बेटे, एक बेटी हुई। बेटों में शिवेंद्र सबसे बड़े हैं। उन्होंने हाईस्कूल और इंटर फर्स्ट क्लास पास कराने के बाद आईटीआई में दाखिला ले लिया लेकिन अब पढ़ाई बड़ी मुश्किल से खिंचने लगी। इसके लिए नानी सारे उपले (गोबर का इंधन) और बकरी बेच कर दस हजार रुपये जुटाने पड़े।


आईटीआई की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनकी मेहनत ने रंग लाया, शिवेंद्र को रेलवे में गैंग मैन की नौकरी मिल गई लेकिन सिर्फ इतने भर से आगे बढ़ने की उनकी ललक थमी नहीं, और अब वह रेलवे में लोको पायलट बन गए हैं। फिलहाल, उनको पहली पोस्टिंग अंडाल (आसनसोल) में मिली है। शिवेंद्र की नानी जया देवी बताती हैं कि घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण शिवेंद्र को पढ़ाना बहुत मुश्किल हो रहा था, लेकिन उसकी ललक देख कर हमने भी किसी तरह हिम्मत जुटाई, आसपास के लोगों ने भी सहयोग किया। अब वह नाती की नौकरी से बहुत खुश हैं। शिवेंद्र कहते हैं कि मां सबके लिए मां होती है। उनकी मां और नानी उनके लिए किसी भगवान से कम नहीं हैं। निश्चित रूप से उन्हे सिर्फ अपनी नहीं, बल्कि मां और नानी की मेहनत से भी यह कामयाबी मिली है।


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